शनिवार, 14 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
भक्ति अर्थात आदरपूण समर्पण । आत्मा द्वारा प्रकृति के प्रति आदरपूर्ण समर्पण । उद्देष्य कर्म संविधान के अनुरूप कर्म सम्पादन के लिये । जैसा कि प्रत्येक लेख के प्रारम्भ में अंकित किया जाता रहा है कि ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । आत्मा प्रकृति कर्म । आत्मा ब्रम्ह का अंश होने के कारण प्रकृति की ज्ञान क्षमता के परे होता है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है गुणयुक्त है । ब्रम्ह के अंश आत्मा को ब्रम्ह की रचना प्रकृति के मध्य रखा है ब्रम्ह ने । दोनो परस्पर एक दूसरे से क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं । परिणामत: उत्पन्न होता है कर्म । कर्म का दायित्व ब्रम्ह ने सौंपा है प्रकृति को और सम्पादन क्षमता प्रदान की आत्मा को । सम्पादन काल में प्रकृतीय गुणों का भोग करते हुये आत्मा प्रकृतीय गुणों में आसक्ति कर बैठता है । फलत: आत्मा का कर्म सम्पादन त्रुटिपूर्ण हो जाता है । त्रुटि निवारण विचारणीय होने पर विद्वानों ने सुझाया भक्ति । आत्मा का प्रकृति के प्रति आदरपूर्ण समर्पण । इस समस्त स्वरूपों अर्थात आत्मा प्रकृति और कर्म को ध्यान में रखते हुये तथा समर्पण का उद्देष्य मस्तिष्क में स्पष्ट रखते हुये प्रयत्नशील होने से फलदायी होगा ।
आत्मा और प्रकृति दोनो ही अनादि काल से सृष्टि में है । अनंत काल से दोनो ही परस्पर क्रिया करते आये हैं । अनंत काल से आत्मा प्रकृतीय गुणों में आसक्ति कर त्रुटिपूर्ण कर्मों को सम्पादित करते प्रकृतीय कोप को भोगते आया है । दण्ड भोग करते सुख की कामना संजोये मानो आत्मा का सहज रूप बन गया है ।
उपरोक्त समस्त अविद्या के कारण होता रहा है । अविद्या अर्थात सत्य स्थिति को न जानने के कारण । स्थिति यथोक्त को जान लेने के बाद सुधार को प्रयत्नशील होना सम्माननीय प्रयत्न होगा । प्रयत्न प्रारम्भ करने पर पायेगें कि अनंत काल से आसक्ति पथ पर चलती आत्मा पुन: पुन: उसी पथ लौटने को उन्मुख होती है । यह विकृति पैदा हुई थी प्रकृतीय गुणों के कारण और पुन: पुन: लौटने की प्रवृत्ति भी उन्ही प्रकृतीय गुणों के निमित्त ही होती है । इसी लिये प्रकृति की ही वंदना का पथ सुझाया विद्वानों ने । आत्मा विनय करती है प्रकृति से कि हे प्रभू मेरे ऊपर कृपालु होइये और मुझे सही कर्म सम्पादन के वाँक्षित पथ पर चलने के लिये उपयुक्त वातावरण प्रदान करिये मैं आसक्ति के भयानक व्याधि से स्वयँ अपने प्रयत्नों से ऊबर नहीं पा रहा हूँ । परंतु यह आत्र भाव से विनय कोई मात्र किसी के सुझाव के कारण तो करेगा नहीं । यह तो वही करेगा जो सुधार को प्रयत्नशील होगा वह भी पूर्ण निष्ठा से दृढप्रतिज्ञ होकर और प्रयत्नों को करते बार बार असफलता का सामना करते त्रस्त हो जावेगा तभी आत्र भव से विनय कर सकेगा । इस प्रकार सत्य स्थिति अर्थात आत्मा प्रकृति और कर्म तीनो के मूल स्वरूप व तीनो के परस्पर सम्बंध को जानने तथा त्रुटिपूर्ण कर्मों की उत्पत्ति की प्रक्रिया को जानने के उपरांत त्रुटि निवारण का उद्देष्य मस्तिष्क में निर्धारित करना पहला चरण है । त्रुटि बिवारण के लिये भक्ति का पथ जानना दूसरा चरण है । निवारण के लिये प्रयत्नशील होना तीसरा चरण है । निवारण प्रक्रिया काल में अपने कर्मों को परीक्षित करते रहना चौथा चरण है । असफलता की परिस्थिति से संघर्षरत रहते प्रयत्न जारी रखना दृढता होगी । फिर आयेगी आत्र विनय की स्थिति । जब प्रयत्नशील साधक बारम्बार असफलता से संघर्ष करते यह सोचता है कि छोटा सा जीवन काल है रोग इतना पुराना जड किये हुये भगवान कैसे पार लगे । तब स्वत: भाव उठेगा आत्र विनय का । हे प्रकृति आप ही माँ स्वरूप हो अपनी संतान को कृपा की क्षाया प्रदान करो मैं सत्यनिष्ठ भाव से आपके आज्ञाकारी पुत्र के रूप में आपकी सेवा करना चाहता हूँ ।
भगवान सदैव भक्त को आश्वासन देते आये हैं कि मेरी शरण में आवो मैं तुम्हारे समस्त पापो को अवश्य क्षमा कर दूँगा ।

 प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

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