इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
कवि ने लिखा –
कस्तूरी कुण्डल बसै मृग ढूढै बन माँहि ।
ऐसहि घट घट राम हैं दुनियाँ ढूढै ताहि ॥
कस्तूरी की सुगंध विख्यात है । वह मृग के अंदर
पायी जाती है । मृग उसकी सुगंध पाता है परंतु यह जानता नहीं कि वह कस्तूरी जिसकी
सुगंध से वह मोहित है वह उसके अंदर ही विद्यमान है । परिणामत: वह उसे जंगल जंगल
ढूढ्ता फिरता है । इसी प्रकार ब्रम्ह हमारे अंदर ही विद्यमान है परंतु महिमा
अज्ञान की कि हम उसे जानते नहीं पहचानते नहीं और अज्ञान के अंधकार में भटक रहें है
।
सूर्य को जानने के लिये किसी अन्य प्रकाश की
आवश्यकता नही होती । ज्ञान को पाने के लिये किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती
है । ब्रम्ह करोणो सूर्य से भी अधिक प्रकाशमान चमकता हुआ तेजस्वी स्वरूप है ।
मात्र अज्ञान का अंधकार है जिसमें आसक्ति जनित कर मनुष्य उसी अज्ञान के अंधकार में
इतना तल्लीन हो गया है कि उसे ज्ञान के चमकते सूर्य का आभास ही नहीं ।
अंधकार और प्रकाश दोनो साथ नहीं रह सकते । जब
ज्ञान का प्रकाश पहचान जाँवेगे तो अज्ञान का अंधकार अपने आप विलीन हो जावेगा । उस
परम् ब्रम्ह की प्रत्येक उत्पत्ति उसकी संतान है । परम् ब्रम्ह अपनी प्रत्येक
संतान को प्यार करता है । परम् ब्रम्ह ने अपनी प्रत्येक संतान को किसी निर्धारित
कर्म को करने के लिये जन्म दिया है । प्रकृति उस ब्रम्ह की व्यवस्था है । प्रत्येक
ब्रम्ह की संतान का यह शाश्वत कर्तब्य है कि वह ब्रम्ह की ब्यवस्था प्रकृति के प्रत्येक
आदेश को सेवा भाव से कर्तब्य रूप में अंजाम दे । यही कर्तब्य निर्वाह सेवा ही
ब्रम्ह की भक्ति है ।
भगवान राम भक्त हनुमान को बताते हैं –
समदरसी मोहिं कह सब कोई । सेवक प्रिय अनन्य गति
सोऊ ।
सो अनन्य जाके असि मति न टरई हनुमन्त ।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ॥
समस्त सृष्टि मेरी संतान है । सभी मुझे समदरसी कहते हैं बताते हैं । परंतु
मुझे सेवक प्रिय हैं । सेवकों में भी आनन्य सेवक अधिक प्रिय है । फिर अनन्य का भावार्थ
भी बताते है कि अनन्य उसे समझो जिसके मस्तिष्क में सदैव प्रतिपल यह विचार व्याप्त
रहता है कि मैं (आत्मा – एक व्यक्ति विषेस) सेवक हूँ और
सकल सृष्टि (प्रकृति) भगवान का स्वरूप में मेरी स्वामी है तथा सेवा मेरा धर्म है
कर्तब्य है ।
विश्व बंधुत्व की शश्वत भावना पिरोये यह धर्म दर्शन मानव मात्र का आह्वाहन
करता है कि अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह को पहचानो । ब्रम्ह के विद्यमान होने से ही आप
मनुष्य कहे जाते हो । प्रकृति के रूप में ब्रम्ह समस्त सृष्टि में फैला हुआ है ।
प्रकृति उसकी ब्यवस्था है । प्रकृति के प्रत्येक आदेश को अपना शाश्वत कर्तव्य मान
सेवा भाव से कर्तब्य निर्वाह ही उचित कर्तव्य है । कर्तव्य निर्वाह को ब्रम्ह के
संविधान के अनुरूप अंजाम दे एक निष्ठावान संतान की श्रेणी ग्रहण करना ही योग्यतम
उपलब्धि होगी ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन
नारायण
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