इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
सगुण ब्रम्ह प्रकृति की वंदना । वंदना का
उद्देष्य उसकी कृपा की उपलब्धि । कृपा की आवश्यकता अपने त्रुटिपूर्ण कर्म का सुधार
। इच्छाजनित कर्मों का पोषण त्याग कर्म संविधान के अनुकूल कर्म सम्पादन परिणाम
अपना अभ्यास बनाने के निमित्त । सुगमतम पथ भक्ति । अर्थात निर्गुण ब्रम्ह के अंश
स्वरूप आत्मा के सुधार हेतु सगुण ब्रम्ह की वंदना । निमित्त निर्गुण आत्मा सगुण के
गुणों की भोक्ता होने के कारण सगुण में आसक्त हो जाने से अपने निरंकार स्वरूप को
कलंकित कर बैठी ।
मुनि अर्थात विद्वान जिन्होने अपना समस्त
जीवन अर्पित किया मात्र ब्रम्ह व ब्रम्ह की उत्पत्ति प्रकृति के अध्ययन में और कुछ
उपयोगी उपलब्धियों को उन्होने दिया समाज को लाभांवित होने के उद्देष्य से । ज्ञानी
मुनियों ने जिस प्रकार सगुण ब्रम्ह की वंदना की उसके कतिपय दृष्टांत उद्घृत किये
जा रहे है ।
सर्व प्रथम अगस्त मुनि द्वारा की गई
प्रभु श्रीराम की वंदना –
अस बर माँगहु कृपा निकेता ॥ बसहुँ हृदय श्री अनुज समेता ॥
अविरल भगति प्रीति संत संगा । चरण सरोरुह प्रीति अभंगा ॥
ज्ञानी मुनि सर्वप्रथम माँगते है अविरल भक्ति । सतत भक्ति ।
प्रतिपल सेवा भाव । अविस्मरणीय सेवा कामना । वंदना की दूसरी माँग प्रीति संत संगा
। संत अर्थात वे प्राणी जिनका प्रत्येक कर्म कर्म संविधान के अनुकूल है । ऐसे संतो
के साथ रहने का सुयोग । वंदना का तीसरा वंदन चरण सरोरुह प्रीति अभंगा । प्रभु के
श्री चरणों के प्रति मन अर्थात मस्तिष्क में प्रतिपल अविरल अर्थात कभी खण्डित न
होने वाली प्रीति चेतना ।
ध्यान योग्य है कि ज्ञानी मुनि की वंदना अविरल कभी खण्डित न
होने वाली सेवा तत्परता को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानती है । त्रुटि किसी भी पल जनित
हो सकती है । इसलिये त्रुटि निवारण के लिये प्रयत्नशील को प्रतिपल सतर्कतापूर्ण
प्रयत्नों की आवश्यकता प्रतीत होती है । सावधानी हटी दुर्घटना घटी । सुधार
प्रयत्नों की साधना काल में दूसरी योगकारक स्थिति बनती है संत संग से । उन
व्यक्तियों की संगत जिनका कर्म सुधरा हुआ है । जो त्रुटि करते ही नहीं । इच्छाजनित
कर्म करते ही नहीं । ऐसे व्यक्ति के साथ मिलने पर आँख से देखता है उद्यमी व्यक्ति
की संत किस सरलता से प्रकृति प्रेरित कर्मों को करता है । देखकर सुगमता से सीखता
है । भगवान श्रीराम ज्ञानी मुनि सनकादि के आगमन के अवसर पर उनका स्वागत करते हुये
कहते हैं –
बडे भाग्य पाउब संत संगा । बिनहि प्रयास होंहि भव भंगा ॥
यह मेरा अति सौभाग्य है कि आप के आने से मुझे संत का संग
मिला, जिसके
मिलने से इस संसार में जो कर्म त्रुटिपूर्ण होने का भय होता है समाप्त हो जावेगा ।
इसप्रकार संत की संगत को अध्ययन के प्रत्येक स्तर पर अति
महत्वपूर्ण माना गया है ।
वंदना की तीसरी माँग प्रीति अभंगा । अखण्डित सेवा भाव । इस
भाव के खण्डित होने के साथ ही प्रवेष होगी त्रुटि । इसलिये त्रुटि से बचने के लिये
अखण्डित । उपलब्धि के लिये परम आवश्यक अखण्डित सेवा भाव ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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