अनंत काल से
आत्मा इस शरीर उस शरीर में जन्म लेते चली आयी है । बारम्बार जन्म और मृत्यु को
प्राप्त होते असीमित कष्ट भोगते आत्मा की यह यात्रा चलती ही जा रही है । इन जन्मों
का कारण सृजित होता है कर्म सम्पादन के परिणामों द्वारा । त्रुटिपूर्ण कर्म
सम्पादन आत्मा का सतत अभ्यास बना हुआ है । यह जन्म मृत्यु की यात्रा चलती ही
जावेगी । जब तक मनुष्य अपने कर्म को सुधारेगा नहीं यह जन्म मृत्यु की यात्रा चलती
ही जावेगी । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस सुख दु:ख की भोग श्रंखला से उबरने का पथ
बताया योग । योग की अवस्था में किये गये कार्य बंधनकारी पाप और पुण्य की सीमा से
परे होते हैं इसलिये मुक्ति पथ प्रशस्थ करने वाले होते हैं । योगेश्वर श्रीकृष्ण
ने कहा –
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम् ॥
\यदि मनुष्य के मस्तिष्क में और
विवेक में योग की स्थिति स्थापित हो तो उसके द्वारा किये गये कार्य सुख और दु:ख
भोग की श्रेणी से परे होगे । योग कार्य को कुशलता पूर्वक करने का विज्ञान है । योग
मस्तिष्क और विवेक की विषेस दशा है । योग की मानसिक अवस्था में किये गये कार्य
पुण्य और पाप के क्षेत्र से परे होगें ।
पुण्य भी
बंधनकारी ही होते हैं । इन्हे भोगने के लिये भी पुनर्जन्म ही होगा । बंधन तो बंधन
ही होगा चाहे लोहे की जंजीर से बँधा हो या सोने की जंजीर से । मुक्ति है योग । योग
की अवस्था में किये गये कार्य बंधनकारी नहीं होंगे । मुक्ति प्रकृतीय गुणों की
आसक्ति से । मुक्ति प्रकृतीय घटको के प्रति मोह से । प्रकृतीय गुणों को भोगने की
इच्छा से । प्रकृतीय घटको के स्वामित्व की अभिलाषा से । कर्तापन के अहंकार से
मुक्ति का पथ योग । मुक्ति पाने से ही शांति मिलेगी । मुक्ति पाकर ही दिब्य आनंद
की स्थिति मिलेगी ।
योग एक विशिष्ट
मानसिक अवस्था है । विवेक ग्राह्य और त्याज्य का भेद बोध करने की क्षमता है । यह मात्र
मनुष्य के पास ही होती है । मनुष्य जीवन पाकर भी यदि अपने विवेक का प्रयोग नहीं
किया तो यह विवेक अन्य शरीरों में जन्म की दशा में तो मिलेगा ही नहीं । इन्ही
कारणों विद्वान महात्माओं ने मनुष्य शरीर को मुक्ति का द्वार बताते हुये इसे सर्व
श्रेष्ट योनी बतायी है । इस शरीर में जन्म मुक्ति के लिये सर्वोत्तम अवसर है ।
योग अंगीकार कर
मनुष्य कर्मों के बंधन से मुक्ति पायेगा । गत श्लोक में भी यही बात कही गयी थी कि
योग की अवस्था में अपने को स्थापित कर कार्य करो और प्रकृति के प्रति मोह को त्याग
अपना कर्तव्य कुशलता पूर्वक करो । प्रकृति का कर्तापन यदि मस्तिष्क स्वीकार करले
तो यही योग में स्थापित मस्तिष्क होगा । ऐसे मस्तिष्क द्वारा संचालित कार्य ब्रम्ह
के कर्म संविधान के अनुकूल होंगे । कर्तापन के अहंकार से मुक्त होंगे । पाप और
पुण्य की श्रेणी से परे होंगे । बंधन से मुक्त होंगे ।
यह योग की
अवस्था स्वयं अपने विवेक के जागृत होने पर अपने प्रयत्नों से ही मिलेगी । इसे किसी बाहरी माध्यम से थोपा नहीं जा सकता है
। योग इच्छा जनित कार्यों को त्यागने का पथ है । प्रकृति की सत्ता को स्वीकारना है
। प्रकृति के कर्तापन को स्वीकारना है । प्रकृतीय मोह से मुक्ति का पथ है ।
अनंत काल से चलती
आ रही सुख और दु:ख भोग की जन्म और मृत्यु की यात्रा जो कि इच्छा जनित कार्यों के कारण
सतत चलती आयी है को इसी एक जन्म में योग को अपना कर इस प्रकृतीय मोह से मुक्त हुआ जा
सकता है । समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । हम प्रकृति की एक संतान है । प्रकृति
की अपेक्षानुसार हम प्रकृति के आदेशानुसार कर्म करें । किये गये कर्म के परिणाम से
सम्बंध न रखें । परिणाम की अपेक्षा से कर्म ना करे । दोनो ही कथन पर्याय हैं । यही
प्रकृति के कर्तापन को स्वीकारना है । यही अपने कर्तापनके अहंकार का शमन है । मस्तिष्क
में योग की अवस्था है ।
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