इस
संसार की रचना प्रकृति और पुरुष के सन्योग से हुई है । इसके कण कण में प्रकृति और
पुरुष दोनो ही विद्यमान हैं । प्रकृति जितना सब कुछ संसार में है सब प्रकृति है ।
पुरुष ब्रम्ह का अंश है । दोनो के सन्योग से ही समस्त रचना है । प्रकृति ब्रम्ह की
रचना है । पुरुष ब्रम्ह का अंश होने के कारण प्रकृति का ज्ञाता है । प्रकृति का
ज्ञाता होने के बावज़ूद भी पुरुष प्रकृति के गुणों से मोहित होता है । यह प्रकृति
की क्रिया शैली की महिमा है ।
परंतु प्रकृतीय रचना मस्तिष्क की एक
विषेस दशा योग में मस्तिष्क को स्थिर कर जो व्यक्ति अपने समस्त कार्यों को करने का
अभ्यास करता है उसे एक अति विशिष्ट स्थिति उपलब्ध होती है । इस स्थिति के अंतर्गत उसे
जहाँ प्रकृतीय गुणों के प्रति मोह से मुक्ति मिलती है वहीं उसे प्रतिपल ब्रम्ह के
अंश स्वरूप आत्मा की अपने अंदर उपस्थिति का बोध अनवरत बना रहता है । जिस प्रकार एक
शेर का नवजात शिशु भी शेर की प्रभुता के बोध से प्रतिपल गर्भित रहता है और जंगल के
अन्य प्राणियों से परस्पर नहीं करता । जिस प्रकार एक राजा की संतान राजा की
प्रभुता के बोध को संजोये अपने को राजकीय गरिमा के अनुकूल रखता है । उसी प्रकार
सर्वभौम सर्वशक्तिमान ब्रम्ह का अंश आत्मा की अनुभूति प्रतिपल जब जिस मनुष्य के
मस्तिष्क में बनी रहेगी तो वह मनुष्य प्रकृति और उसके गुणों के प्रति स्वत: दूर
रहेगा । प्रकृतीय गुणों का मोह उसके लिये सहज़ त्याज्य हो जावेगा ।
प्रतिपल अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह के
अंश आत्मा की अनुभूति मस्तिष्क में स्थिर रखने वाले व्यक्ति की दशा को व्यक्त किया
जावेगा उसे ब्रम्हानंद में बताकर । ब्रम्हानंद में लीन रहने वाले व्यक्ति की
प्रकृतीय गुणों के प्रति सहज़ विरक्ति हो जावेगी । योगावस्था में समस्त कार्यों को
करने का अभ्यास की उपलब्धि होगी ब्रम्हानंद । हर प्रत्येक व्यक्ति इसे पा सकता है
।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें