शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

नित्य कर्ता आत्मा और आत्मा के भ्रम का श्रोत प्रकृति एक दूसरे के साथ जिस प्रकार व्यवहार करते हैं उसी का प्रगट स्वरूप होती है कर्म की गुणवत्ता । आत्मा नित्य ब्रम्ह का अंश है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । प्रकृति की समस्त रचनायें काल से ग्रसित होती है । नित्य ब्रम्ह का अंश आत्मा अज़र है अमर है । प्रकृति गुणों से युक्त है । आत्मा प्रकृति के गुणों की भोक्ता होती है । आत्मा और प्रकृति की परस्पर क्रिया के काल में उपरोक्त वर्णित सभी तथ्य प्रभावकारी भूमिका निभाते है । गुणवत्ता पूर्ण कर्म की उपलब्धि के लिये आत्मा और प्रकृति की नियंत्रित परस्पर की आवश्यकता होती है । यही अनुशाशित परस्पर की उपलब्धि के लिये पथ निर्दिष्ट किया गया योग । योग जीवन को अनुशासित बनाने का पथ है । एक सत्यनिष्ठ नागरिक के अनुशासित आचरण का पथ योग ।
मर्यादित आचरण उत्थान का पथ है । गुणवत्तापूर्ण कर्म ही सर्वोच्च उपलब्धि है । कर्म की गुणवत्ता नित्य आत्मा और प्रकृति की नियंत्रित अनुशासित परस्पर द्वारा ही उपलब्ध होगी । आत्मा यदि प्रकृति के गुणों के मोंह से ग्रसित रहेगा तो कर्म की गुणवत्ता का नाश होना ही होना है । आत्मा अलौकिक ब्रम्ह का अंश है । प्रकृतीय शरीर को उपलब्ध ज्ञानेंद्रियों से जाना नहीं जा सकता । इसपर जो भी अनुशासन आरोपित करना लक्ष्य किया जाना है उसे प्रकृतीय शरीर के द्वारा ही उपलब्ध करना है । प्रकृतीय शरीर के समस्त अंगों में मस्तिष्क ही सर्वाधिक संवेदनशील विज्ञान्युक्त सक्षम अंग है । इसके अनुशासन के माध्यम से उपलब्धि लक्षित की जाती है अलौकिक आत्मा के अनुशासित आचरण की । योग ।

  अनुशासित मस्तिष्क ही योग का लक्ष्य है । अनुशासित मस्तिष्क द्वारा सम्पादित कर्म ही त्रुटिरहित कर्म होंगे । गुणवत्तापूर्ण कर्म ही उत्थान है । कर्म का स्वरूप नित्य आत्मा और अनित्य प्रकृति की परस्पर का प्रगट रूप है । अनुशासित व नियंत्रित परस्पर ही कर्म की  गुणवत्ता का आधार है ।    

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

 इस संसार की रचना प्रकृति और पुरुष के सन्योग से हुई है । इसके कण कण में प्रकृति और पुरुष दोनो ही विद्यमान हैं । प्रकृति जितना सब कुछ संसार में है सब प्रकृति है । पुरुष ब्रम्ह का अंश है । दोनो के सन्योग से ही समस्त रचना है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । पुरुष ब्रम्ह का अंश होने के कारण प्रकृति का ज्ञाता है । प्रकृति का ज्ञाता होने के बावज़ूद भी पुरुष प्रकृति के गुणों से मोहित होता है । यह प्रकृति की क्रिया शैली की महिमा है ।
परंतु प्रकृतीय रचना मस्तिष्क की एक विषेस दशा योग में मस्तिष्क को स्थिर कर जो व्यक्ति अपने समस्त कार्यों को करने का अभ्यास करता है उसे एक अति विशिष्ट स्थिति उपलब्ध होती है । इस स्थिति के अंतर्गत उसे जहाँ प्रकृतीय गुणों के प्रति मोह से मुक्ति मिलती है वहीं उसे प्रतिपल ब्रम्ह के अंश स्वरूप आत्मा की अपने अंदर उपस्थिति का बोध अनवरत बना रहता है । जिस प्रकार एक शेर का नवजात शिशु भी शेर की प्रभुता के बोध से प्रतिपल गर्भित रहता है और जंगल के अन्य प्राणियों से परस्पर नहीं करता । जिस प्रकार एक राजा की संतान राजा की प्रभुता के बोध को संजोये अपने को राजकीय गरिमा के अनुकूल रखता है । उसी प्रकार सर्वभौम सर्वशक्तिमान ब्रम्ह का अंश आत्मा की अनुभूति प्रतिपल जब जिस मनुष्य के मस्तिष्क में बनी रहेगी तो वह मनुष्य प्रकृति और उसके गुणों के प्रति स्वत: दूर रहेगा । प्रकृतीय गुणों का मोह उसके लिये सहज़ त्याज्य हो जावेगा ।

प्रतिपल अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह के अंश आत्मा की अनुभूति मस्तिष्क में स्थिर रखने वाले व्यक्ति की दशा को व्यक्त किया जावेगा उसे ब्रम्हानंद में बताकर । ब्रम्हानंद में लीन रहने वाले व्यक्ति की प्रकृतीय गुणों के प्रति सहज़ विरक्ति हो जावेगी । योगावस्था में समस्त कार्यों को करने का अभ्यास की उपलब्धि होगी ब्रम्हानंद । हर प्रत्येक व्यक्ति इसे पा सकता है । 

बुधवार, 29 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

श्रीमद् भागवद गीता में ग्रंथ के अज्ञात ग्रंथकार विद्वान ने योगेश्वर श्रीकृष्ण के द्वारा बताये गये ज्ञान को जिस प्रकार प्रस्तुत किया है उसमें सर्वाधिक महत्व दिया है मस्तिष्क की शांत दशा को । शांत मस्तिष्क ही सर्वाधिक क्षमतायुक्त स्थिति होती है गुणवत्तायुक्त कर्म सम्पादन के लिये । शांत मस्तिष्क ही योग की अवस्था हासिल कर सकता है । योग की स्थिति में किये गये कर्म ही सर्वाधिक गुणवत्तायुक्त होते हैं ।
मस्तिष्क की अशांत स्थिति पैदा होती है इच्छाओं से । इच्छा की पूर्ति के निमित्त मस्तिष्क अनेकानेक सम्भावित उपाय उपस्थित करता है । उन्ही विकल्पों में से चुनाव करने में मस्तिष्क व्यस्त हो जाता है । विकल्पों का जन्म मस्तिष्क की रचनागत गुण के कारण होता है । उनमें से चुनाव मनुष्य का अपना स्वभाव होता है । यह दोनों प्रक्रिया मस्तिष्क की अशांति का स्वरूप हैं । जैसा मस्तिष्क में इच्छा का स्वरूप रहेगा उसी की पूर्ति के अनुरूप विकल्प को मस्तिष्क चुनेगा अपनाने के लिये । जब मस्तिष्क में कोई अपना चुनाव व्याप्त हो जावेगा क्रिया रूप में सम्पादन के लिये तो कंचिद योग की मस्तिष्क की स्थिति असम्भव हो जावेगी । योग की अपेक्षा होती है कर्म के परिणाम से प्रभावित ना होने वाला मस्तिष्क । इच्छा और उसकी पूर्ति के लिये मस्तिष्क में अपना चुना हुआ पथ पहले से विद्यमान होने की दशा में योग की स्थिति असम्भव है ।
शांत मस्तिष्क उपस्थित किये गये विकल्पों में से चुनाव की प्रक्रिया में सम्मलित नहीं होता अपितु प्रतीक्षा करता है प्रकृति के स्पष्ट आदेश का । विकल्प प्रस्तुत करना तो मस्तिष्क का रचनागत स्वभाव होता है । परंतु उन प्रस्तुत किये गये विकल्पों में से चुनाव कर अपनाने की प्रक्रिया तो अपने वश की होती है । योगेश्वर श्रीकृष्ण इसी प्रक्रिया में ना सम्मलित होने को अपेक्षित बताते हैं ।

शांत मस्तिष्क द्वारा ही गुणवत्तापूर्ण कर्म सम्भव होते हैं । कर्म की गुणवत्ता का पतन सदैव कर्म करने वाले व्यक्ति के स्वयं अपने मस्तिष्क की अशांति द्वारा ही होता हैं । मनुष्य के द्वारा किये जा रहे समस्त कर्मों का संचालन केंद्र मस्तिष्क ही होता है इसलिये मस्तिष्क की यथास्थिति का कर्म की गुणवत्ता से सीधा सम्बंध होता है । कर्म की गुणवत्ता ही इस कर्म प्रधान संसार की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि है । गुणवत्तापूर्ण कर्म के लिये शांत मस्तिष्क अनिवार्य दशा है । कर्म के प्रति निष्ठावान ।

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

इस संसार के समस्त जीव एवँ निर्जीव का निर्माण प्रकृति और पुरुष के सन्योग से सम्भव हुई है । प्रकृति और पुरुष दोनो ही अनंत काल से विद्यमान हैं । इस संसार में जितने भी कर्म हो रहे हैं उनकी कर्ता प्रकृति है । रचना एवँ कर्म के उपरोक्त तथ्य को जो भी मनुष्य अपने मस्तिष्क में भली भाँति ग्रहण करता है वह इस संसार के सत्य का ज्ञाता होता है । सत्य के ज्ञाता के मस्तिष्क में योग की दशा सुलभ होती है । योग की मस्तिष्क की दशा में अपने समस्त कर्मों को करने वाला व्यक्ति परम आनंद की स्थिति भोग करता है 

