सोमवार, 27 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य करने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया । मस्तिष्क की योग की अवस्था पाने के लिये बताया कि प्रकृति के कर्ता स्वरूप को हृदयस्थ किया जाय । प्रकृति कर्ता है । इसलिये प्रकृति द्वारा आदेशित कार्यों को ही किया जाय । प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म का सज्ञान कैसे सम्भव होगा इसके लिये उपाय सुझाया कि अपनी इच्छाओं के लिये परीक्षित कर शोध द्वारा । इस कथन का अभिप्राय यह है कि जो भी कर्म करने के लिये चुना जाय उसे परीक्षित कर देखा जाय कि कंचिद वह किसी अव्यक्त इच्छा के निमित्त तो नहीं है । इच्छा की पूर्ति का कर्म पाये जाने पर उसे त्यागा जाय । यदि यह पाया जाय कि वह किसी इच्छा की पूर्ति के निमित्त नहीं है उसी दशा में उसे किया जाय । दूसरे उपाय के रूप में यह सुझाया गया कि अपने इर्द गिर्द की स्थिति को अति संवेदनशील मस्तिष्क द्वारा परीक्षित करते रहा जाय । प्रकृति की अपेक्षा परिलक्षित होगी । प्रकृति आपसे क्या कर्म कराना चाह रही है प्रगट होगा । आपसे अपेक्षित कर्म के लिये वह परिवेश सृजित करती है । उस अपेक्षित कर्म के लिये आपको प्रेरित करने हेतु प्रकृति उपाय उपस्थित करेगी । आपके कर्म को करने के लिये प्रकृति आपको साधन भी देगी । परंतु यह सभी स्थितियाँ अनुभूति करने के लिये अनिवार्य होगा आपका मस्तिष्क अपनी इच्छा से मुक्त दशा में होना । प्रारम्भिक अवस्था में यह अनुभव थोडा मुश्किल प्रतीत होगा । परंतु अभ्यास इस मुश्किल को सुगम बना देगा । प्रकृति की अपेक्षा का कार्य करने में मस्तिष्क शांत एकाग्र कार्य को कार्य की अपेक्षानुसार करने में संलग्न रहेगा । कार्य का परिणाम कंचिद किसी महत्व का रहेगा ही नहीं । इसके विपरीत इच्छा की पूर्ति के निमित्त किये जा रहे कर्म के कर्म सम्पादन काल में मस्तिष्क में सतत कार्य के परिणाम की व्यग्रता विद्यमान रहती है । मस्तिष्क सतत अशांत रहता है ।

योगावस्था में कार्य करना पर्याय होता है शांत मस्तिष्क की दशा । कर्म करने के लिये शांत मस्तिष्क ही आदर्श होता है । कार्य कितना भी किया जाय । कितनी भी काल अवधि तक किया जाय । श्रमकारक नहीं होगा यदि कार्य करने के समय मस्तिष्क शांत दशा में रहे । अशांत मस्तिष्क ही थकान पैदा करता है । मस्तिष्क की व्यग्र स्थिति थकान पैदा करती है । कार्य भी त्रुटिपूण होता है । मस्तिष्क की कार्य काल में शांत दशा के लिये कर्म का सही चुनाव अति आवश्यक होता है । प्रकृति की अपेक्षानुसार प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म को करने में कार्य करने के समय शांत दशा में रहेगा । इसके विपरीत इच्छा जनित कर्म को करने में कर्म करने की अवधि में मस्तिष्क अशांत व्यग्र रहेगा । कर्म की गुणवत्ता कार्य करने के काल में मस्तिष्क की शांत अथवा अशांत दशा पर निर्भर होती है । कर्म करने के लिये सही कर्म का चुनाव अति महत्वपूर्ण होता है ।     

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