इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
ब्रम्ह का अद्भुद विज्ञान जिसके माध्यम से उन्होने आत्मा और प्रकृति को एक में
पिरोया और फलत: शरीर बनी । पुन: वह अद्भुद विज्ञान जिसे उन्होने अपनी रचना प्रकृति
को प्रदान किया जिसके माध्यम से प्रकृति स्वयँ ब्रम्ह के अंश आत्मा को अपने गुणों द्वारा
मोहित कर लेती है । मनुष्य अस्तित्व का प्रतीक आत्मा प्रकृति के साथ सँयुक्त प्रयोजन
में अपने कर्तबव्य दायित्व के निर्वाह में पथभृष्ठ हो दोषपूर्ण कर्मों का कारण बन जाती
है । दोष निवारण के लिये भक्ति सरलतम पथ होते हुये भी आत्मा को ग्राह्य करना कठिन प्रमाणित
होता है । आत्मा प्रकृति को स्वामी रूप में स्वीकार नहीं कर पाती । इस विघटित परिस्थिति
को प्राप्त आत्मा के लिये विद्वानों ने कुछ ग्राह्य और त्याज्य कर्म बताये । त्याज्य
कर्मों की चर्चा को सतत रखते हुये तीसरा त्याज्य कर्म निम्नवत् कहा गया है –
कोई ऐसा कार्य ना करे जिससे संसार के अन्य प्राणियो को आपसे भयभीत रहना पडे । यह
सामाजिक व्यवस्था के दृष्टिकोण से प्रतिपादित किया गया है क्योंकि प्रकृति समस्त मनुष्य
समुदाय के लिये व्यापक व्यवस्था है । समुदाय के हित की दिशा में यदि कंचिद एक व्यक्ति
विषेस बाधा उत्पन्न करेगा तो प्रकृति उसे क्षमा नहीं करेगी । उपरोक्त त्याज्य कर्म
का भाग दो भी है । कहा गया कि कोई ऐसा कर्म भी ना करें जिससे आपको समाज से भयभीत रहना
पडे । मंशा यह कि प्रकृति की व्यापक व्यवस्था जो कि विस्तृत मनुष्य समुदाय पर प्रभावी
होती है उसमें सम्भावना पायी जाती है कि किसी सूक्ष्म दायरे में कोई ऐसा दोषपूर्ण कर्म
करे जो कि तत्काल चिन्हित ना किया जा सके परंतु दोषी कर्म दण्डित अवश्य किये जावेगे
इसलिये उस दोषी कर्म करने वाले को भय तो व्याप्त रहेगा ही । परिणामत: वह अन्य दोषपूर्ण
क्रियाओं को जन्म देगा । फलत: सामाजिक व्यवस्था प्रभावित होगी । इसलिये वर्जित किया
गया है ।
जब उपरोक्त वर्णित वर्जित कर्मों को त्याज्य मान प्रत्येक आम मनुष्य स्वयँ अपने
कर्मों को सही रखेगा तो निश्चय ही समाज में शांति व्यवस्था कायम रहेगी । हर मनुष्य
जीवन यापन में अपने को सुरक्षित महसूस करेगा । हर मनुष्य में व्यवस्था प्रकृति के प्रति
सम्मानजनक भाव व्याप्त होगे । प्रत्येक मनुष्य की मूल आत्मा प्रकृति के कर्तब्यों के
प्रति निष्ठावान बनेगी । प्रत्येक का कर्म ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुकूल होगा ।
उपरोक्त तृतीय त्याज्य कर्म को श्रीमद् भागवद् गीता में निम्नवत् लिखा गया –
यस्मान्नोदिवजते
लोको लोकान्नोदिवजते च य:
सतत अगले अंक में –
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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