बुधवार, 22 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में -
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
योगेश्वर श्रीकृष्ण का उपरोक्त कथन कि प्रत्येक कर्म की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति के कर्तापन का स्वरूप मस्तिष्क में स्थिर करने के उद्देष्य से कुछ एक उदाहरणों का ध्यान निवेदित है । गर्भ में पलने वाले शिशु को जीवन शक्ति कहाँ से उसे प्राप्त होती है । मनुष्य की कौन सी व्यवस्था है जो उस गर्भ में पल रहे जीव को पोषण प्रदान करती है । यह प्रकृति है जो उसे जीवन शक्ति प्रदान करती है । यह प्रकृति का कर्तापन है जो अपने अद्भुद विज्ञान द्वारा यह कृत सम्भव करता है । शून्य से भी कम के तापमानों के स्थानों पर कार्य करने वाले और जीवन यापन करने वाले मनुष्य तथा समुंद्र के अंदर नाविक के रूप में जीवन यापन करने वाले और कर्म सम्पादन करने वाले मनुष्य की परिस्थितियाँ कितनी भिन्न होते हुये भी उनके जीवन यापन और दायित्व कर्म के सम्पादन में एकरूपता की क्षमता उन्हे मनुष्य के किस व्यवस्था से प्राप्त होती है । यह प्रकृति के कर्ता स्वरूप का प्रत्यक्ष स्वरूप है जिसके द्वारा उपरोक्त भिन्नता की परिस्थितियों के होते हुये भी कर्म सम्भव होते हैं । कोई एक विचार किसी एक समय समूचे देश के मनुष्य समुदाय को एक ही रूप में ग्राह्य हो जाते है । कभी एक ही परिवार में प्रिय जनों में भी मत भेद विद्यमान पाये जाते है । यह प्रकृति के कर्तापन का प्रगट रूप प्रतीक है । प्रकृति यह समस्त कैसे करती है यह उसका अपना विज्ञान है । यह प्रकृति का विज्ञान ही है कि प्रत्येक मनुष्य कर्म को करता है तभी जब उस कर्म को करने का कारण वह अपने इच्छा को पाता है । प्रकृति के कर्ता स्वरूप को चिन्हित करने तथा प्रकृति के कर्म करने के विज्ञान की पहचान सृजित होने की दशा में मनुष्य अपने अहंकार की पहचान सरलता से कर सकता है । मनुष्य का अहंकार मात्र एक भ्रामक अनुभूति होती है । सत्य प्रकृति का कर्ता स्वरूप है । प्रकृति किसि काल किसी मनुष्य को किसी कर्म विषेस के लिये किसी निमित्त विषेस के लिये कर्ता रूप प्रदान करती है । यह स्वरूप मनुष्य के लिये स्थायी नहीं होता । वही कर्म एक मनुष्य एक अवसर पर सम्पादित कर अपने में कर्ता का अहंकार पोषित करता है । दूसरे अवसर पर वही मनुष्य उसी कर्म में असफल भी होता है । असफलता की दशा में उसका कर्तापन का अहंकार कहाँ लुप्त हो गया । यह प्रकृति है कि वह किसे कब किस रूप में प्रस्तुत करती है । यह स्वरूप है प्रकृति के कर्ता पन का । प्रकृति एक व्यवस्था है । इसका प्रत्येक प्रगट स्वरूप किसी माध्यम से ही होगा सदैव । माध्यम अपने को कर्ता मान बैठता है । यही भम होता है ।
प्रकृति का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होने की दशा में मस्तिष्क की योग की अवस्था सुगम हो जाती है । मनुष्य के मस्तिष्क द्वारा प्रकृति को कर्ता रूप में स्वीकार करने की दशा ही स्थापना है योगावस्था की । योग की अवस्था जिसमें मस्तिष्क कार्य के परिणाम से प्रभावित नहीं होगा । प्रकृति कर्ता है की मस्तिष्क में ग्राह्यता ही मस्तिष्क में स्वरूप सृजित करेगा जिसमें कार्य ही कार्य करने की निमित्त बन सकेगा । प्रकृति कर्ता है की मस्तिष्क में ग्राह्यता ही मस्तिष्क में स्वरूप सृजित करेगा जिसके परिणाम से कार्य सम्पादन काल में मस्तिष्क में उत्पन्न होगा कार्य के परिणाम के प्रति सन्यास भाव । यह प्रत्येक मस्तिष्क की दशाये मस्तिष्क के विचारों द्वारा ही सम्भव होती हैं । मस्तिष्क के विचार ही श्रोत होते हैं मस्तिष्क के संचालन के । योग्य विचार उत्थान कराते है । कलुषित विचार पतन प्रशस्थ करते है । कर्म सम्पादन का नियंत्रण मस्तिष्क करता है । इसलिये मस्तिष्क की कार्यकाल में दशा ही कार्य की गुणवत्ता के रूप में प्रगट होती है । योग की मस्तिष्क की दशा उत्थान का प्रेरक होता है । कर्म की गुणवत्ता का उत्कर्ष । गुणवत्ता युक्त कर्म प्रशस्थ करेगे शांत कलहरहित जीवन की प्राप्ति को । योग की मस्तिष्क की दशा पाने का श्रोत है प्रकृति के कर्ता स्वरूप की मस्तिष्क में ग्राह्यता ।

इस कर्म प्रधान संसार में कर्म की गुणवत्ता ही एकमात्र आधार है शांत और अशांत जीवन का । इच्छा जनित कार्यों का पोषण अशांति प्रशस्थ करने वाला है । मस्तिष्क की योग की अवस्था में कर्म सम्पादन जीवन में शांति प्रशस्थ करने का पथ है । मस्तिष्क में योग की दशा उत्पन्न करने का सरलतम उपाय है प्रकृति के कर्ता स्वरूप की मस्तिष्क में ग्राह्यता ।   

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