गत अंक से क्रमश: -
कर्म त्रुटि को सुधारने के लक्ष्य से
कर्म पथ अंगीकार करने की दशा में मनुष्य की शरीर के विभिन्न अवयवों जिनका कि कर्म
सम्पादन में प्रयोग होता है को जानना परम आवश्यक वाँक्षना है । मात्र उनका परिचय
जनना ही पर्याप्त नहीं होगा अपितु उन प्रत्येक अंग की कार्य पद्धति तथा उन अंगों
की त्रुटि प्रवित्त में सम्भावित योगदान को जानना भी परम आवश्यक है । गत अंक में
दसो इंद्रियों के सम्बंध में विवेचना उद्घृत की गई थी । इंद्रियों का सकल नियंत्रण
मस्तिष्क द्वारा संचालित होते हैं । इसलिये अब विवरण मस्तिष्क की रचना, कार्य विधा, कर्म त्रुटि में योगदान के सम्बंध में । मस्तिष्क प्रकृति
की अति विलक्षण विज्ञानमय अद्भुद रचना है । इसकी जितनी सराहना की जाय पर अल्प ही
होगी । प्रकृति की असीम क्षमता की ज्ञोतक यह प्रकृतीय रचना अद्भुद कार्य क्षमता
दक्षता से युक्त है । परंतु इसे अति नियंत्रित और कुशलता पूर्वक संचालित करना भी
अति महत्वपूर्ण वाँक्षना है । अन्यथा सृजन को लक्ष्य कर विध्वंस घटित होते हैं ।
सर्व-प्रथम मस्तिष्क की रचना की चर्चा
उचित क्रम होगा । यहाँ यह उल्लेख महत्वपूर्ण होगा कि शरीर विज्ञान के ज्ञाता इसका
विश्लेषण व अध्ययन जिस लक्ष्य से करते हैं वह भिन्न है । यहाँ जो विश्लेषण
प्रस्तुत किया जावेगा वह धर्म दर्शन के आलोक में होगा । उपरोक्त दोनों भिन्न
विधाओं की तुलनात्मक उपलब्धि की समीक्षा विषयांतर तुल्य होगा । इसलिये इतना उल्लेख
मात्र ही पर्याप्त है ।
मस्तिष्क को यदि इसके कार्य सम्पादन को
लक्ष्य कर देखा जाय तो इसे तीन स्पष्ट खण्डों में पाया जाता हैं । प्रत्येक खण्ड
की चर्चा क्रम से । पहला खण्ड जहाँ प्रत्येक ज्ञान इंद्रियों द्वारा वाह्य जगत से
लायी गई सूचना पहुँचती है । कोई विशिष्ट नाम आवंटित करना आवश्यक नहीं है । इस खण्ड
में वाह्य जगत से लाई गई प्रत्येक सूचना का विश्लेषण किया जाता है । सूचना को
विश्लेषण उपरांत एक निश्चित उभयनिष्ट भाषा में रूपांतित किया जाता है । तदोपरांत
मस्तिष्क के दूसरे खण्ड को प्रेषित की जाती है । तीसरा कार्य भी इस खण्ड में
सम्पादित होता है । मस्तिष्क के तीसरे खण्ड से प्राप्त होने वाली सूचनाओं को पुन:
विश्लेषण कर इंद्रियों को प्रेषण हेतु इंद्री विषेस की भाषा में पर्णित करता है ।
यहाँ विषेस उल्लेखनीय है कि उपरोक्त वाक्य मे प्रयुक्त भाषा शब्द का अर्थ बोली
जाने वाली भाषा से भिन्न है । जो भी सूचना कोई इंद्री काह्य जगत से लाती है वह
प्रत्येक भिन्न वर्ग की सूचना होती है । यथा आँख की सूचना दृष्य से सम्बंधित होगी
। उसे वह प्रकाश की कार्य शैली के अनुरूप भाषा में प्रेषित करेगी । कान की सूचना
ध्वनि की कार्य शैली के अनुरूप भाषा में प्रेषित होगी । जिह्वा की सूचना स्वाद की
कार्य विधा के अनुरूप भाषा में होगी । नाक की सूचना गंध की कार्यशैली के अनुरूप
भाषा में होगी । स्पर्ष की सूचना त्वचा तापमान की कार्यविधा के अनुरूप भाषा में
होगी । यदि उपरोक्त सभी विधाओं की भाषा भिन्न नहीं होगी तो ज्ञान बोध भिन्न कैसे
होगा । सुंदर या असुंदर दृष्य । संदर या असुंदर स्वर । सुंदर या असुंदर स्वाद ।
सुंदर या असुंदर गंध । शीत या ठंड । सभी भिन्न अनुभूतियाँ हैं । प्रत्येक की भाषा भिन्न
है । प्रत्येक का प्रभाव भिन्न है । प्रत्येक की भिन्न भाषा का तर्क अति सामान्य मूल्याँकन
होगा । इसमें विस्मय योग्य रंचमात्र कुछ नहीं है । इस आलोक में मस्तिष्क की सक्षमता
का मूल्याँकन करने पर उसे अद्भुद से कम क्या कहा जायेगा । प्रत्येक पाँच भषाओं को किस
दक्षता से वह प्रतिपल संचालित करता है । एक साथ कितने इंद्रियों से सूचनाये आती रहती
है । सभी साथ के साथ निस्तारित होती रहती हैं । प्रत्येक मनुष्य के साथ घटित हो रहा
है । प्रतिपल घटित हो रहा है । यह बात भिन्न है कि कौन इसका सज्ञान ले रहा है और कौन
इसका सज्ञान नहीं ले रहा है । कर्म पथ से यदि कर्म दोष का निवारण करना है तो सज्ञान
लेना अनिवार्य वाँक्षना होगी ।
क्रमश: अगले अंक में -
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