सोमवार, 27 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य करने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया । मस्तिष्क की योग की अवस्था पाने के लिये बताया कि प्रकृति के कर्ता स्वरूप को हृदयस्थ किया जाय । प्रकृति कर्ता है । इसलिये प्रकृति द्वारा आदेशित कार्यों को ही किया जाय । प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म का सज्ञान कैसे सम्भव होगा इसके लिये उपाय सुझाया कि अपनी इच्छाओं के लिये परीक्षित कर शोध द्वारा । इस कथन का अभिप्राय यह है कि जो भी कर्म करने के लिये चुना जाय उसे परीक्षित कर देखा जाय कि कंचिद वह किसी अव्यक्त इच्छा के निमित्त तो नहीं है । इच्छा की पूर्ति का कर्म पाये जाने पर उसे त्यागा जाय । यदि यह पाया जाय कि वह किसी इच्छा की पूर्ति के निमित्त नहीं है उसी दशा में उसे किया जाय । दूसरे उपाय के रूप में यह सुझाया गया कि अपने इर्द गिर्द की स्थिति को अति संवेदनशील मस्तिष्क द्वारा परीक्षित करते रहा जाय । प्रकृति की अपेक्षा परिलक्षित होगी । प्रकृति आपसे क्या कर्म कराना चाह रही है प्रगट होगा । आपसे अपेक्षित कर्म के लिये वह परिवेश सृजित करती है । उस अपेक्षित कर्म के लिये आपको प्रेरित करने हेतु प्रकृति उपाय उपस्थित करेगी । आपके कर्म को करने के लिये प्रकृति आपको साधन भी देगी । परंतु यह सभी स्थितियाँ अनुभूति करने के लिये अनिवार्य होगा आपका मस्तिष्क अपनी इच्छा से मुक्त दशा में होना । प्रारम्भिक अवस्था में यह अनुभव थोडा मुश्किल प्रतीत होगा । परंतु अभ्यास इस मुश्किल को सुगम बना देगा । प्रकृति की अपेक्षा का कार्य करने में मस्तिष्क शांत एकाग्र कार्य को कार्य की अपेक्षानुसार करने में संलग्न रहेगा । कार्य का परिणाम कंचिद किसी महत्व का रहेगा ही नहीं । इसके विपरीत इच्छा की पूर्ति के निमित्त किये जा रहे कर्म के कर्म सम्पादन काल में मस्तिष्क में सतत कार्य के परिणाम की व्यग्रता विद्यमान रहती है । मस्तिष्क सतत अशांत रहता है ।

योगावस्था में कार्य करना पर्याय होता है शांत मस्तिष्क की दशा । कर्म करने के लिये शांत मस्तिष्क ही आदर्श होता है । कार्य कितना भी किया जाय । कितनी भी काल अवधि तक किया जाय । श्रमकारक नहीं होगा यदि कार्य करने के समय मस्तिष्क शांत दशा में रहे । अशांत मस्तिष्क ही थकान पैदा करता है । मस्तिष्क की व्यग्र स्थिति थकान पैदा करती है । कार्य भी त्रुटिपूण होता है । मस्तिष्क की कार्य काल में शांत दशा के लिये कर्म का सही चुनाव अति आवश्यक होता है । प्रकृति की अपेक्षानुसार प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म को करने में कार्य करने के समय शांत दशा में रहेगा । इसके विपरीत इच्छा जनित कर्म को करने में कर्म करने की अवधि में मस्तिष्क अशांत व्यग्र रहेगा । कर्म की गुणवत्ता कार्य करने के काल में मस्तिष्क की शांत अथवा अशांत दशा पर निर्भर होती है । कर्म करने के लिये सही कर्म का चुनाव अति महत्वपूर्ण होता है ।     

रविवार, 26 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

कर्म करते हुये कर्म की त्रुटियों से बचते हुये त्रुटिरहित कर्म करने की विधा के रूप में मस्तिष्क की योग की अवस्था में कर्म करने के अभ्यास की सफलता पूर्णरूप से निर्भर करती है मस्तिष्क द्वारा प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण करने में । प्रकृति निर्मित मनुष्य की शरीर जो कि माध्यम होती है समस्त कर्म सम्पादन के लिये पूर्णरूप से प्रकृति की अपेक्षानुसार कर्म सम्पादन के लिये तत्पर होती है । परंतु इसके बावज़ूद कर्म दोषपूर्ण होते है । दोष का कारण प्रत्येकदशा में उत्पन्न होता है मस्तिष्क में व्याप्त इच्छाओं के कारण । इन्ही दोष के निमित्त के निवारण के लिये विद्वान महात्माओं ने सुझाया योग । योग मस्तिष्क की वह अवस्था है जिसमें उस पर कर्म के परिणाम से प्रभाव नहीं पडता । परिणाम का सीधा सम्बंध इच्छाओं से होता है । इसलिये विद्वानों ने निदान सुझाया कर्म के परिणाम से परीक्षित करने के लिये । कर्म करते हुये इच्छाये प्रगट नहीं रहती । मस्तिष्क में विद्यमान रहते हुये भी चिन्हित होने योग्य स्थिति में नहीं रहती । कर्म के निमित्त के रूप में समायी रहती हैं । इसलिये इनके परीक्षण के लिये कर्म के परिणाम के साथ विधि सुझाई गई । यदि कर्म के परिणाम से मस्तिष्क प्रभावित नहीं हुआ तो निष्चय है कि कर्म करने का निमित्त इच्छाये नहीं थी । यदि इच्छा जनित कर्म किया जावेगा तो मस्तिष्क को कर्म के परिणाम से प्रभावित ना होने की दशा सम्भव ही नहीं हो सकती । मस्तिष्क कर्म के परिणाम से प्रभावित अवश्य होगा ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण का सुझाव मात्र योग बताने तक ही सीमित नहीं था । मस्तिष्क की योग की दशा पाने के लिये पथ भी बताया । पथ बताते हुये उन्होने कहा कि
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥

संसार में जो भी कर्म हो रहे हैं उनकी कर्ता प्रकृति है । यही कथन यदि मस्तिष्क धारण कर सके तो उस मस्तिष्क में योग की अवस्था स्थायी निवास कर लेगी । प्रकृति निर्मित शरीर में प्रकृति व्यवस्था ने वह समस्त विज्ञान इसके निर्माण काल में पिरो दिया है कि व्यापक विस्तृत प्रकृति अपने आदेशों का संचार इस शरीर में प्रतिपल प्रेषित करती है और शरीर उसे ग्रहण भी करती है । इसके लिये किसी मनुष्य को कोई भी अलग से प्रयत्न करने की कोई अपेक्षा होती ही नहीं । प्रकृति के आदेशों का यथा आदेश क्रियांवन यदि शरीर सम्पादित कर दे तो कोई कर्म दोष होगा ही नहीं । कर्म दोष का जन्म होता है मस्तिष्क में उपस्थित इच्छा द्वारा । इच्छा ही उपेक्षा कराती है प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म करने के प्रति । इच्छाओं का जन्म होता है भोग की आसक्ति से । प्रकृतीय गुणों का भोग । स्वादिष्ट व्यंजन । उन्मादकारक परिवेष । मधुर संगीत । मोहक दृष्य । इन सभी भोगों की इच्छा । इन्हे पाने की कामना । इनके स्वामित्व की अभिलाषा । मस्तिष्क में इन्ही भोगो के प्रति उठने वाले तूफान उपेक्षा कराते है प्रकृतीय आदेशों का । यह मनुष्य शरीर में जन्म प्रकृति के गुणों के भोग के निमित्त नहीं हुआ है । प्रकृति ने अपने किसी कार्य विषेस को कराने के लिये यह मनुष्य शरीर में जन्म दिया है । इस मनुष्य शरीर में जन्में प्रत्येक के लिये जन्म देने वाली प्रकृति के प्रति निष्ठावान रहते उसके आदेशानुसार कर्म करना ही धर्म है । इस विचार को पोषित करना है तो मस्तिष्क के योग की दशा में रखते हुये कर्म का अभ्यास बनाना ही एकमात्र सरलतम विधि है । योग की अवस्था अपनी निधि बनाना है तो मस्तिष्क की समस्त शक्ति से प्रकृति के कर्तारूप को ग्रहण करने का प्रयास किया जाय । 

शनिवार, 25 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

इस प्रकृति निर्मित मनुष्य की शरीर की रचना की सहज प्रवृत्ति प्रकृति के आदेशों को ग्रहण करने एवं तदनुसार क्रियांवन प्रेरित करने की होती है । विडम्बना यह कि कर्म सम्पादन इसके अपने वश में नहीं होता । नित्यकर्ता आत्मा के सम्मलित हुये बिना कर्म सम्भव नहीं होता । आत्मा ही प्रकृतीय गुणों की भोक्ता होती है । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति आत्मा में जनित होती है । आसक्त आत्मा का कर्म क्रियांवन दोषपूर्ण होता है । विडम्बना का चर्मोत्कर्ष यह कि आत्मा प्रकृति के नियंत्रण में नहीं होती । आत्मा की आसक्ति के कारण जनित दोषों का निवारण प्रयत्न किया जाता है अनुशासित प्रकृति के माध्यम से । मस्तिष्क प्रकृतीय रचना का सबसे संवेदनशील, विज्ञानयुक्त, सक्षम अंग होता है । इन्ही कारणों से धर्मदर्शन में सर्वाधिक महत्व मस्तिष्क की कार्य दक्षता को विकसित करने के उद्देष्य से समस्त सुझाव दिये गये है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण नें जो बताया कि
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
कर्ता तो प्रकृति हैं परंतु रचनागत विडम्बना जैसा कि उपरोक्त प्रस्तर में व्यक्त किया गया है कि आसक्त आत्मा प्रकृति के इस कर्ता स्वरूप को स्वीकारता नहीं । प्रकृति निर्मित शरीर जिसकी सहज़ प्रवृत्ति प्रकृति के आदेश ग्रहण करने एवं तद्नुसार कर्म प्रेरित करने की है वह स्वच्छंद ऐसा कर नहीं सकती । कारण कर्मों का नित्यकर्ता आत्मा अपनी आसक्ति के कारणों प्रकृति के क्रियांवन आसेशों की उपेक्षा के लिये कटिबद्ध होता है । इसी कारण उपरोक्त श्लोक के उत्तरार्ध में कहा कि य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति जो आत्मा ऐसा देखती है वह मानों कर्ता को देख रही होती है । परंतु आसक्त आत्मा ऐसा नहीं देखती । आसक्त आत्मा को तो चाहिये आसक्ति की पूर्ति । गुणों का भोग । वह यदि प्रकृति के कर्ता स्वरूप को स्वीकारे तो उसका भोग भाव कैसे पूर्ण होगा । प्रकृति तो आत्मा को अपने गुणों का भोग करने हेतु कर्म पोषण का तो आदेश देगी नहीं । इस प्रकार प्रकृति अपने को असहाय और आत्मा अपने को असहाय । प्रकृति को चाहिये ब्रम्ह के द्वारा आदेशित कार्यों का पालन । आत्मा को चाहिये अपने आसक्ति की पूर्ति । प्रकृतीय गुणों का भोग । स्वादिष्ट व्यंजन का भोग । मधुर संगीत का श्रवण । लुभावने मनमोहक दृष्यों को देखना । मादक वातावरण में जीवन यापन । इसलिये आत्मा प्रकृति के कर्तापन को कैसे स्वीकारे । उसे त्यागना पडेगा अपने भोगों को । वह आत्मा त्यागेगी नहीं । उसे चाहिये ही चाहिये । यह यथास्थिति हर प्रत्येक मनुष्य में एक ही स्वरूप में विद्यमान है । इसी स्थिति के विद्यमान होने के कारण हमारे समस्त दोष है । दोष हैं तो दु:ख उनकी छाया के रूप में है । निवारण का उपाय एक ही है । प्रकृति के कर्ता स्वरूप को स्वीकारना । प्रकृति के कर्ता स्वरूप को जो आत्मा स्वीकरेगी उस आत्मा का कर्म पोषण दोषमुक्त होगा ।
प्रकृति के कर्ता स्वरूप को स्वीकारना ही मस्तिष्क की योग की अवस्था है । मस्तिष्क की वह अवस्था जिसपर कार्य के परिणाम का प्रभाव नहीं पडेगा । कार्य की कर्ता प्रकृति है का प्रगट व्यव्हारिक स्वरूप योगावस्था । योगावस्था में किये गये कार्य पाप और पुण्य सृजित करने वाले नहीं होते । योगावस्था में किये गये कार्य प्रकृति के कर्ता स्वरूप के तारतम्य में होते है । इसलिये पाप और पुण्य सृजित करने वाले कर्मों की श्रेणी के नहीं होते । स्वामी प्रकृति के आदेशों का पालन सेवक आत्मा का धर्म है इसलिये कर्मदोष से मुक्त होता है \

