मस्तिष्क की योग की अवस्था प्रत्येक
भाँति कर्म सम्पादन को उत्कृष्ठ बनाने के लिये अनुकूल दशा होती है । इस स्थिति को
प्राप्त करने के लिये संयमित दिनचर्या अनिवार्य है । योग संयमित आचरण के उद्देष्य
से है । इसलिये संयमित दिनचर्या भी इसका अभिन्न योगकारक अंग है । समय से सोना समय
से जगना । संयमित अहार । संयमित संसर्ग । सभी इस योग की अवस्था पाने के लिये सहायक
प्रमाणित होते है । यह बात तर्क से भी समझने योग्य है कि यदि मनुष्य अपने कार्य
काल में अपने को संयमित और नियंत्रित रखना चाहता है तो शेस समय यदि वह मस्तिष्क की
अशांत परिस्थिति में बिताना चाहेगा तो मात्र कार्य काल में मस्तिष्क शांत संयमित
कैसे हो जावेगा । इसलिये संयमित दिनचर्या जिसमें आम अभ्यास ही जीवन यापन का इस
प्रकार सुनियोजित करना होगा कि मस्तिष्क अशांत परिस्थितियों को ना उद्यत होवे ।
इस बात को और अधिक परिमार्जित ढग से यदि
कहा जाय तो कहा जावेगा कि अपनी समस्त दिनचर्या को ही योग की मानसिक दशा में किया
जाय । भोजन भी योग की दशा में किया जाय । मनोविनोद भी योग की दशा में ही की जाय ।
सोना और जगना भी योग की दशा में ही किया जाय । योग की दशा में ही समस्त कर्म
सम्पादन किये जाँय । सकल दिनचर्या के कार्य भोजन करना सोना जगना प्रत्येक को किये
जाने वाले कार्य के रूप में लिया जाय । एक अलग कर्म के स्वरूप में । फिर इस कर्म
को करने के लिये योग की मस्तिष्क की अवस्था प्रयत्न की जाय । जीवन का प्रत्येक पल
योग की मस्तिष्क की अवस्था में करने का अभ्यास । इस बात को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने
बताया –
युक्ताहार्विहारस्य युक्त्चेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ॥
युक्त अर्थात योग की अवस्था में । योग की
अवस्था मस्तिष्क की वह अवस्था जिस पर कार्य के परिणाम का प्रभाव ना पडे । मस्तिष्क
सम भाव में स्थिर रहे । ना ही अनुकूल परिणाम से हर्षित हो ना ही प्रतिकूल प्रभाव
से दु:खी हो । इस योग की अवस्था को जीवन यापन के प्रत्येक छोटे बडे काम का अभ्यास
बनाने का परामर्ष ।
यद्यपि कि अभ्यास एक ऐसी शक्तिशाली विधा
है कि हर असम्भव को सम्भव बनाने वाली होती है । परंतु इसमें जिस दृढता की आवश्यकता
होती है वह ही हर मनुष्य के लिये थोडा दुर्गम प्रतीत होने वाली है । जो व्यक्ति
जीवन को मात्र सुख भोग विलास का निमित्त मान जीवन यापन का अभ्यासी होगा उसके लिये
तो यह असाध्य परामर्ष प्रमाणित होगा ।
आदिकालीन विद्वान महात्माओं ने उपरोक्त
स्थिति पाने के लिये प्रकृति का कृपावान होना भी अति महत्वपूर्ण मानते है । उनका
मत है कि अकेले दृढनिष्चयी होने से ही सफलता नहीं सम्भव होगी अपितु प्रकृति का
कृपावान होना भी आवश्यक है । यह मत सांसारिक परिस्थितियों जिनमें मनुष्य जीवन जीता
है से समबंध रखते हुये है । यदि किसी मनुष्य के समक्ष समस्त वातावरण जिसमें उसे
जीवन जीना है मस्तिष्क को उद्विग्न करने वाले ही हैं तो वह मस्तिष्क को शांत स्थिर
रखने का प्रयत्न कितना सफल कर सकेगा प्रश्नवाचक बन जाता है । संसार के संचालन किसी
एक व्यक्ति के वश में तो होता नहीं । इसी परिपेक्ष्य में जो अलग अलग युगों को बतया
जाता है यथा सतयुग, द्वापर, त्रेता, कलियुग है इन प्रत्येक में समाज की आम स्थिति भिन्न बतायी
गयी है । आम स्थिति जिसमें सत्कर्मों को प्रफुल्लित होने का अवसर मिलता है अथवा
दुर्वृत्तियों को प्रफुल्लित होने का अवसर मिलता है । उपरोक्त सभी विचारों और
परिस्थितियों को संकलित करने पर भी मनुष्य के अपने प्रयत्न का अपना ही महत्व है ।
मनुष्य को जन्म किन परिस्थितियों में मिला है यह उसके अपने वश में नहीं था परंतु
वह अपना जीवन कैसे जीता है यह पूर्णतया उसके अपने वश का होता है । अपने उत्तम
कर्मों के लिये उत्तम कर्म विधा योग द्वारा अपने को उत्कर्ष के लिये चेष्टारत बनाना
ही योग्यतम परामर्ष है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें