कर्म पथ द्वारा कर्म त्रुटि सुधार के
क्रम में मनुष्य शरीर विषेसतया शरीर के वह अंग जो कर्म सम्पादन में प्रयोग किये
जाते है का परिचय की चर्चा में यह विदित हुआ कि मस्तिष्क का योगदान सर्वाधिक होता
है । इस परिपेक्ष्य में मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले उन विकारों को गत अंक में
अंकित किया गया जो कर्म को त्रुटिपूर्ण बनाने में या कर्म दोष उत्पन्न करने में
सहायक होते हैं । इनमे प्रधान चार नामत: उद्विग्नता, हर्ष, क्रोध, तथा भय
होते हैं । मात्र इन दोष उत्पन्न कर्ता कारणों का परिचय जानने से कर्म दोष निवारण
सम्भव नहीं होगा । इन्हे जानने से ज्यादा से ज्यादा इनसे सतर्क हुआ जा सकता है ।
इनके नियंत्रण व निवारण की चर्चा आज का विषय है ।
उपरोक्त कर्म दोष उत्पन्न करने वाले
निमित्त मानसिक स्थितियों का नियंत्रण मात्र एक उभयनिष्ठ यंत्र द्वारा सम्भव होती
है जिसे धैर्य की संज्ञा दी जाती है । धैर्य वह मानसिक शक्ति है जो विवेक से
जाग्रित होती है । यह मानसिक क्षमता होती तो प्रत्येक मनुष्य में है परंतु प्रभावी
कतिपय मनुष्य में ही पायी जाती है । कारण । यह शक्ति अभ्यास द्वारा जाग्रित करने
से ही प्रभावी प्रयोग हेतु उपलब्ध होती है । जाग्रित अभ्यास द्वारा होती है ।
अभ्यास अर्थात इसे कर्म में प्रयोग करने से । जाग्रित होने पर यह मस्तिष्क के हर
सम्भव विकार उत्पन्न करने वाले माध्यमों को अंकुश करने में नियंत्रित करने में
उपयोगी प्रमाणित होती है । यह एक निधि के समान होती है । यह प्रत्येक मानसिक विकार
की एक एकाकी औषधि है । परंतु मात्र सैधांतिक ज्ञान मात्र्र से उपयोग नही की जा
सकती इसे अभ्यास द्वारा जाग्रित करना अनिवार्य वाँक्षना है ।
विवेक वह मानसिक क्षमता है जिसके द्वारा
मनुष्य सत्य असत्य, उचित अनुचित, गुण
दुर्गुण, ग्राह्य
त्याज्य, लाभ हाँनि
का विश्लेष्णात्मक सज्ञान पोषित करता है । यह क्षमता मात्र मनुष्य में ही होती है
। अन्य प्राणियों में नहीं पायी जाती । इसी विवेक द्वारा ही मनुष्य वर्गीकरण के
विज्ञान श्रेणी से उन्नति कर उत्कृष्ट आनंद श्रेणी पाता है । जो मनुष्य इस विवेक
का उपयोग नहीं करते उनका आचरण एक यंत्र के समान होता है । जो मनुष्य जितना ही इस
विवेक का उपयोग करते हैं उनका आचरण उतना ही शालीन शिष्ट होता है । प्रत्येक छोटे
बडे काम में यह उपयोगी है । परंतु इसके बावज़ूद भी प्रत्येक मनुष्य इसका प्रयोग नही
करता । यह सामान्य अनुभव है । हर वर्ग हर जाति हर देश में एक ही है । विवेक युक्त
आचरण श्रीयुक्त होता है । एक विवेकी मनुष्य मन की इच्छाओं का पीछा न कर उचित को
पोषित करने का अभ्यासी बनता है । वह स्वयँ कष्ट उठा जरूरतमंद की सहायता करता है ।
क्योंकि उसका विवेक उसे स्मरण कराता है कि हर मनुष्य प्रकृति की संतान है ।
विवेक पर आधारित जीवन यापन का अभ्यास
बनाने वाले व्यक्ति में जन्म लेती है मानसिक दोष नियंत्र्क शक्ति धैर्य । धैर्य के
जाग्रित होने पर व्यक्ति सक्षम हो जाता है मानसिक विकारों से संघर्ष करने में ।
परिणामत: उसके कर्मदोष शून्य की दिशा में अग्रसर हो जाते हैं । जैसा कि नाम से ही विदित
है कर्म दोष का निवारण कर्म द्वारा अर्थात कर्म पथ कर्म करने की विधा का सुधार पथ है
। कर्म दोष उत्पन्न करने वाली व्याधियों को निर्मूल करना होगा । व्याधियाँ जन्म न लेने
पावें इसका उपाय करना होगा । यह पूर्णतया कर्म करते हुये कर्म दोष निवारण का पथ है
। इस पथ के पथिक के लिये धैर्य एक अत्यंत उपयोगी शस्त्र है । इस शस्त्र से अपने अंदर
विद्यमान शत्रुओं का नाश करते अभीष्ट हासिल करना होगा । सत्य पथ पर चलने वाला धैर्यवान
पथिक असत्य के आतंक से भयभीत होकर यात्रा का लक्ष्य त्यागता नहीं अपितु अपने धैर्य
के शक्ति से उस असत्य को पराजित कर अपनी मंजिल पहुँच कर ही मंजिल पर ही रुकता है ।
हमारी कर्म दोष निवारण की यात्रा में हमारे शत्रु के रूप में सामने आने वाले समस्त
विकार हमारे अपने अंदर विद्यमान हमारी ही विकृत मानसिक स्थितियाँ होती हैं । इसलिये
विवेक व विवेक द्वारा उत्पन्न धैर्य का शस्त्र जो पथिक लेगा वही मंजिल तक पहुँचेगा
। विवेक बिना कर्म अभ्यास में जाग्रित किये प्रयोग हेतु उपलब्ध नहीं हो सकता । बिना
विवेक जाग्रित हुये धैर्य जन्म नही लेगा । चुनाव प्रत्येक मनुष्य की स्वतंत्रता है
।
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