इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
कह मुनि सुन प्रभु विनती मोरी
। अस्तुति करहुँ कवन विधि तोरी ॥
महिमा अमित मोर मति थोरी । रवि सन्मुख खद्योति अजोरी ॥
ज्ञानी मुनि सुतीक्ष्ण के आश्रम पर प्रभु
श्रीराम पधारे । मुनि ने उनकी विविध प्रकार से पूजन किया । तदोपरांत उपरोक्तानुसार
विनय पूर्वक अपनी सीमित क्षमता को व्यक्त करते हुये कहते है कि हे प्रभु आप की महिमा
अनंत है । प्रभुता असीमित है । दूसरी ओर उसे व्यक्त करने के लिये मेरी बुद्धि अति सीमित
क्षमता की है । मैं अपनी सीमित बुद्धि से जो कुछ भी व्यक्त कर सकूँगा वह सूर्य को दीपक
की लौ द्वारा आरती करने के समान होगा । यही स्थिति किसी भी उस व्यक्ति की होती है जो
प्रकृति के रूप में प्रगट हुये ब्रम्ह स्वरूप और उसकी महिमा को व्यक्त करने के लिये
प्रयत्नशील होता है ।
मार्ग एक ही सूझता है प्रभु की कृपा पाने के लिये प्रभु से ही विनय। ज्ञानी मुनि
अगस्त कहते है
तुम्हरेहि भजन प्रभाव अधारी
। जानहुँ महिमा कछुक तुम्हारी ॥
ऊमरि तरु सम विशाल तव माया ।
फल ब्रम्हाँड अनेक निकाया ॥
जीव चराचर जंतु
समाना । भीतर बसहिं न
जानहिं आना ॥
सो फल भक्षक कठिन कराला ।तव भय डरत सदा सोऊ काला ॥
प्रकृति के विस्तृत स्वरूप और उसकी असीमित क्षमता को सभी ज्ञानी मुनियों ने स्वीकारा
है । गणमान्य देवता भी प्रकृति की महिमा का गुणगान करते हैं । भगवान शंकर माता पार्वती
से प्रकृति की महिमा व्यक्त करते हुये कहते हैं –
ज्ञानी मूढ न कोय जेहिं जब रघुपति करहिं जब सो तस तेहि क्षण होय ।
तपस्वी मुनि नारद का दृष्टांत विगत अंको में उद्घृत किया गया था । किस प्रकार वह
काम पर विजय किये थे । बडे गौरांवित हुये थे । पुन: राजकुमारी की सुंदरता देख किस प्रकार
और किस सीमा तक मोहित हुये थे । विदित है कि कोई भी मनुष्य प्रकृति की प्रभुता के सामने
टिक नहीं सकता । प्रकृति ही कृपावान हो तो मनुष्य सक्षम है । यह अनुभव कोई मनुष्य दूसरे
ज्ञानियों के अनुभव को सुनकर सही मान लेता है और कोई मनुष्य तो ऐसा भी होता है कि अपने
ऊपर घटित होने पर भी नहीं मानता । यह भी प्रकृति की ही महिमा का अंग होता है । ज्ञानी
मुनियों ने तो सदैव प्रकृति से प्रकृति की कृपा का ही वरदान माँगा है । कृपा भी अविरल
भक्ति की माँगते है । ऐसी भक्ति जो जीवन के प्रतिपल एक स्वरूप भक्ति के रूप में स्थिर
रहे । प्रकृति की प्रभुता स्वीकारना ही जीवन की सफलता है ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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