प्रकृति के कर्ता स्वरूप को स्वीकारना । योग की मस्तिष्क की दशा में कार्य करना । दोनो एक दूसरे के पर्याय हैं । प्रकृति का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना ही मस्तिष्क की योगावस्था है । योगावस्था लक्ष्य करने पर प्रकृति का कर्ता स्वरूप धारण करना प्रथम प्रयत्न है । प्रकृति का कर्ता स्वरूप की ग्राह्यता ही उपलब्धि है योगावस्था । 

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में -
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
प्रकृति का कर्ता स्वरूप । प्रकृति का कर्म करने का विज्ञान । घटनायें परिस्थितियाँ किस प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क को प्रभावित करती है । घटनाओं और परिस्थितियों से प्रभावित मस्तिष्क द्वारा प्रेरित कर्म की गुणवत्ता किस स्तर की होती है यह महत्वपूर्ण अंग होता है प्रकृति के कर्म करने के विज्ञान का । एक ही घटना अलग अलग व्यक्तियों के मस्तिष्क पर अलग अलग प्रभाव सृजित करती है । उदाहरण के लिये एक क्षात्र अपने परीक्षा के परिणाम घोषित होने पर प्रथम स्थान पाता है । इस परीक्षा के परिणाम से उस क्षात्र के मस्तिष्क में एक विशिष्ट उपलब्धि का गर्व युक्त हर्ष भाव सृजित होगा । उसके अभिभावको के मस्तिष्क में कुशल दायित्व संचालन का गर्व युक्त भाव सृजित होगा । उसके प्रतिद्वंदी क्षात्र के मस्तिष्क में स्पर्धा की ईर्ष्या का भाव सृजित होगा । उसके अनन्य मित्र क्षात्रो के मन में हर्ष का उल्लास भव सृजित होगा । परिणाम एक ही है परंतु अलग अलग सम्बंधित व्यक्तियों के मस्तिष्क पर अलग अलग प्रभाव प्रगट होता है । मस्तिष्क पर जनित हुये अलग अलग प्रभाव के परिणाम स्वरूप प्रत्येक अलग व्यक्ति जो प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा वह भिन्न होगी । प्रत्येक प्रतिक्रिया की गुणवत्ता भिन्न होगी । समस्त भिन्नता अर्थात प्रत्येक मस्तिष्क पर जनित हुये भिन्न प्रभाव तथा प्रत्येक प्रतिक्रिया में व्यक्त भिन्न गुणवत्ता प्रकृति के प्रभाव से सृजित हुई । इसी भिन्नता के कारण कलह भी पैदा हो सकता है और सद्भाव भी पैदा हो सकता है । प्रकृति दोनों ही स्थिति उत्पन्न करने में समर्थ होती है ।

समाज में संत भी पैदा होते हैं । समाज में राक्षस भी पैदा होते हैं । प्रकृति ही संत की भी जननी है । प्रकृति ही राक्षस की भी जननी है । प्रकृति किस स्थान पर किस काल में किस परिस्थिति को आगे बढायेगी और किस परिस्थिति को शमन कर बिफल करेगी यह मनुष्य के नियंत्रण में कंचिद नहीं होता । प्रकृति का कार्य करने का विज्ञान इतना पुष्ट होता है कि वह प्रत्येक से वह कार्य करा ही लेगी जो कि उसे कराना है । मनुष्य की इच्छा का महत्व नहीं होता । कर्ता प्रकृति होती है । अवसर विषेस पर वह कर्तापन का श्रेय किसी व्यक्ति विषेस को देती रहती है । प्रकृति ही किसी को सम्मानित स्थिति भी देती है । प्रकृति ही किसी को किसी काल पराजय की हीनता भी भोग कराती है । यही सम्मान और पराजय की हीनता उस व्यक्ति के लिये सुख और द:ख का निमित्त बनती है । इस प्रकार सृजित होने वाले सुख और दु:ख की त्रास कारक स्थितियों में उस मनुष्य का दोष मात्र यह होता है कि वह प्रकृति के कर्ता स्वरूप से अचेत होता है । प्रकृति के कर्ता स्वरूप की चेतना की दशा में वही मनुष्य ना ही सम्मान पाने पर हर्ष करेगा और ना ही पराजय सम्मुख होने पर हीनता से दु:खी होगा । कर्ता प्रकृति है । यदि उपलब्धि का सम्मान सम्मुख हुआ है तो भी प्रकृति की महिमा है । यदि पराजय की हीनता भी सम्मुख हुआ है तो भी प्रकृति की महिमा है । प्रकृति प्रधान अस्तित्व है । मनुष्य मात्र प्रकृति की व्यापक व्यवस्था का एक सूक्ष्म अवयव है । व्यापक व्यवस्था कर्मों की कर्ता है । यथा स्थान यथा काल प्रकृतीय अपेक्षानुसार कर्तब्य संचालन ही मनुष्य का दायरा है और कर्तब्य की सीमा है । मनुष्य कर्म के फल के लिये कंचिद कोई योगदान नहीं कर सकता । व्यापक व्यवस्था प्रकृति के कर्मों का विस्तार भी व्यापक होता है । प्रकृति का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना ही उपलब्धि होगी ।   

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में -
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
प्रकृति का कर्ता स्वरूप । नवजात शिशु अपने जननी माँ के प्रति जिस आश्रय भाव को समाहित कर उसके प्रति आशांवित रहता है उसका यह भाव उसे प्रकृति की देन होती है । प्रकृति यह भाव उस अबोध शिशु के मस्तिष्क में किस प्रकार उत्पन्न करती है यह प्रकृति का विज्ञान है । माँ अपने जन्माये शिशु के प्रति जो वात्सल्य प्रेम हृदय में संजोये उसकी सेवा व सुरक्षा करती है उसके लिये समाज ने उसे अलग से कोई प्रशिक्षण नहीं दिया होता है । यह प्रकृति की देन उस माँ को मिली है । प्रकृति ने इसे कैसे दिया यह प्रकृति का विज्ञान होता है । यह माँ का वात्सल्य स्वजन्में शिशु के प्रति किसी वर्ग विषेस अथवा किसी देश विषेस में एकाकी रूप से नहीं होता । यह पूरे मनुष्य समाज में एक ही रूप में पाया जाता है । मात्र मनुष्य ही इसकी सीमा नहीं है । समूचे जीव वर्ग में यह वात्सल्य होता है । यह होता है व्यापक प्रकृति के कर्तापन का स्वरूप ।
विजातीय लिंग के प्रति आकर्षण मोह । स्त्री के प्रति पुरुष का आकर्षण । पुरुष के प्रति स्त्री का आकर्षण । इसके लिये किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती । यह प्रकृति कैसे उत्पन्न करती है स्त्री और पुरुष के मस्तिष्क में यह प्रकृति का विज्ञान है । होता प्रत्येक वर्ग समुदाय और देश में है । मात्र मनुष्य ही नहीं समूचे पशु पक्षी में भी देखा जाता है । यह व्यापक प्रकृति की देन होती है । यह व्यापक प्रकृति के कर्ता स्वरूप का परिचायक है ।
पशु पक्षी व मनुष्य उभयनिष्ठ रूप से अनेको ऐसे कर्म परिचय विदित करते है जिनसे प्रकृति का कर्ता स्वरूप स्पष्ट दृष्टिगत होता है । पालतु पशु अपने पालने वाले जिससे उन्हे आहार व अन्य पोषण प्राप्त होता है के प्रति जिस आशांवित निष्ठा से आचरण करते है वह उन्हे किसी प्रशिक्षण द्वारा नहीं दी गई होती है । यह प्रकृति ने उन्हे दिया होता है । प्रकृति अपने कर्मों को विलक्षण विज्ञान के द्वारा करती है । यह प्रकृति के कर्ता स्वरूप की अद्भुद कार्य शैली है ।
जल समुद्र से वाष्प बन आकाश में समा जाता है । आकाश विस्तृत हो फैल कर समस्त भू-मण्डल पर वर्षा करता है । यह समस्त प्रक्रिया मनुष्य का कौन सा सन्यंत्र करता है । कौन सी व्यापारिक कम्पनी करती है । किस देश का शासनतंत्र इसे नियंत्रित करता है । यह व्यापक प्रकृति का विस्तृत कर्ता स्वरूप का परिचायक है ।
नवजात शिशु अवस्थाओं से गुज़रते नवयुवक फिर प्रौढ फिर वृद्ध अवस्था पर्यंत की स्थितियों को प्राप्त करता है । समूचे मनुष्य समुदाय में कौन सी संस्था अथवा वर्ग अथवा शासनतंत्र इसे सम्पादित कर रहा है । यह प्रकृति की कर्ता सामर्थ्य का परिणाम होता है ।

