इस संसार के समस्त जीव एवँ निर्जीव का
निर्माण प्रकृति और पुरुष के सन्योग से सम्भव हुई है । प्रकृति और पुरुष दोनो ही
अनंत काल से विद्यमान हैं । इस संसार में जितने भी कर्म हो रहे हैं उनकी कर्ता
प्रकृति है । रचना एवँ कर्म के उपरोक्त तथ्य को जो भी मनुष्य अपने मस्तिष्क में
भली भाँति ग्रहण करता है वह इस संसार के सत्य का ज्ञाता होता है । सत्य के ज्ञाता
के मस्तिष्क में योग की दशा सुलभ होती है । योग की मस्तिष्क की दशा में अपने समस्त
कर्मों को करने वाला व्यक्ति परम आनंद की स्थिति भोग करता है
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