योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास
बनाने वाले मनुष्य के चरित्र में जो गुण विकसित होंगे उनका वर्णन करते हुये
योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं कि सर्व प्रथम गुण होगा कि वह किसी भी मनुष्य से
ईर्ष्या का भाव नहीं सृजित करेगा अपितु वह जीव मात्र से मित्र भाव का बोध करेगा
जीव मात्र के प्रति करुण भाव रखेगा अपने मस्तिष्क में । द्वितीय गुण जो सृजित होगा
योगी के चरित्र में कि वह प्रकृतीय गुणों में आसक्ति नहीं जनित करेगा । तृतीय गुण जो
सृजित होगा योगी के चरित्र में कि उसमें कर्तापन का अहंकार भाव नहीं जनित होगा ।
इस प्रकार कर्म दोष सृजित करने वाले जितने कारण होते हैं वह उन सभी से मुक्त
चरित्र का पोषक बनेगा । दोष उत्पन्न करने वाले कारणों का शमन होने की दशा का
स्वाभाविक प्रतिफल होगा उन्नत कर्म को पोषक चरित्र से युक्त बनेगा । यह कर्म
प्रधान संसार है । इसमें जिसका कर्म उन्न्त श्रेणी का हो जावेगा वही श्रीमान होगा
समाज में । कहा जाता है पुण्य से पुण्य की वृद्धि होती है । कर्म को योग की अवस्था
में करना कर्म की गुणवत्ता की वृद्धि करना है । जब तक कर्म फल की तृष्णा से बँधा
रहता है तब तक उसकी गुणवत्ता वृद्धी सम्भव ही नहीं हो सकती । जिस पल कर्म को फल के
बंधन से मुक्त दशा में किया जाना प्रारम्भ किया जावेगा तत्काल उसकी सम्पादन
गुणवत्ता प्रथम महत्वपूर्ण वरीयता बन जावेगी । साधक व्यक्ति कोई भी हो । योगी का
प्रथम अनिवार्य लक्ष्य होता है अनाश्रितं कर्म फलं कर्म के फल की अपेक्षा किये
बगैर कर्म करना । इसलिये योगी का कर्म गुणवत्ता से सम्पन्न होना ही होना है । योगी
कर्म की वाँक्षनानुसार कर्म के विज्ञान के अनुकूल कर्म सम्पादन करेगा ही करेगा । क्योंकि
फल उसका लक्ष्य है ही नहीं । उसका तो लक्ष्य है कर्म की गुणवत्ता । गुणयुक्त कर्म
सम्पादन । मर्यादित आचरण । योगी बिना किसी अपवाद के मर्यादित होगा । संविधान के
प्रति निष्ढावान होगा ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण योगी के चरित्र में
सृजित होने वाले गुणों को बताते हुये आगे बताते हैं कि वह सुख और दु:ख दोनो ही
परिस्थितियों में धैर्यवान रहेगा । इस स्थल पर पुन: धैर्य की व्याख्या विषय को
समझने में सहायक होगी । कतिपय परिस्थितियाँ होती हैं जिनमें मस्तिष्क अपनी रचनागत
गुणवत्ता के फल से त्वरित गति से अनेकानेक विकल्प प्रगट करने लगता है । इन विविध
विकल्पों में अनेको परस्पर विरोधी स्वरूपों के होते हैं । फल की कामना से कार्य
करने वाले व्यक्ति इन्ही उपस्थित किये गये विकल्पों में से अपनी फल कामना के
अनुरूप विकल्प को चुनते हैं । वह उन्हे तुष्टि दायक प्रतीत होता है । परंतु योगी
उपरोक्त प्रक्रिया के विपरीत प्रस्तुत किये गये विविध विकल्पों में से चुनाव में
नहीं सम्मलित होता अपितु वह स्थिर मस्तिष्क की अवस्था में किये जा रहे कर्म की दशा
में ही अपने को कायम रखता है । धैर्यवान रहता है । वह खुशियों का उत्सव नहीं मनाता
। ना ही दु:खो का मातम ही करता है । धैर्यवान रहता है । धैर्यवान उसका स्वाभाविक
रूप बन जाता है ।
अद्वेष्टा सर्वभूतानं मैत्र: करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकार: समदु:खसुख क्षमी ॥
योगी प्रकृतीय आसक्ति और प्रकृति के
प्रति मोह से मुक्त रहता है । आत्मा उपलब्ध इंद्रियों से जाना नहीं जा सकता । कर्म
का प्रेरक आत्मा होता है । वह प्रकृतीय शरीर का शासक होता है । कर्म की कर्ता
प्रकृति को बताया गया । आसक्ति आत्मा जनित करता है । कर्म दोष आत्मा की आसक्ति का
फल होती है । इस प्रकार कर्म सम्पादन योगावस्था में करना ही सबसे प्रभावी यंत्र
प्रमाणित होता है आत्मा के आसक्ति द्वारा जनित दोषों के निवारण के लिये । योग की
अवस्था पर्याय है फल की कामना से मुक्त कर्म प्रेरण का । फल की कामना पैदा होती है
आत्मा की प्रकृति में आसक्ति से । इस प्रकार योग की अवस्था में कर्म करना ही निदान
है आत्मा की प्रकृतीय मोंह की व्याधि का । आत्मा इंद्रियों द्वारा नियंत्रित नहीं
किया जा सकता । योग की अवस्था में कर्म करना ही एकमात्र उपाय है दोषयुक्त आत्मा को
दोषमुक्त बनाने के लिये ।
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