इन उदाहरणों की गणना अपरिमित है । समस्त संसार में जो कुछ भी हो रहा है सब कुछ प्रकृति ही कर रही है । मनुष्य का कर्म है उसका अहंकार जिसका कोई अस्तित्व है ही नहीं । मात्र मनुष्य का दम्भ है । मनुष्य अपने अहंकार के भ्रम में मात्र चेष्टा करता है अपनी प्रकृतीय आसक्तियों की कामना और उन कामनाओं की पूर्ति हेतु । यह प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । इसलिये ब्रम्ह की सुंदरता से युक्त है । ब्रम्ह की व्यवस्था है । इसलिये समस्त कर्मों की कर्ता है । प्रकृति ब्रम्ह के प्रति निष्ठावान है । इसलिये अनुशासन इसका प्रधान लक्ष्य है । ब्रम्ह की आज्ञाकारी है । इसलिये न्याय इसका आधार है ।  

बुधवार, 22 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में -
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
योगेश्वर श्रीकृष्ण का उपरोक्त कथन कि प्रत्येक कर्म की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति के कर्तापन का स्वरूप मस्तिष्क में स्थिर करने के उद्देष्य से कुछ एक उदाहरणों का ध्यान निवेदित है । गर्भ में पलने वाले शिशु को जीवन शक्ति कहाँ से उसे प्राप्त होती है । मनुष्य की कौन सी व्यवस्था है जो उस गर्भ में पल रहे जीव को पोषण प्रदान करती है । यह प्रकृति है जो उसे जीवन शक्ति प्रदान करती है । यह प्रकृति का कर्तापन है जो अपने अद्भुद विज्ञान द्वारा यह कृत सम्भव करता है । शून्य से भी कम के तापमानों के स्थानों पर कार्य करने वाले और जीवन यापन करने वाले मनुष्य तथा समुंद्र के अंदर नाविक के रूप में जीवन यापन करने वाले और कर्म सम्पादन करने वाले मनुष्य की परिस्थितियाँ कितनी भिन्न होते हुये भी उनके जीवन यापन और दायित्व कर्म के सम्पादन में एकरूपता की क्षमता उन्हे मनुष्य के किस व्यवस्था से प्राप्त होती है । यह प्रकृति के कर्ता स्वरूप का प्रत्यक्ष स्वरूप है जिसके द्वारा उपरोक्त भिन्नता की परिस्थितियों के होते हुये भी कर्म सम्भव होते हैं । कोई एक विचार किसी एक समय समूचे देश के मनुष्य समुदाय को एक ही रूप में ग्राह्य हो जाते है । कभी एक ही परिवार में प्रिय जनों में भी मत भेद विद्यमान पाये जाते है । यह प्रकृति के कर्तापन का प्रगट रूप प्रतीक है । प्रकृति यह समस्त कैसे करती है यह उसका अपना विज्ञान है । यह प्रकृति का विज्ञान ही है कि प्रत्येक मनुष्य कर्म को करता है तभी जब उस कर्म को करने का कारण वह अपने इच्छा को पाता है । प्रकृति के कर्ता स्वरूप को चिन्हित करने तथा प्रकृति के कर्म करने के विज्ञान की पहचान सृजित होने की दशा में मनुष्य अपने अहंकार की पहचान सरलता से कर सकता है । मनुष्य का अहंकार मात्र एक भ्रामक अनुभूति होती है । सत्य प्रकृति का कर्ता स्वरूप है । प्रकृति किसि काल किसी मनुष्य को किसी कर्म विषेस के लिये किसी निमित्त विषेस के लिये कर्ता रूप प्रदान करती है । यह स्वरूप मनुष्य के लिये स्थायी नहीं होता । वही कर्म एक मनुष्य एक अवसर पर सम्पादित कर अपने में कर्ता का अहंकार पोषित करता है । दूसरे अवसर पर वही मनुष्य उसी कर्म में असफल भी होता है । असफलता की दशा में उसका कर्तापन का अहंकार कहाँ लुप्त हो गया । यह प्रकृति है कि वह किसे कब किस रूप में प्रस्तुत करती है । यह स्वरूप है प्रकृति के कर्ता पन का । प्रकृति एक व्यवस्था है । इसका प्रत्येक प्रगट स्वरूप किसी माध्यम से ही होगा सदैव । माध्यम अपने को कर्ता मान बैठता है । यही भम होता है ।
प्रकृति का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होने की दशा में मस्तिष्क की योग की अवस्था सुगम हो जाती है । मनुष्य के मस्तिष्क द्वारा प्रकृति को कर्ता रूप में स्वीकार करने की दशा ही स्थापना है योगावस्था की । योग की अवस्था जिसमें मस्तिष्क कार्य के परिणाम से प्रभावित नहीं होगा । प्रकृति कर्ता है की मस्तिष्क में ग्राह्यता ही मस्तिष्क में स्वरूप सृजित करेगा जिसमें कार्य ही कार्य करने की निमित्त बन सकेगा । प्रकृति कर्ता है की मस्तिष्क में ग्राह्यता ही मस्तिष्क में स्वरूप सृजित करेगा जिसके परिणाम से कार्य सम्पादन काल में मस्तिष्क में उत्पन्न होगा कार्य के परिणाम के प्रति सन्यास भाव । यह प्रत्येक मस्तिष्क की दशाये मस्तिष्क के विचारों द्वारा ही सम्भव होती हैं । मस्तिष्क के विचार ही श्रोत होते हैं मस्तिष्क के संचालन के । योग्य विचार उत्थान कराते है । कलुषित विचार पतन प्रशस्थ करते है । कर्म सम्पादन का नियंत्रण मस्तिष्क करता है । इसलिये मस्तिष्क की कार्यकाल में दशा ही कार्य की गुणवत्ता के रूप में प्रगट होती है । योग की मस्तिष्क की दशा उत्थान का प्रेरक होता है । कर्म की गुणवत्ता का उत्कर्ष । गुणवत्ता युक्त कर्म प्रशस्थ करेगे शांत कलहरहित जीवन की प्राप्ति को । योग की मस्तिष्क की दशा पाने का श्रोत है प्रकृति के कर्ता स्वरूप की मस्तिष्क में ग्राह्यता ।

इस कर्म प्रधान संसार में कर्म की गुणवत्ता ही एकमात्र आधार है शांत और अशांत जीवन का । इच्छा जनित कार्यों का पोषण अशांति प्रशस्थ करने वाला है । मस्तिष्क की योग की अवस्था में कर्म सम्पादन जीवन में शांति प्रशस्थ करने का पथ है । मस्तिष्क में योग की दशा उत्पन्न करने का सरलतम उपाय है प्रकृति के कर्ता स्वरूप की मस्तिष्क में ग्राह्यता ।   

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

योगेश्वर श्री कृष्ण ने बताया
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
जो भी कर्म क्रिया रूप में सम्पन्न हो रहा है उसकी कर्ता प्रकृति है । जो व्यक्ति क्रिया के इस रूप को देखता है वह कर्ता को देखता है ।
प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था है । व्यवस्था इस संसार के संचालन के निमित्त । व्यवस्था इस संसार के स्वरूप के निमित्त । व्यवस्था इस संसार के प्रगति के निमित्त । व्यवस्था इस संसार के सामाजिक स्वरूप के प्रति । व्यवस्था इस संसार के स्थायित्व के निमित्त । प्रकृतीय व्यवस्था का स्वरूप भाववाचक है । इस प्रकृतीय व्यवस्था का आधार न्याय है । यह  प्रकृतीय व्यवस्था ब्रम्ह की आज्ञाकारी है । प्रकृतीय व्यवस्था ब्रम्ह के प्रति निष्ठावान है । मनुष्य प्रकृतीय व्यवस्था का एक सूक्ष्म कार्यकारी घटक है ।
प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । प्रकृति ब्रम्ह का प्रगट स्वरूप है । प्रकृति गुणयुक्त है । प्रकृति समस्त गतिविधियों की संचालक है । प्रकृति समस्त गतिविधियों की नियंत्रक है । प्रकृति के स्वरूप की धारणा मस्तिष्क में ग्राह्य होने पर ही इसकी क्रिया सम्पादन क्षमता इसका कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना सम्भव होगा ।
जिस प्रकार प्रजातंत्र में प्रजातंत्रीय व्यवस्था कार्य करती है । प्रजातंत्र में जीवन यापन करने वाला मनुष्य महत्व का नहीं होता । चाहे उस मनुष्य विषेस की यथास्थिति जो भी हो । चाहे वह शासन तंत्र में अधिकारी हो । चाहे व्यवसायी हो । चाहे श्रमिक हो । चाहे किसान हो । चाहे कुछ भी सामाजिक स्थिति हो । धनपती हो । समाजसेवी हो । चाहे समाज सुधारक हो । चाहे राजनेता हो । परंतु कोई भी महत्वपूर्ण नहीं होता । महत्वपूर्ण होती है प्रजातंत्रीय व्यवस्था । प्रजातंत्र का संविधान ।
इसी रूप में ब्रम्ह की इस रचना संसार के लिये प्रकृति इस संसार की व्यवस्था है । इसी व्यवस्था के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि ब्रम्ह की रचना इस सृष्टि में जो कुछ भी क्रिया हो रही है उसकी कर्ता उनकी व्यवस्था प्रकृति  है । प्रकृति का यह स्वरूप जिस व्यक्ति को मस्तिष्क में ग्राह्य हो जाता है वह प्रतिपल होने वाले प्रति क्रिया सम्पादन के कर्ता को देखता रहता है ।
मस्तिष्क की योग की अवस्था का यह मूल आधार स्वरूप है । प्रकृति को कर्ता होने की दशा की मानसिक ग्राह्यता ही योग की मस्तिष्क की स्थिति को पाना है । मस्तिष्क की योग अवस्था की प्रथम वाँक्षना कर्म करने में कर्म फल के प्रभाव से मस्तिष्क का प्रभावित ना होना । जब कर्ता मनुष्य कर्म के सम्पादन को प्रकृति के कर्तापन के बोध से प्रेरित करेगा तभी उसी एक दशा में ही उसका मस्तिष्क कर्म के कर्म फल से प्रभावित नहीं होगा । योग की द्वितीय वाँक्षना किया जाने वाला कर्म ही उअ कर्म को करने की निमित्त हो उस कर्म को करने का कारण हो । यह भाव भी कर्ता मनुष्य के मस्तिष्क में एक ही दशा में स्थापित हो सकता है । जब कर्ता मनुष्य का मस्तिष्क प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण कर सके । प्रकृति कर्ता है इसलिये कर्ता मनुष्य मात्र उस पल विषेस उस कर्म को प्रेरित करने के दायित्व से प्रकृति द्वारा नामित किया गया है । कर्म उसका दायित्व है । योग की तृतीय वाँक्षना कार्य सम्पादन काल में कर्ता मनुष्य के मस्तिष्क में कार्य फल के प्रति सन्यास भाव प्रधान लक्ष्य के रूप में विद्यमान रहना । यह भाव भी एक ही दशा में मस्तिष्क का प्रधान भाव बन सकेगा । कर्ता मनुष्य का मस्तिष्क जब प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण कर लेवे ।

