सोमवार, 2 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
मनुष्य शरीर की रचना में प्रयुक्त दो अवयव नामत: प्रकृति और पुरुष । दोनो की उत्पत्ति ब्रम्ह से । पुरुष ब्रम्ह का अंश । प्रकृति ब्रम्ह की रचना । पुरुष ब्रम्ह का अंश होने के कारण प्रकृति का ज्ञाता । प्रकृति गुणों की सागर । मनुष्य शरीर में पुरुष और प्रकृति की परस्पर क्रिया काल में पुरुष भोक्ता होता है प्रकृति के गुणों का । गुणों के भोग के परिणाम से पुरुष आसक्त हो जाता है । जबकि ब्रम्ह का अंश होने के कारण पुरुष का मूल स्वरूप होता है निरंकार । प्रकृति से अछूता । इस प्रकार पुरुष दोषयुक्त हो जाता है । परिणामत: पुरुष और प्रकृति के परस्पर क्रिया से जनित होने वाला कर्म दोषयुक्त हो जाता है । ब्रम्ह के कर्म संविधान की अपेक्षानुसार कर्मों की कर्ता प्रकृति निर्धारित है, परंतु आसक्त आत्मा का पोषित कर्म कर्म संविधान के प्रविधान के विपत्रीत, अर्थात आत्मा की आसक्ति के अनुरूप प्रगट होने लगते हैं ।
इस प्रकार यह विदित है कि प्रकृति की गुणयुक्त रचना और मनुष्य शरीर में प्रकृति और पुरुष के दायित्वो का आवंटन ब्रम्ह ने ऐसे विज्ञान द्वारा की है कि मनुष्य को दोष के पथ पर चलना मानो स्वाभाविक सुगम होता है । जबकि ब्रम्ह की अपेक्षा इसके विपरीत होती है अर्थात ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप कार्य सम्पादन की होती है । पुरुष को उन्ही कर्मों को पोषित करने का अधिकार है जो प्रकृति आदेशित करे ।
प्रगट है कि मनुष्य को ब्रम्ह की अपेक्षानुसार जीवन यापन के लिये सजग सज्ञान द्वारा कर्म करने चाहिये । सजग अर्थात प्रकृतीय गुणों की आसक्ति से मुक्त रहते हुये । सज्ञान अर्थात ब्रम्ह के कर्म संविधान का प्रतिपल स्मरण रखते हुये ।

  प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

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