बुधवार, 25 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

कर्म प्रधान संसार में कर्म ही आधार है समस्त सुख और दु:ख का । कर्म दोष सृजित होता है प्रकृति की व्यापक फैली हुई सुंदरता से ही । फिर भी प्रकृति को किसी भाँति दोषी नहीं ठहराया जा सकता है कर्मदोष के लिये । अधिक से अधिक प्रकृति को निमित्त कहा जा सकता है कर्म दोष के लिये । यह अद्भुद विज्ञान जिसे ब्रम्ह ने पिरोया है प्रकृति में वही विलक्षण विज्ञान ज्ञानी मुनियों को प्रकृति की वंदना के द्वारा प्रकृति की कृपा का पात्र बन कर त्रुटि से सुरक्षित रह जीवन यापन का पथ प्रशस्थ करने का निमित्त बना । भक्ति । समर्पण । कर्ता आत्मा द्वारा निमित्त प्रकृति के प्रति । विषय आत्मा द्वारा वस्तु प्रकृति के प्रति ।
गत अंकों में ज्ञानी मुनि श्रेष्ठों ने प्रकृति की वंदना के कुछ उदाहरण संदर्भित किये गये थे । आज भगवान शंकर की सगुण ब्रम्ह प्रकृति की वंदना निम्नवत उद्घृत है
जय राम रमा रमनम् समनम् । भवताप भयाकुल पाहि जनम् ॥
अवधेस  सुरेस  रमेस  विभो । सरनागत  मागत  पाहि प्रभो ॥
जन्म और मृत्यु के समय आत्मा को अपार कष्ट भोग सहन करना होता है भवताप इसी जन्म और मृत्यु काल के अपरिमित कष्ट को कहा कवि ने । इसी भवताप के भय से त्रस्त भयाकुल । भवताप का भोग का कारण सृजित होता है त्रुटिपूर्ण कर्मों के कारण । जन्म बारम्बार उन्ही त्रुटिपूर्ण कर्मों का दण्ड भोग के लिये ही होता है । इसीलिये भगवान शंकर अपनी वंदना में कहते हैं हे प्रभू मुझे अपनी शरण में लीजिये मेरी रक्षा कीजिये । यही यथार्थ भाव है भक्ति का । प्रकृति की कृपा का कवच ।
तैत्रेय उपनिषद में वर्णित संसार की रचना के पाँच स्तर (1) अन्न (2) प्राण (3) मनस (4) विज्ञान (5) आनन्द । अन्न सकल निर्जीव रचनायें, प्राण सकल वनस्पति, मनस सकल प्राणी, विज्ञान मनुष्य, आनंद दिव्य शांति । मनुष्य में विवेक है । इसलिये मनस श्रेणी से श्रेष्ठ है । आनंद दिव्य शांति की उपलब्धि सम्भव होगी त्रुटिपूर्ण कर्मों से मुक्त होने की दशा में ही । प्रकृति में आसक्ति अवनति को प्रशस्थ करता है । अवनती की श्रंखला उसे विज्ञान से मनस फिर प्राण फिर अन्न पर्यंत ले जाती है । उत्कर्ष उसे विज्ञान से पदोन्नति के रूप में आनंद की स्थिति मिलेगी । सही कर्म ही एक मात्र वाँक्षना है । त्रुटिपूर्ण कर्म पाप हैं । सही कर्म संविधान अनुरूप कर्म पुण्य हैं । पाप से पाप की वृद्धि होती है । पुण्य से पुण्य की वृद्धि होती है ।

सगुण ब्रम्ह प्रकृति अति कृपालु होती है । वह शरण में आये की पूर्ण रक्षा करती है । शरण में यदि मनुष्य का अहंकार नहीं जाने देता तो दोषी प्रकृति नहीं है ।  

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