योग मस्तिष्क की अवस्था विषेस है । मस्तिष्क की योग की विषेस दशा पाने के लिये प्रकृति का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना ही अनिवार्य आवश्यकता है । यह मस्तिष्क के सम्मुख एक विशिष्ट लक्ष्य स्वरूप है । भाववाचक की ग्राह्यता थोडा गूढ होती है । शब्द जिनके माध्यम से भाववाचक की व्याख्या की जाती है वह स्वयँ उस भाव से च्युत होते हैं । लक्षण जिनके माध्यम से भाववाचक को व्यक्त किया जाता हैं वह भी भाव से हीन होते हैं । जैसे खुशी या दु:ख ये भाव हैं । इनका वास्तविक स्वरूप शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता । उसी प्रकार प्रकृति का कर्ता स्वरूप एक भाव है । इसका यथा भाव स्वरूप मस्तिष्क को ग्राह्य होना योगाभ्यास से ही सम्भव है । एक ओर योग का मूल है प्रकृति का कर्ता स्वरूप । इसके विपरीत योगाभ्यास से ही प्रकृति का कर्ता स्वरूप भी ग्राह्य होगा । योगाभ्यास का प्रयत्न ही सतत दोनो उपलब्धि करायेगा । मस्तिष्क की योग की अवस्था । प्रकृति के कर्ता स्वरूप का बोध । 

सोमवार, 20 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास पथ होता है कर्म दोष निवारण के निमित्त । यदि कंचिद किसी व्यक्ति को योग की स्थिति स्थापित कर कार्य करना दुश्कर प्रतीत होवे तो उसके लिये कर्म दोष के निवारण का उपाय है भक्ति । प्रकृति की कृपा की विनय द्वारा । इस प्रकार योग की मस्तिष्क की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास करने में समर्थ व्यक्ति अपनावें योग की विधा । परंतु जिन्हे अपने उपर पूरा भरोसा नहीं अपनी क्रियाँओं पर पूर्ण नियंत्रण नहीं जो अपने मस्तिष्क की क्रिया प्रणाली को अंकुश करने मे अपने को समर्थ पाते उन्हे अपनाना होगा भक्ति का मार्ग । आत्मविश्वासी मनुष्य के लिये योग का पथ है । जिन्हे अपने करनी पर नियंत्रण है । जिन्हे अपनी इच्छाओं को अंकुश करने का मनोबल है । उनके लिये योग सर्वोत्तम विधा है ।
इस विचार स्थल पर एक व्यवहारिक जगत के अनुभव पर आधारित अन्य मत भी महत्वपूर्ण बताया गया विद्वानों द्वारा । कुछ विद्वान महात्मा अपना विचार प्रगट करते है कि योग की अवस्था पाने के लिये भी प्रकृति की कृपा अनिवार्य होती है । इस मत का आधार विशेस रूप से शरीर में निहित प्रकृति को विचाराधीन मानते हुये है । इन महात्माओं का कहना है कि जब तक शरीर की प्रकृति का सम्बल नहीं उपलब्ध होगा योग स्थिर नहीं हो सकेगा । इन महात्माओं का विचार है कि पुष्ट शारीरिक दशा के अभाव में योग साध्य नहीं होगा । इस कथन को समझने के लिये एक उदाहरण प्रस्तुत है । एक व्यक्ति के पास प्रचुर धन उसके बैंक के खाते में उपलब्ध है । किन्ही परिस्थितियों में किसी दुर्घटना के फलस्वरूप उसका वह हाँथ जिससे वह हस्ताक्षर करता है टूट जाता है । वह हस्ताक्षर नहीं कर सकता उस समय । धन खाते में होते हुये भी उसे उस समय नहीं मिल सकता । इसी उदाहरण के अनुरूप विद्वान महात्मा का मत है कि एक मनुष्य अपने को योग की दशा में स्थापित कर कार्य करने में समर्थ है । परंतु शारीरिक विघ्न उसे कार्य करने में बाधक बने तो यह शारीरिक असमर्थता का क्या निवारण है । इन विद्वान महात्माओं का मत है कि इस प्रकार के विघ्न के निवारण के लिये भक्ति अनिवार्य है । इस विचार क्रम के समर्थन में कवि निम्नवत वृतांत प्रस्तुत करता है
सुनि मुनि ताहि कहौं सहरोषा । भजहिं जे मोंहि तजि सकल भरोसा ॥
करहुँ सदा तिन्हकर  रखवारी । जिमि   बालक   राखहिं   महतारी ॥
मेरे प्रौढ तनय  सम  ग्यानी । बालक  सुत  सम   दास   अमानी ॥
जनहिं मोर बल निज़ बल ताही । दुहु कर  काम  क्रोध  रिपु  आंही ॥
यहि विचार पण्डित मोंहि भजहीं । पायेहुँ ज्ञान  भगति  नहिं  तजहीं ॥ 
उपरोक्त में ज्ञानी कहा गया है योग अभ्यासी के लिये । अमानी कहा गया है भक्ति उपासक के लिये । कवि का कहना है कि प्रकृति यह व्यक्त करती है कि ज्ञानी अर्थात योगाभ्यासी और भक्त मेरी दोनों ही संतान हैं । मुझे दोनों ही प्रिय हैं । ज्ञानी अपने मस्तिष्क की शक्ति से मेरी सेवा यथा संविधान करता है । भक्त मेरी कृपा से प्राप्त शक्ति से मेरी सेवा करता है । परंतु मेरी उपरोक्त दोनों ही संतानों के लिये उभयनिष्ठ रूप से काम और क्रोध शत्रु के समान होते हैं । काम अर्थात इच्छाये । इच्छा की पूर्ति ना होने की दशा में उत्पन्न होता है क्रोध । यह दोनों ही मेरी उपरोक्त दोनों ही संतानों के कर्म सम्पादन के मार्ग में शत्रु के रूप है । इस कारण योगाभ्यासी ज्ञानी भी योगाभ्यास की उपलब्धि होने के दशा में भी मेरी कृपा के लिये मेरा विनय करता है । वह योगाभ्यासी भी मेरी कृपा की याचना करना छोडता नहीं है ।
प्रकृति की कृपा योगाभ्यासी को अपने शरीर को पुष्ट और कार्य करने में समर्थ बनाये रखने के लक्ष्य से प्रकृति की कृपा याचना का सुझाव । भक्ति । योगाभ्यासी के लिये भी भक्ति । प्रकृति एक ऐसी व्यपक शक्ति है कि इसकी कृपा प्रत्येक विचार से योगकारक है । शरीर भी प्रकृति है । शरीर द्वारा कार्य सम्पादन भी प्रकृति के विज्ञान की महिमा का परिणाम है । इस प्रकार प्रकृति की कृपा विषेस महत्व की होती है । प्रकृति आपके कर्मों को गतिरोध करने को उद्यत ना हो जाय कम से कम इतनी कृपा तो चाहिये ही चाहिये ।

आत्मा कर्म का प्रेरक । प्रकृति कर्म का नियंत्रक । कर्मों की कर्ता प्रकृति । इसी स्वरूप का व्यवहारिक स्वरूप उपरोक्त व्याख्या का आधार है ।  

