गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
प्रपत्ति का आधार स्तम्भ होती हैं (1) अनुकूलस्य संकल्प: - प्रत्येक प्राणी के प्रति सद्भाव । प्रत्येक प्राणी व्यापक प्रकृति की संतान है । प्रत्येक प्राणी को प्रकृति ने जन्म दिया है किसी निश्चित कर्तब्य की पूर्ति के लिये । प्रत्येक प्राणी का कार्य दायित्व महत्वपूर्ण है । प्रत्येक प्राणी के मनोभाव का एक निश्चित महत्व है । मात्र तुलनात्मक सामाजिक उपलब्धियों के आधार पर किसी को महत्वपूर्ण अथवा तिरस्कृत न ग्रहण किया जाय । इस प्रकार के विचार यदि मस्तिष्क में निहित होगे तभी वह व्यक्ति प्रकृति के प्रति आदर भाव जाग्रित कर उसकी निष्ठापूर्ण सेवा में तत्पर हो सकेगा । (2) प्रतिकूलस्य वर्जितम उपरोक्त क्रमाँक एक पर कहा गया कि प्रत्येक प्राणी के प्रति सद्भाव आवश्यक है । विद्वान महात्मा उतना ही बता संतुष्ट नहीं हुये वह उपरोक्त के विलोम को वर्जित भी बताया । किसी प्राणी के प्रति दुर्भावना न रखे । सभी प्राणी प्रकृति के संतान हैं । सभी को प्रकृति ने किसी विसिष्ट कार्य दायित्व के लिये जन्म दिया है । प्रत्येक महत्वपूर्ण है प्रकृति के लिये । सभी प्राणी के कर्मों की कर्ता प्रकृति ही है । अत: किसी भी प्राणी के प्रति दुर्भावना न रखी जाय । (3) रक्षिस्याति विश्वास: - प्रकृति रक्षा करेगी यह विश्वास मस्तिष्क में दृढ हो । यहाँ विवेचना योग्य है कि मनुष्य प्रवित्ति दो प्रकार की होती है । प्रथम श्रेणी में मनुष्य किसी सिद्धांत को विश्वास करता है जब तक कोई ऐसी घटना न घटित हो जाय जिससे वह विश्वास करने योग्य न रह जाय । दूसरी श्रेणी में मनुष्य किसी सिद्धांत को विश्वास नहीं करेगा जब तक कोई घटना ऐसी न घटित हो जाय जिससे वह विश्वास करने पर बाध्य हो जाय । उपरोक्त वर्गीकरण यथा अनुभव पाया जाता है । यह मूलत: जिसका जैसा मस्तिष्क प्रकृति ने बनाया है वैसा वह वर्ताव करता है । इसलिये वाँक्षना रक्षिस्याति विशास: प्रथम श्रेणी के व्यक्ति जो सिद्धांत को कहे अनुसार सत्य मानते हैं को अभ्यास में सरलता से व्यव्हृत होगा और दूसरे श्रेणी के लोग जो सत्य मानने के लिये घटित सत्य की प्रतीक्षा करते है उन्हे इसे अंगीकार करने में कठिनाई आयेगी । परिणामत: उपलब्धियाँ भी तद्नुसार होंगी । (4) गोपतृत्व वर्णम् प्रकृति की ओर रक्षा की कामना से घूमना । यह वाँक्षना पूर्णतया अभ्यास काल के लिये कही गयी है । कर्म दोष के सुधार की प्रक्रिया विचाराधीन है । दोष उत्पत्ति होती है आसक्ति जनित इच्छाओं से और कर्तापन के अहंकार से । निवारण को प्रयत्नशील होने पर मनुष्य चेष्टा करता है कि वह प्रकृति के आदेशित कर्मों को सम्पन्न कर कर्म संविधान के प्रति सत्य प्रमाणित हो । कर्म सम्पादन के उपरांत जब वह अपने कर्म सम्पादन की स्वयँ समीक्षा करता है तो पाता है कि फिर उसने अपनी इच्छाजनित कर्म को ही सम्पन्न किया है । उसकी सही कर्म सम्पादन की चेष्टा विफल हुई । अनंत काल से आत्मा का अभ्यास रहा है इच्छाजनित कर्मों को ही करने का । इसलिये सुधार की चेष्टा विफल हुई । इस प्रकार बार बार की सुधार की चेष्टा विफल होने पर विफलता से त्रस्त वह प्रकृति की ओर अपने सुधार के प्रयत्नों की रक्षा के मंतब्य से घूमता है । गोपतृत्व वर्णम् । (5) कार्पण्यम् अपने सामर्थ्य से असहाय । उपरोक्त गोपतृत्व वर्णम् प्रकृति की ओर रक्षा की कामना से मनुष्य तभी घूमेगा जब उसे अपने सुधार की चेष्टा से वह असहाय महसूस करेगा । जब तक उसे अपने पुरुषार्थ पर भरोसा रहेगा तब तक वह किसी सहायता के लिये क्यों आत्र होगा । सहायता की प्रार्थना ही आत्र असहाय स्थिति का परिणाम होती है । इस प्रकार यह वाँक्षना भी प्रयत्नशील सुधार के चेष्टारत साधक के लिये ही है । कार्पण्यम् स्थिति गोपतृत्व वर्णम् की सत्यनिष्ठा प्रमाणित करती है । दोनों वाँक्षनाओं का मिश्रित स्वरूप बनता है कि हे प्रभू मैं अपने प्रय्त्नों से अपने कर्म दोष का सुधार नहीं कर पा रहा हूँ इसलिये मैं आपसे सहायता की याचना कर रहा हूँ कृपया मेरे प्रयत्नों की रक्षा कीजिये ताकि मैं सत्यनिष्ठ यथा संविधान वाँक्षना कर्म सम्पादित कर सकूँ । (6) आत्मनिक्षेप: - पूर्ण समर्पण । अपने को पूर्ण रूप से प्रकृति की कृपा पर अर्पित करना । गत लेख में जो दृष्टांत बिल्ली के बच्चे का दिया गया था । उपरोक्त छ: वाक्षँनाये वब मनुष्य पूर्ण कर लेगा अपने अभ्यास में समाहित कर लेगा तो प्रकृति माँ अपने उस संतान के कर्मों की रक्षा बिल्ली की भाँति करेगी उसे अपने पूर्ण संरक्षण में वह माहौल देगी जिसमें वह अपनी इच्छाजनित कर्मों से दूर हट प्रकृति के आदेशित कर्मों को करने में संलग्न हो जावेगा ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

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