योगस्थ: कुरु कर्माणि सड्गं त्यक्त्वा धनञ्जय: ।
सिद्धयसिद्धियो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
योग मस्तिष्क की
एक अवस्था विषेस को कहा जाता है । ऐसी मानसिक अवस्था जिस पर कार्य के परिणाम का
प्रभाव उसके संतुलन को विचलित ना कर सके । कर्म सम्पादन के लिये शांत मस्तिष्क को
आदर्श पाया गया । मस्तिष्क जिसमें उठने वाले विचारों का ज्वार ना हो । इच्छाओं की
लहरे ना हों । मस्तिष्क इन अशांति उत्पन्न करने वाले श्रोतों से पूर्णतया रक्षित
हो । ऐसे मस्तिष्क द्वारा संचालित कार्य कार्य संविधानके अनुकूल होगा ।
परंतु मस्तिष्क
को अशांत करने वाले विचारों के तूफान स्वत: अपने आप शांत नहीं हो सकते हैं । यह तो
प्रकृतीय रचना मस्तिष्क में पिरोये हुये विज्ञान के प्रभाव से उत्पन्न होते है ।
इन्हे उत्पन्न होने के लिये मनुष्य को कोई अलग से चेष्टा नहीं करनी होती है । यह
अवश्य है कि यदि कंचिद कोई मनुष्य यह महसूस कर सके कि अच्छे कार्य सम्पादन के लिये
शांत मस्तिष्क की आवश्यकता होती है । परिणामत: वह मनुष्य मस्तिष्क को शांत स्थिति में
रखने के लिये चेष्टारत होगा । ऐसे मनुष्य के लिये योग की अवस्था प्राप्त करना एक
रामवाण औषधि के रूप में गुणकारी युक्ति प्रमाणित होगी ।
उपरोक्त उद्घृत
योग की अवस्था से सम्बंधित श्लोक अत्यंत वैज्ञानिक आधार द्वारा सृजित अभिव्यक्ति
है । इसमें मनुष्य शरीर के कर्मेंद्रियों एवं मस्तिष्क की परस्पर क्रिया विधि में
निहित विज्ञान की पूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन पर आधारित त्रुटि निवारण की विधा को
व्यक्त किया गया है । यह यंत्र के तुल्य है । जिस प्रकार यंत्र के प्रयोग में उसके
संचालक को यंत्र में प्रयुक्त विज्ञान को जानना आवश्यक नहीं होता ठीक उसी प्रकार
उपरोक्त श्लोक की संस्तुतियों को अपनाने वाले साधक को उपरोक्त श्लोक में निहित
विज्ञान को जानना आवश्यक नहीं है । पुन: जिस प्रकार यंत्र के प्रभाव क्षेत्र में
जो भी व्यक्ति होगा वह यंत्र के प्रभाव से उत्पन्न होने वाले लाभ को पायेगा । उसी
प्रकार उपरोक्त श्लोक की संस्तुतियों के माध्यम से जो भी व्यक्ति कार्य करेगा वह उत्तम
कृत्य का लाभ पायेगा । इस प्रकार उपरोक्त स्लोक की अनुशंसा अनुरूप कर्म सम्पादन
करने से प्रत्येक मनुष्य शांत मस्तिष्क से कार्य सम्पन्न करने के श्रेष्ट फलों को
पायेगा । यह मंत्र पूर्णतया यंत्र की क्षमता से युक्त है । यह किसी धर्म विषेस की
सीमा से बधा नही है ।
उपरोक्त श्लोक
के सृजन में मनुष्य के कर्म सम्पादन में उत्पन्न होने वाली त्रुटियाँ क्या होती
हैं ? उनकी उत्पत्ति कहाँ से होती है ? उनकी उत्पत्ति का निमित्त कहाँ सृजित होता है ? उन निमित्तियों का नियंत्रण कैसे सम्भव हो सकता है ? प्रत्येक का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन के आधार पर
निवारण पथ शोध किया गया है । जिसभी विद्वान महात्मा ने उपरोक्त श्लोक को इस मानव
समाज को दिया वे सत्य रूप में मानव कल्याण के हितैषी थे । इतना प्रभावी उत्थान का
मंत्र अन्यत्र कोई दूसरा नहीं हो सकता है ।
उपरोक्त मंत्र
की अनुशंसा के अनुरूप कर्म करने का अभ्यास करने से उपरोक्त लिखित समस्त विवरण को
कोई भी स्वयँ अपने अनुभव से सत्य पायेगा । परीक्षा निवेदित है ।
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