रविवार, 19 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मनुष्य का कर्म सम्पादन इस कर्म प्रधान सृष्टि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवयव है जिसपर सृष्टी का विकास भी लम्बित होता है और मनुष्य में निहित आत्मा का भविष्य भी लम्बित होता है । आत्मा अज़र अमर होता है । मनुष्य की मृत्यु की दशा में उसमें निहित आत्मा को दूसरी शरीर मिलती है । यह ब्रम्ह की व्यवस्था है । कर्म की गुणवत्ता ही प्रधान महत्व की होती है । कर्म की गुणवत्ता का मूल्याँकन का आधार होता है । कर्म संविधान । कर्म संविधान से विचलित कर्म सम्पादन का मुख्य कारण होता है । आत्मा की प्रकृति के गुणों में आसक्ति । प्रकृतीय गुणों के भोग की इच्छा । कर्तापन का अहंकार । इन रोगो से ग्रसित आत्मा कर्म संविधान की उपेक्षा कर स्वयं की इच्छा के अनुकूल कर्म प्रेरण को उद्यत होता है । उसके कर्म की गुणवत्ता का पतन होता है । धर्म दर्शन आत्मा के उपरोक्त दोष के सुधार के लिये पथ सुझाता है । मनुष्य अपनी गलती को जाने । अपनी गलती को सुधारने के लिये प्रयत्नशील होना चाहे तो धर्म दर्शन के सुझाये पथ के माध्यम से अभ्यास करने से उसके कर्म दोष दूर होते है । जिस प्रकार यदि शरीर में कोई व्याधि ग्रसित किये होने पर शरीर पीडित होता है । उसी प्रकार प्रकृतीय गुणों में आसक्त आत्मा पीडित अवस्था में रहती है । व्याधि का निदान होने पर शरीर स्वस्थ होती है । स्वस्थ होने पर तुलनात्मक अनुभूति होती है कि शरीर कितना व्यथित थी रोग धारण कर । उसी प्रकार धर्म दर्शन के द्वारा सुझाये मार्गो का अभ्यास करके आत्मा को रोग मुक्त करने पर अनुभव आता है कि रोग ग्रस्त आत्मा कितना व्यथित थी । स्वस्थ आत्मा जिस शांति और आनंद की अनुभूति कर हर्षित दशा में कर्म संविधान के अनुकूल कर्म सम्पादन करने लगेगी कि उसे दु:ख एक स्वप्न की भाँति विस्मृत ही हो जावेगा । कर्म की इस दशा को प्राप्त करने के लिये मात्र योग की मस्तिष्क की दशा में प्रत्येक छोटे बडे कार्य का अभ्यास करना ही एकमात्र वाँक्षना है । योग की मस्तिष्क की अवस्था वह दशा है मस्तिष्क की किसमें किये जा रहे कर्म के जनित होने वाले परिणाम से मस्तिष्क पर प्रभाव ना पडे । जिज्ञासु प्रयत्नशील साधक के लिये यह बताना विषय के अनुकूल होगा कि यह मस्तिष्क की दशा अति सरल है हासिल करना मात्र बाधा एक होती है । बाधा है अनंत काल से चला आ रहा अब्यास । इच्छा जनित कार्य करने का । जो व्यक्ति इस बाधा को जीत लेगा उसे योग की मस्तिष्क की स्थिति सहज सुलभ हो जावेगी । उसी योग की मस्तिष्क की स्थिति कायम रखते यदि वह अपने समस्त छोटे बडे कार्य को करने का अभ्यास बनायेगा तो निश्चय है कि जीवन के दु:ख से मुक्त हो जावेगा ।  यह ऐसी दशा होगी जो दिव्य शांति का अनुभव करायेगी । इस दशा को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने निम्नवत बताया
युक्ताहारविहारस्य  युक्तचेष्टस्य  कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ॥   

युक्त अर्थात योग की मस्तिष्क की दशा में । आहार और बिहार । आहार का शाब्दिक अर्थ भोजन परंतु प्रयुक्त प्रकरण में भाव है जीवन के लिये आवश्यक कार्य । बिहार का शाब्दिक अर्थ है मनोरंजन परंतु प्रयुक्त प्रकरण में भाव है वृत्ति के निमित्त कार्यों के अतिरिक्त समस्त कार्य । युक्ताहारविहारस्य शरीर को स्थिर स्वरूप में कायम रखने के लिये आवश्यक समस्त कार्य तथा वृत्ति के निमित्त किये जाने वाले कार्यों के अतिरिक्त समस्त कार्यों को योग की मस्तिष्क की दशा में किया जाय । युक्तचेष्टस्य  कर्मसु योग की मस्तिष्क की दशा में वृत्ति से सम्बंधित कार्य को किया जाय । युक्तस्वप्नावबोधस्य योग की मस्तिष्क की दशा में सोने और जगने का अभ्यास किया जाय । यदि कोई मनुष्य योग की मस्तिष्क की दशा में उपरोक्तानुसार वर्णित समस्त छोटे बडे कार्य करने का अभ्यास करेगा तो उसकी उपलब्धि को बताते है । योगो भवति दु:खहा उस अभ्यासी मनुष्य के जीवन से दु:ख समाप्त हो जावेगा । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यह अमोघ अस्त्र दिया है दु:ख को समाप्त करने के लिये । इसमें किसी भी बाहरी सहायता की रंचमात्र आवश्यकता नहीं है । किसी कर्म को त्यागने की आवश्यकता नहीं है । मात्र कर्म करने में अपने मस्तिष्क में कर्म के प्रति एक निश्चित भाव को धारण करने की बवाँक्षना बतायी गयी है । प्रत्येक व्यक्ति दु:खों की अशांति स्थिति से व्यथित है । निदान सरल है । परीक्षण निवेदित है । 

शनिवार, 18 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

इस कर्म प्रधान संसार में कर्म की गुणवत्ता ही प्रधान महत्व पूर्ण होती है । कर्म संचालन का समस्त नियंत्रण मनुष्य शरीर के मस्तिष्क द्वारा संचालित होता है । इसलिये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योगावस्था में कर्म करने का श्रेष्ठ पथ निर्दिष्ट किया है वह पूर्णरूप से मस्तिष्क की एक विषेस अवस्था है । मस्तिष्क की ऐसी अवस्था जिसमें किये जाने वाले कार्य के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले कर्म फल से मस्तिष्क प्रभावित ना हो । अनुकूल परिणाम से मस्तिष्क में हर्ष का भाव ना उत्पन्न होवे और ना ही विपरीत परिणाम उत्पन्न होने पर निराशा का भाव उत्पन्न होवे । यदि कोई मनुष्य योग की अवस्था में कार्य करना अपना आम अभ्यास बनाता है तो उसके चरित्र में जो गुण उत्पन्न होंगे उनकी चर्चा को सतत रखते हुये
सम: शत्रो च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।
शीतोष्णसुख्दु:खेषु   सम:   सङविवर्जित: ॥
योगेश्वर ने बताया कि योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास बनाने से मनुष्य अपने मित्र और शत्रु के साथ एक समान व्यवहार करने में सफल होगा । मित्र और शत्रु के सम्मुख होने में जो विषम मानसिक स्थितियाँ सम्मुख होती हैं इससे भी अधिक विषम स्थिति मान और अपमान की दशाओं में सम्मुख होती है । योगेश्वर बताते हैं कि योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यासी मान और अपमान की विषम मानसिक दशाओं में भी एक समान आचरण में सक्षम बनता है । उपरोक्त दोनों मानसिक स्तर की विषम परिस्थितियों को मस्तिष्क शांत भाव से ग्रहण करने में सक्षम बनता है । यह प्रभाव होता है योग की अवस्था में कार्य करने का । मनुष्य में अत्यधिक प्रभावशाली मानसिक क्षमता का जन्म होता है । यह जनित हुई क्षमता उसके कर्म की गुणवत्ता की वृद्धि कारक होती है । इस संसार में हर आम व्यक्ति इच्छाजनित कार्यों को ही पोषित कर रहा है । इसलिये उपरोक्त वर्णित मानसिक क्षमता से हीन है । उपरोक्त मानसिक क्षमता प्रयत्नपूर्वक अपने कर्म की गुणवत्ता के उत्थान के लिये चेष्टारत होने से ही मिलेगी ।
योग अवस्था में कार्य करने का अभ्यास बनाने वाले की आगे की दशा होगी कि वह सुख और दु:ख की परिस्थितियों में धैर्यवान रहेगा । धैर्य अर्थात मस्तिष्क में स्वाभाविक क्रम में उठने वाले अनेकानेक विकल्पात्मक विचारों में न उलक्षने वाला । सुख की परिस्थिति में मस्तिष्क में सुख भोग के विबिन्न काल्पनिक स्वरूप सम्मुख होने लगते हैं । मस्तिष्क काल्पनिक स्वरूप प्रस्तुत करता है जिनका फल यह प्रगट होता है कि जैसे सुख की वृद्धि होगी । आम अभ्यास में मनुष्य उन्हीं कल्पनाओं में चुनाव करने लगता है । पुन: उसी किये गये चुनाव के अनुकूल कर्म करने के लिये उद्यत होने लगता है । यही उसके भ्रम का श्रोत बनता है । कर्म दोष प्रेरित होते हैं । उपरोक्त के विपरीत धैर्यवान उपरोक्तानुसार मस्तिष्क द्वारा प्रस्तुत किये गये अनेक काल्पनिक विकल्पों में से चुनाव की मानसिक प्रक्रिया में मस्तिष्क को संलग्न नहीं होने देता । वह योग की मानसिक अवस्था को कायम रखते हुये धैर्यवान रहता है । अतएंव उसका कर्म सम्पादन त्रुटि से मुक्त रहता है । जिस प्रकार सुख की स्थिति में मस्तिष्क में प्रकृतीय रचना के विज्ञान के प्रभाव से उत्पन्न होने वाली अनेकानेक सुख वृद्धि की कल्पनायें जन्म लेती हैं उसी प्रकार दु:ख की परिस्थिति में दु:ख वृद्धि से सम्बंधित अनेकानेक काल्पनिक विकल्प मस्तिष्क प्रकृतीय रचना के विज्ञान के प्रभाव से उत्पन्न करने लगता है । जातक को ऐसी अनुभूतियाँ होने लगेंगी कि अब शेस जीवन उसे समस्त दु:ख ही दु:ख उसे झेलने हैं । वह घबरा जाता है । परंतु योग की अवस्था में कार्य का अभ्यासी दु:ख की उपरोक्त वर्णित मानसिक विषमता की परिस्थिति में भी धैर्यवान रहता है । उसके मस्तिष्क की योग की दशा विचलित नहीं होती । सुख और दु:ख जैसी अतिकारक विषम मानसिक दशायें भी योगी के कर्म को दोषयुक्त नहीं बना पाती । यह मानसिक क्षमता देन होती है योग अवस्था में कार्य करने के अभ्यास की ।
दो शक्तियाँ किसी काल विषेस पर परस्पर युद्धरत होती हैं । युद्ध द्योतक होता है परस्पर दूसरे के प्रभाव को क्षीण करने के प्रयत्न का । युद्ध में संलग्न दोनो ही शक्तियाँ परस्पर दूसरे के प्रभाव को क्षीण कर अपने प्रभाव का वर्चस्व स्थापित करने को प्रयत्नशील होती हैं । सफलता किसे मिलती है । उसे ही विजयी कहा जाता है ।
मनुष्य के मस्तिष्क का ही प्रधान महत्व होता है उसके कार्य की गुणवत्ता के मूल्याँकन किये जाने के क्षेत्र में । इसलिये मस्तिष्क की दशा कार्य के लिये विषेस महत्व की होती है । योग की अवस्था मस्तिष्क की दशा विषेस है । इसे जो मनुष्य अपना कर अपने कर्मों को गुणवत्तापूर्ण बनाने को चेष्टारत होता है उसे उपलब्धि अति योगकारक होती है । वह श्रीमान बनता है । श्रेष्ट कर्मों का जनक बनता है । साथ ही उसमें पैदा होती है मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली विषम परिस्थितियों को अंकुश करने की क्षमता । वह बनता है
सम: शत्रो च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।
शीतोष्णसुख्दु:खेषु   सम:   सङविवर्जित: ॥

