मस्तिष्क ही केंद्र बिंदु है समस्त कर्मों
की गुणवत्ता का । कर्म की गुणवत्ता पूर्ण रूप से आश्रित होती है मस्तिष्क की कार्य
सम्पादन काल की अवस्था पर । मस्तिष्क यदि अनेको विचारों के प्रभाव से अशांत अस्थिर
अवस्था में होगा तो कर्म सम्पादन त्रुटिपूर्ण होगा । शांत स्थिर मस्तिष्क पोषित
करता है कर्म संविधान के अनुकूल कर्म । मस्तिष्क की कुछ अस्थिर अवस्थायें निम्नवत
होती हैं –
उद्विग्नता मनुष्य के मस्तिष्क में यदि कोई इच्छा विद्यमान है और उस इच्छा
की पूर्ति की आकाँक्षा से वह कोई कर्म कर रहा है तो कर्म सम्पादन आल में उसके
मस्तिष्क में लगातार एक परिवेष बना रहेगा कि कितने जल्दी वह कार्य परिणाम जिसकी
कामना से वह कार्य वह व्यक्ति कर रहा है प्रगट हो जाय मिल जाय । इस समस्त स्थिति
को एक शब्द में व्यक्त किया जावेगा उद्विग्नता । उस व्यक्ति की मानसिक अवस्था है ।
कार्य सम्पादन काल में उस व्यक्ति की मन:स्थिति है उद्विग्न । उद्विग्न मन:स्थिति
में किया गया कार्य प्रत्येक दशा में त्रुटिपूर्ण ही होगा । उद्विग्नता की मन:स्थिति
में किया गया कार्य किसी भी दशा में सही नहीं हो सकता है ।
हर्ष प्रसन्नता । किसी भी मनोनुकूल परिस्थिति से जनित होती है ।
मस्तिष्क की किसी कल्पना के कामना के इच्छा की पूर्ति होने की दशा में उत्पन्न
होने वली मन:स्थिति होती है प्रसन्नता हर्ष । प्रसन्नता की मन:स्थिति में सम्पादित
कार्य सदैव त्रुटिपूर्ण होगा । प्रसन्नता की मन:स्थिति मे किया गया कार्य कभी भी
सही नहीं होगा । कर्मसंविधानके अनुकूल कर्म सम्पादन के लिये यह मस्तिष्क की अवस्था
वर्जित है ।
भय मनुष्य प्रकृतीय घटको की उपलब्धि से संतुष्ट महसूस कर उसकी
रक्षा की कामना करता है । उस उपलब्धि के छिन जाने अथवा क्षतिग्रस्त होने के विचार
से भयभीत होता है । प्रकृतीय घटक की स्वामित्व राग है और इस राग की स्वाभाविक
प्रतिक्रिया है भय । एक मानसिक अवस्था है । इस मानसिक अवस्था में सम्पादित किया
गया कर्म भी सदैव त्रुटिपूर्ण होगा । भय की मानसिक दशा में किया गया कार्य कभी
किसी दशा में सही नहीं होगा । भय की मानसिक दशा भी सही कर्म सम्पादन के लिये
त्याज्य है वर्जित है ।
क्रोध मस्तिष्क में व्याप्त इच्छा पूर्ति न होने की दशा की
सामान्य मानसिक प्रतिक्रिया होती है क्रोध । जिस मस्तिष्क में क्रोध की अवस्था
विद्यमान होगी उस मस्तिष्क के धारक
व्यक्ति द्वारा सम्पादित कर्म कभी किसी परिस्थिति में सही नहीं होगा ।
क्रोध की मानसिक स्थिति में किया गया कार्य सदैव त्रुटिपूर्ण होगा । सही कार्य
सम्पादन के लिये क्रोध की मानसिक दशा त्याज्य है वर्जित है ।
इस प्रकार मस्तिष्क की अशांत स्थिति
त्रुटिपूर्ण कार्य कराती है । इसके विपरीत शांत मानसिक स्थिति में किये गये कार्य
सही होते है । कर्म संविधान के अनुकूल होते है । इसी कथन का पर्याय होगा कि कर्म
संविधान के अनुकूल कार्य करने के लिये पहली आवश्यकता होती है शांत मस्तिष्क । जैसा
कि गत अंक में उल्लेख किया गया था कि प्रकृति निर्मित मस्तिष्क में यह स्वाभाविक
क्षमता पिरोयी हुई है प्रकृति द्वारा कि वह अनेकानेक विचार भाव प्रगट करता रहता है
प्रत्येक कार्य से सम्बंधित प्रत्येक कार्य परिणाम से सम्बंधित प्रत्येक कार्य
सम्पादन विधा से सम्बंधित । यही त्रुटि का निमित्त बनती है । इसलिये सही कर्म करने
हेतु सर्वप्रथम अपने मस्तिष्क में उठने वाले अनेकानेक विचारो व भावो को नियंत्रित
करना होगा । त्रुटियों से बचना होगा । त्रुटिया नही रहेगी तो सही ही एक मात्र
अवशेष बचेगा । शांत मस्तिष्क अनिवार्य वाँक्षना है सही कर्म हेतु ।
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