इस कर्म प्रधान संसार में कर्म की
गुणवत्ता ही प्रधान महत्व पूर्ण होती है । कर्म संचालन का समस्त नियंत्रण मनुष्य
शरीर के मस्तिष्क द्वारा संचालित होता है । इसलिये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
योगावस्था में कर्म करने का श्रेष्ठ पथ निर्दिष्ट किया है वह पूर्णरूप से मस्तिष्क
की एक विषेस अवस्था है । मस्तिष्क की ऐसी अवस्था जिसमें किये जाने वाले कार्य के
परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाले कर्म फल से मस्तिष्क प्रभावित ना हो । अनुकूल
परिणाम से मस्तिष्क में हर्ष का भाव ना उत्पन्न होवे और ना ही विपरीत परिणाम
उत्पन्न होने पर निराशा का भाव उत्पन्न होवे । यदि कोई मनुष्य योग की अवस्था में
कार्य करना अपना आम अभ्यास बनाता है तो उसके चरित्र में जो गुण उत्पन्न होंगे उनकी
चर्चा को सतत रखते हुये –
सम: शत्रो च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।
शीतोष्णसुख्दु:खेषु सम: सङविवर्जित: ॥
योगेश्वर ने बताया कि योग की अवस्था में
कार्य करने का अभ्यास बनाने से मनुष्य अपने मित्र और शत्रु के साथ एक समान व्यवहार
करने में सफल होगा । मित्र और शत्रु के सम्मुख होने में जो विषम मानसिक स्थितियाँ
सम्मुख होती हैं इससे भी अधिक विषम स्थिति मान और अपमान की दशाओं में सम्मुख होती
है । योगेश्वर बताते हैं कि योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यासी मान और अपमान
की विषम मानसिक दशाओं में भी एक समान आचरण में सक्षम बनता है । उपरोक्त दोनों
मानसिक स्तर की विषम परिस्थितियों को मस्तिष्क शांत भाव से ग्रहण करने में सक्षम
बनता है । यह प्रभाव होता है योग की अवस्था में कार्य करने का । मनुष्य में अत्यधिक
प्रभावशाली मानसिक क्षमता का जन्म होता है । यह जनित हुई क्षमता उसके कर्म की
गुणवत्ता की वृद्धि कारक होती है । इस संसार में हर आम व्यक्ति इच्छाजनित कार्यों
को ही पोषित कर रहा है । इसलिये उपरोक्त वर्णित मानसिक क्षमता से हीन है । उपरोक्त
मानसिक क्षमता प्रयत्नपूर्वक अपने कर्म की गुणवत्ता के उत्थान के लिये चेष्टारत
होने से ही मिलेगी ।
योग अवस्था में कार्य करने का अभ्यास
बनाने वाले की आगे की दशा होगी कि वह सुख और दु:ख की परिस्थितियों में धैर्यवान
रहेगा । धैर्य अर्थात मस्तिष्क में स्वाभाविक क्रम में उठने वाले अनेकानेक
विकल्पात्मक विचारों में न उलक्षने वाला । सुख की परिस्थिति में मस्तिष्क में सुख
भोग के विबिन्न काल्पनिक स्वरूप सम्मुख होने लगते हैं । मस्तिष्क काल्पनिक स्वरूप
प्रस्तुत करता है जिनका फल यह प्रगट होता है कि जैसे सुख की वृद्धि होगी । आम
अभ्यास में मनुष्य उन्हीं कल्पनाओं में चुनाव करने लगता है । पुन: उसी किये गये
चुनाव के अनुकूल कर्म करने के लिये उद्यत होने लगता है । यही उसके भ्रम का श्रोत
बनता है । कर्म दोष प्रेरित होते हैं । उपरोक्त के विपरीत धैर्यवान उपरोक्तानुसार
मस्तिष्क द्वारा प्रस्तुत किये गये अनेक काल्पनिक विकल्पों में से चुनाव की मानसिक
प्रक्रिया में मस्तिष्क को संलग्न नहीं होने देता । वह योग की मानसिक अवस्था को
कायम रखते हुये धैर्यवान रहता है । अतएंव उसका कर्म सम्पादन त्रुटि से मुक्त रहता
है । जिस प्रकार सुख की स्थिति में मस्तिष्क में प्रकृतीय रचना के विज्ञान के
प्रभाव से उत्पन्न होने वाली अनेकानेक सुख वृद्धि की कल्पनायें जन्म लेती हैं उसी
प्रकार दु:ख की परिस्थिति में दु:ख वृद्धि से सम्बंधित अनेकानेक काल्पनिक विकल्प
मस्तिष्क प्रकृतीय रचना के विज्ञान के प्रभाव से उत्पन्न करने लगता है । जातक को ऐसी
अनुभूतियाँ होने लगेंगी कि अब शेस जीवन उसे समस्त दु:ख ही दु:ख उसे झेलने हैं । वह
घबरा जाता है । परंतु योग की अवस्था में कार्य का अभ्यासी दु:ख की उपरोक्त वर्णित
मानसिक विषमता की परिस्थिति में भी धैर्यवान रहता है । उसके मस्तिष्क की योग की
दशा विचलित नहीं होती । सुख और दु:ख जैसी अतिकारक विषम मानसिक दशायें भी योगी के
कर्म को दोषयुक्त नहीं बना पाती । यह मानसिक क्षमता देन होती है योग अवस्था में
कार्य करने के अभ्यास की ।
दो शक्तियाँ किसी काल विषेस पर परस्पर
युद्धरत होती हैं । युद्ध द्योतक होता है परस्पर दूसरे के प्रभाव को क्षीण करने के
प्रयत्न का । युद्ध में संलग्न दोनो ही शक्तियाँ परस्पर दूसरे के प्रभाव को क्षीण
कर अपने प्रभाव का वर्चस्व स्थापित करने को प्रयत्नशील होती हैं । सफलता किसे
मिलती है । उसे ही विजयी कहा जाता है ।
मनुष्य के मस्तिष्क का ही प्रधान महत्व
होता है उसके कार्य की गुणवत्ता के मूल्याँकन किये जाने के क्षेत्र में । इसलिये
मस्तिष्क की दशा कार्य के लिये विषेस महत्व की होती है । योग की अवस्था मस्तिष्क
की दशा विषेस है । इसे जो मनुष्य अपना कर अपने कर्मों को गुणवत्तापूर्ण बनाने को
चेष्टारत होता है उसे उपलब्धि अति योगकारक होती है । वह श्रीमान बनता है । श्रेष्ट
कर्मों का जनक बनता है । साथ ही उसमें पैदा होती है मस्तिष्क में उत्पन्न होने
वाली विषम परिस्थितियों को अंकुश करने की क्षमता । वह बनता है –
सम: शत्रो च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।
शीतोष्णसुख्दु:खेषु सम: सङविवर्जित: ॥
समस्त चर्मोत्कर्ष मानसिक विषमताओं को
विजय कर योग की अवस्था मस्तिष्क में कायम रखते हुये सतकर्म को क्रमश: करते हुये
जीवन में प्रगति पथपर आगे अग्रसर ।
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