समस्त चर्मोत्कर्ष मानसिक विषमताओं को विजय कर योग की अवस्था मस्तिष्क में कायम रखते हुये सतकर्म को क्रमश: करते हुये जीवन में प्रगति पथपर आगे अग्रसर । 

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य का सम्पादन । योग की अवस्था कैसे प्राप्त की जाय । योग की अवस्था में कर्म सम्पादन को कार्य करने की आम पद्धति के रूप में कैसे बनाया जा सकता है । योग की मस्तिष्क की दशा में कार्य करने के अभ्यास से उत्पन्न होने वाले चारित्रिक गुणों का उल्लेख गत अंको में किया गया ।
योग की मस्तिष्क की अवस्था में हर छोटे बडे कार्य करने का अभ्यास बनाने वाले योगी का पूर्ण चारित्रिक स्वरूप जो उदय होगा को बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं
सम: शत्रो च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।
शीतोष्णसुख्दु:खेषु   सम:   सङविवर्जित: ॥
सम: एक समान आचरण करने वाला । शत्रु और मित्र दोनो के ही साथ । योगी का चरित्र शत्रु और मित्र दोनो के ही साथ एक समान आचरण का होगा । इस कथन की गरिमा को अनुभव कोई भी मनुष्य करना चाहे तो वह स्वयं अपने ही आचरण में इसे परीक्षित कर देखे कि क्या वह ऐसा आचरण कर सकता है । क्या वह अपने मित्र के साथ शांत मस्तिष्क व्यवहार निभा सकता है । मित्र के साथ हर्ष या शोक को सम भाव से आदान प्रदान कर सकता है । क्या बिना किसी उन्माद के मित्र के साथ व्यवहार कर सकता है । इससे भी आगे क्या अपने शत्रु के सम्मुख शांत आचरण कर सकता है । शत्रु के सामने होने पर मस्तिष्क में उठने वाले क्रोध भाव को नियंत्रित कर शांत मस्तिष्क उससे व्यवहार कर सकता है । योग की दशा में काम करने वाला मनुष्य ऐसा करने में सहज समर्थ होता है ।
उपरोक्त स्थिति से भी आगे मान और अपमान की दशा । यह सहज मनुष्य स्वभाव होता है कि जहाँ उसे मान मिलता है जहाँ उसका आदर किया जाता है वह वहाँ अति उदार व्यवहार से प्रत्युत्तर करता है । उपरोक्त के विपरीत जहाँ  उसका अपमान किया जाता है वहाँ वह अति तीक्ष्ण कटुता प्रगट करता है । यह प्रत्येक आम व्यक्ति के साथ एक जैसा ही अनुभव मिलेगा । परंतु दोनो ही उपरोक्त आचरण किसी व्यक्ति विषेस के लिये सम्मानजनक और उत्थान पूरक व्यवहार नहीं प्रमाणित होते । जहाँ सम्मान मिला वहाँ वह आवश्यकता से अधिक उदारता व्यवहृत कर क्षति करेगा और जहाँ अपमान हुआ वहाँ आक्रोष में क्षति करेगा । परंतु योगी का आचरण मान और अपमान दोनो ही दशाओं में एक समान शांत सम भाव का होगा ।
उपरोक्त वर्णित दोनो ही विपरीत चर्मोत्कर्ष स्थितियों नामत: मित्र व शत्रु तथा मान व अपमान के उदाहरण द्वारा योगेश्वर श्रीकृष्ण यह प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किये हैं कि योगी की कार्य सम्पादन दक्षता किस उच्चतम स्तर तक उन्नति करेगी । मनुष्य के आम जीवन यापन में यही चर्मोत्कर्ष स्थितियाँ होती है जिनमें उसके जीवन की प्रखरतम प्रभाव डालने वाली घटनाये घटित होती हैं । उसके जीवन की आम धारा ही प्रभावित हो जाती हैं । समय बीते वह स्वयं अपने किये पर पश्च्याताप करता है । परंतु मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यासी कोई पश्च्याताप करने वाला कार्य करेगा ही नहीं ।
शांत मस्तिष्क ही कर्म की गुणवत्ता का एक सूत्रीय वाँक्षना होती है । मस्तिष्क की सतत शांत स्थिति पाने का सरल मंत्र हैं योग । कार्य करने की विधा । कार्य की सही विधा अपनाने से दिव्य शांति आपकी अमानत बन जावेगी । इच्छा जनित कार्य करने का अनंत काल से चलता आया अभ्यास ही समस्त मानसिक अशांति का मूल होता है । शांत मस्तिष्क ना ही बाजार में क्रय से मिलेगा ना ही किसी वरदान से मिलेगा । इसको पाने का मात्र एक उपाय है । योग । मस्तिष्क की योग की दशा में कार्य करने मात्र से मस्तिष्क शांत होगा रहेगा और सिर्फ शांत ही रहेगा । उसकी शांति दशा को मान और अपमान जैसी चर्मोत्कर्ष परिस्थितियाँ भी अशांति में पर्णित नहीं कर सकेगी । शांत मस्तिष्क उसकी पहचान बन जावेगी । उसके मित्र भी उसकी शांत मस्तिष्क को सराहेगे । उसके शत्रु भी उसके शांत मस्तिष्क को सराहेगे । क्या उससे शत्रुता करे वह तो कोई प्रतिक्रिया करता ही नहीं । योगी की आस्था निहित है प्रकृति के कर्ता स्वरूप में । शत्रु के लिये भी वह कहता है कि इसका कोई दोष नही यह तो कुछ नहीं करता जो कुछ हो रहा है वह प्रकृति करा रही है यह तो मात्र प्रतीक है । मुझे इससे कोई रोष नहीं । प्रकृति से भी रोष का प्रश्न नहीं । वह तो स्वामी है । वही मान भी देती है । वही अपमानित भी कर रही है । मेरा कोई कर्म दोष होगा ।
उपरोक्त समस्त मानसिक दशा का रहस्य कर्म विधा के धुरी पर अवलम्बित है । कर्म सम्पादन पद्धति को योग की मानसिक दशा में करने के अभ्यास से समस्त कर्म दोषों से मुक्ति मिलती है । कर्म दोष ही पैदा करते है मस्तिष्क की अशांत स्थितियाँ ।

अगले अंक में सतत  

गुरुवार, 16 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क को योग की अवस्था में स्थापित कर कार्य करने का अभ्यास करने से अभ्यासी के चरित्र में जो गुण पैदा होंगे उनकी चर्चा को सतत रखते हुये गत अंक के पूर्व के अंक में बताये गये गुणों  
अद्वेष्टा सर्वभूतानं मैत्र: करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकार:  समदु:खसुख क्षमी ॥  
के अतिरिक्त जो गुण होगें वह हैं
संतुष्ट सततं योगी योग का अभ्यासी व्यक्ति सदैव प्रकृति द्वारा प्रदत्त परिस्थितियों में संतुष्ट रहेगा । जीवन में उपस्थित होने वाली परिस्थितियाँ प्रकृति द्वारा ही आरोपित होती है । परिस्थितियाँ जीवन के प्रेत्येक क्षेत्र से सम्बंधित । आर्थिक, सामाजिक यश अथवा अपयश, भौतिक सुख अथवा दु:ख, शारीरिक व्याधियाँ अथवा उत्कर्ष सभी प्रकृति प्रदत्त ही होती हैं । उपरोक्त प्रत्येक के सम्बंध में मनुष्य कुछ इच्छायें रखता है । इच्छा पूर्ण न होने के परिस्थिति में अल्पता से दु:खी होता है । परंतु इस सामान्य आचरण के विपरीत योगी सदैव प्रकृति प्रदत्त परिस्थितियों में ही संतुष्ट रहता है । कारण सरल है । योग अभ्यासी होने में उसे पथ मिला है परिणाम की कामना किये बगैर कार्य करने का । स्वाभाविक फल उसका स्वभाव बन जाता है । वह प्रकृति के न्याय के प्रति निष्ठावान बन जाता है ।
यतात्मा दृढनिश्चय: - योगी कार्य दायित्व को सम्पादित करने के लिये दृढ निश्चयी बनता है । प्रकृति द्वारा आरोपित कार्य को करना उसका अपने जीवन का लक्ष्य बन जाता है । इच्छा उसके जीवन से लुप्त हो जाती है । प्रकृति प्रदत्त कर्म उसके जीवन का ध्येय बन जाता है । कोई भी विपरीत परिस्थिति उसके कर्म की बाधा नहीं बन पाती है ।
योगी मस्तिष्क और विवेक दोनो ही स्तरों पर प्रकृति के प्रति समर्पित भाव से युक्त रहने का अभ्यासी बन जाता है । कर्म सम्पादन की गुणवत्ता पूर्ण रूप से मस्तिष्क की यथास्थिति का निरूपण होती है । योग अवस्था कर्म सम्पादन के प्रत्येक अंग यथा प्रेरणा श्रोत, निमित्त, फल, सभी का विचार समंवित कर प्रतिपादित किया गया है । इसलिये योग अवस्था में कर्म करने का अभ्यास कर्म की गुणवत्ता को निखारती है । कर्म उत्कृष्ट गुणवत्ता के हो जाते हैं

