इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
निर्गुण ब्रम्ह का अंश आत्मा । सगुण ब्रम्ह प्रकृति । आत्मा और प्रकृति के परस्पर
से उत्पन्न कर्म । यही तीन स्वरूप सम्मुख है । ब्रम्ह ने अपने को इन्ही तीन स्वरूपों
में प्रगट किया है । निर्गुण आत्मा और सगुण प्रकृति का मिलन ब्रम्ह ने कर्म की उत्पत्ति
के उद्देष्य से ही किया है । निर्गुण और सगुण का मिलाप ही ब्रम्ह का विज्ञान है । प्रकृति
ब्रम्ह की व्यवस्था है । प्रकृति कर्मों की कर्ता है । प्रकृति ही सृष्टि की उत्पत्ति
श्रोत है । प्रकृति ही नियंत्रण है । प्रकृति ही सन्हार श्रोत है । प्रकृति का सम्पादन
न्याय पर आधारित है । प्रकृति ब्रम्ह के प्रति निष्ठावान है । इसलिये वह निष्ठावान
नित्यकर्ता आत्मा को ही प्रिय मानती है । उन निष्ठावान आत्माधारकों में भी जिनका आचरण
सदैव प्रतिपल निष्ठावान श्रेणी का ही रहता है उन्हे अधिक प्रिय मानती है । अनन्य श्रेणी
के भक्त । भक्ति की अनिवार्य वाँक्षना है स्वामिभक्ति । अपने स्वामी प्रकृति के प्रति
निष्ठावान । प्रकृति के आदेश की तत्परता से पूर्ति करने वाला । मात्र प्रकृति के आदेशों
का सम्पादन करने वाला ।
सगुण ब्रम्ह स्वरूप वह आदर्श मनुष्य है जो उपरोक्त वर्णित गुणों का धारक है । वह
वही कार्य करता ही है जो प्रकृति प्रेरित होता है । अपनी इच्छा जनित कार्य का उसे कंचिद
परिचय ही नहीं होता । इच्छा होती ही नही है । उसका सर्वस्व प्रकृति ही होती है । इन्ही
कारणों से उसका चरित्र अनुकरणीय होता है । जो दृष्टान्त अवतार पुरुषों के उद्घृत किये
जाते है उनका अभिप्राय यह नहीं होता कि हर मनुष्य के जीवन में वही घटित होगा जो उदाहरण
दिया गया बल्कि यह कि जिस प्रकार प्रकृति और आत्मा की प्रतिक्रिया अवतार पुरुष के उदाहरण
में उद्घृत किया गया वह अनुकरणीय अंश है । इस बात को समझने के लिये एक उदाहरण दिया
जा रहा है । विगत अंकों में नारद मुनि का उदाहरण उद्घृत किया गया था । नारद मुनि की
काम पर विजय क्या थी ? प्रकृति के विस्तृत स्वरूप में फैली हुई सुंदरता में व्याप्त आकर्षण के प्रति
आत्मा की आसक्ति से रक्षा । पुन: राजा की रूपवान सुंदर कन्या के प्रति मोह क्या था
? आत्मा
की प्रकृति की रूप मोहिनी में आसक्ति । नारी के रूप के प्रति पुरुष का मोह यह एक सामन्य
प्रकृति जनित प्रक्रिया है । परंतु आत्मा को इस सामान्य प्रकृतीय प्रक्रिया से रक्षित
करना ही आत्मा की गुणवत्ता है । आत्मा जब प्रकृतीय ज्ञान साधनों से ज्ञेय ही नहीं तो
वह प्रकृतीय नियंत्रण में कैसे हो सकती है ? आत्मा को आत्मबल से ही नियंत्रित किया जा
सकता है । आत्मा जब यह अनुभूति करे कि वह ब्रम्ह का अंश है और प्रकृति उसकी उत्पत्ति
है और कर्मों को करने के लिये उसकी दासी है तभी वह अपने को ब्रम्ह स्वरूप में रख सकेगा
और ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कर्म सम्पादन प्रेरित कर सकेगा ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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