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो हर्ष, क्रोध, भय और उद्विग्नता से मुक्त होता है योग अवस्था में कार्य करने का अभ्यासी । इच्छा की पूर्ति में किये जाने वाले कार्य के प्रसंग में इच्छा के अनुकूल कार्य का परिणाम होने की दशा में कार्य का कर्ता हर्ष का अनुभव करता है । परंतु योग की दशा में कार्य करने वाले अभ्यासी व्यक्ति का प्रथम लक्ष्य होता है इच्छा प्रेरित कर्म का त्याग । योगावस्था में कार्य के अभ्यास की अनिवार्य वाँक्षना होती है अनाश्रितं कर्म फलं कर्म के परिणाम की अपेक्षा से मुक्त कर्म । इसलिये योगावस्था में कार्य के अभ्यासी को हर्ष का परिचय नहीं होता । दूसरी उपलब्धि बतायी मर्ष क्रोध से मुक्त । पुन: इच्छा प्रेरित कर्म करने की दशा में मनोनुकूल इच्छा के अनुरूप कार्य फल न प्रगट होने की परिस्थिति उत्पन्न करती है कर्ता के मस्तिष्क में क्रोध । योगावस्था का कर्म अभ्यासी इच्छा प्रेरित कर्म करता ही नही । इसलिये वह मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले क्रोध से मुक्त रहता है । भय भय की जननी होती है मोह । यदि मनुष्य के मस्तिष्क में मोह उपस्थित है तो वह भय को हटा ही नहीं सकता । मोह का निमित्त कुछ भी हो । लडका लडकी घर मकान वस्त्र मोटर गाडी जगह जायजाद । जिसके निमित्त मोह करेगा कोई भी व्यक्ति प्रतिफल में भय प्रगट होकर ही रहेगा । भय मोह की क्षाया है । योग अवस्था की अनुशंसा अनासक्ति है । मोह से च्युत होकर कर्म का आदेश है योग पथ का । परिणामत: योग अवस्था में कार्य करने का अभ्यास मनुष्य को भय से मुक्ति दिलाता है । उद्विग्नता इच्छा प्रेरित कर्म सदैव किसी विषेस फल को पाने के उद्देष्य से ही किया जाता है । इसलिये कर्म करने वाले के मस्तिष्क में कर्म सम्पादन काल में लगातार यह विचार भाव विद्यमान रहता है कि कितनी जल्दी उसका मनोवाँक्षित फल प्रगट हो जाय । वह उद्विग्न रहेगा । उसका कर्म दोषपूर्ण होना ही होना है । उसके मस्तिष्क का समस्त प्रयत्न फल में समाया हुआ है । कर्म सम्पादन की कुशलता और कर्म की गुणवत्ता उसके मस्तिष्क का निमित्त है ही नही । परंतु उपरोक्त के विपरीत योगाभ्यासी व्यक्ति का कर्म फल की कामना से मुक्त कर्म होता है । इसलिये योगी के मस्तिष्क का क्षितिज कर्म सम्पादन काल में मन:दशा उद्विग्नता से मुक्त होती है । इसलिये योगी का कर्म गुणवत्ता युक्त होगा कर्म के विज्ञान के अनुरूप कर्म सम्पादन होगा । उपरोक्त समस्त उपलब्धियाँ योग अवस्था में कार्य करने के अभ्यास का सहज वरदान स्वरूप योगी के चरित्र में उत्पन्न होगीं । इनके हासिल करने के लिये कोई अलग से प्रयत्न नहीं करना है । योग अवस्था में कार्य का विज्ञान की यह सहज स्वाभाविक देन के स्वरूप अभ्यासी को मिलेंगी । कल्पना कीजिये कि हर्ष, क्रोध, भय और उद्विग्नता यदि ना हो तो कितना शांत जीवन स्वरूप होगा । जीवन की समस्त अशांति के यही जनक होते है हर्ष, क्रोध, भय, उद्विग्नता । यदि हर्ष है तो दु:ख आना ही है । हर्ष के घर के द्वार पर दु:ख खडा मिलेगा । जन्म हुआ है तो मृत्यु होनी ही है । कोई शक्ति मृत्यु टाल नहीं सकती । क्रोध की भयावह अग्नि कितना क्षति कारक होती है । प्रत्येक व्यक्ति को अनुभव होगा । इसकी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है । जीवन के जिस भाग में क्रोध की अग्नि प्रज्वलित हुई वह अंग क्षतिग्रस्त होने से कोई बचा नहीं सकता । भय का दु:ख सर्वाधिक भयावह होता है । अल्पता के दु:ख से भी अधिक । उद्विग्नता में कर्म का जितना नाश होता है उतना अन्य किसी श्रोत से सम्भव नहीं होता । समस्त त्रुटि का मूल है । यदि कंचिद इतने भयावह व्याधियों से मुक्ति पानी है तो योग की अवस्था में कर्म का अभ्यास एक एकाकी औषधि स्वरूप प्रमाणित होगी । परीक्षित कर सत्य पावें ।

बुधवार, 15 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की योग की अवस्था प्रत्येक भाँति कर्म सम्पादन को उत्कृष्ठ बनाने के लिये अनुकूल दशा होती है । इस स्थिति को प्राप्त करने के लिये संयमित दिनचर्या अनिवार्य है । योग संयमित आचरण के उद्देष्य से है । इसलिये संयमित दिनचर्या भी इसका अभिन्न योगकारक अंग है । समय से सोना समय से जगना । संयमित अहार । संयमित संसर्ग । सभी इस योग की अवस्था पाने के लिये सहायक प्रमाणित होते है । यह बात तर्क से भी समझने योग्य है कि यदि मनुष्य अपने कार्य काल में अपने को संयमित और नियंत्रित रखना चाहता है तो शेस समय यदि वह मस्तिष्क की अशांत परिस्थिति में बिताना चाहेगा तो मात्र कार्य काल में मस्तिष्क शांत संयमित कैसे हो जावेगा । इसलिये संयमित दिनचर्या जिसमें आम अभ्यास ही जीवन यापन का इस प्रकार सुनियोजित करना होगा कि मस्तिष्क अशांत परिस्थितियों को ना उद्यत होवे ।
इस बात को और अधिक परिमार्जित ढग से यदि कहा जाय तो कहा जावेगा कि अपनी समस्त दिनचर्या को ही योग की मानसिक दशा में किया जाय । भोजन भी योग की दशा में किया जाय । मनोविनोद भी योग की दशा में ही की जाय । सोना और जगना भी योग की दशा में ही किया जाय । योग की दशा में ही समस्त कर्म सम्पादन किये जाँय । सकल दिनचर्या के कार्य भोजन करना सोना जगना प्रत्येक को किये जाने वाले कार्य के रूप में लिया जाय । एक अलग कर्म के स्वरूप में । फिर इस कर्म को करने के लिये योग की मस्तिष्क की अवस्था प्रयत्न की जाय । जीवन का प्रत्येक पल योग की मस्तिष्क की अवस्था में करने का अभ्यास । इस बात को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया
युक्ताहार्विहारस्य   युक्त्चेष्टस्य   कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ॥
युक्त अर्थात योग की अवस्था में । योग की अवस्था मस्तिष्क की वह अवस्था जिस पर कार्य के परिणाम का प्रभाव ना पडे । मस्तिष्क सम भाव में स्थिर रहे । ना ही अनुकूल परिणाम से हर्षित हो ना ही प्रतिकूल प्रभाव से दु:खी हो । इस योग की अवस्था को जीवन यापन के प्रत्येक छोटे बडे काम का अभ्यास बनाने का परामर्ष ।
यद्यपि कि अभ्यास एक ऐसी शक्तिशाली विधा है कि हर असम्भव को सम्भव बनाने वाली होती है । परंतु इसमें जिस दृढता की आवश्यकता होती है वह ही हर मनुष्य के लिये थोडा दुर्गम प्रतीत होने वाली है । जो व्यक्ति जीवन को मात्र सुख भोग विलास का निमित्त मान जीवन यापन का अभ्यासी होगा उसके लिये तो यह असाध्य परामर्ष प्रमाणित होगा ।

आदिकालीन विद्वान महात्माओं ने उपरोक्त स्थिति पाने के लिये प्रकृति का कृपावान होना भी अति महत्वपूर्ण मानते है । उनका मत है कि अकेले दृढनिष्चयी होने से ही सफलता नहीं सम्भव होगी अपितु प्रकृति का कृपावान होना भी आवश्यक है । यह मत सांसारिक परिस्थितियों जिनमें मनुष्य जीवन जीता है से समबंध रखते हुये है । यदि किसी मनुष्य के समक्ष समस्त वातावरण जिसमें उसे जीवन जीना है मस्तिष्क को उद्विग्न करने वाले ही हैं तो वह मस्तिष्क को शांत स्थिर रखने का प्रयत्न कितना सफल कर सकेगा प्रश्नवाचक बन जाता है । संसार के संचालन किसी एक व्यक्ति के वश में तो होता नहीं । इसी परिपेक्ष्य में जो अलग अलग युगों को बतया जाता है यथा सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग है इन प्रत्येक में समाज की आम स्थिति भिन्न बतायी गयी है । आम स्थिति जिसमें सत्कर्मों को प्रफुल्लित होने का अवसर मिलता है अथवा दुर्वृत्तियों को प्रफुल्लित होने का अवसर मिलता है । उपरोक्त सभी विचारों और परिस्थितियों को संकलित करने पर भी मनुष्य के अपने प्रयत्न का अपना ही महत्व है । मनुष्य को जन्म किन परिस्थितियों में मिला है यह उसके अपने वश में नहीं था परंतु वह अपना जीवन कैसे जीता है यह पूर्णतया उसके अपने वश का होता है । अपने उत्तम कर्मों के लिये उत्तम कर्म विधा योग द्वारा अपने को उत्कर्ष के लिये चेष्टारत बनाना ही योग्यतम परामर्ष है ।