श्रीमद् भागवद गीता में ग्रंथ के अज्ञात
ग्रंथकार विद्वान ने योगेश्वर श्रीकृष्ण के द्वारा बताये गये ज्ञान को जिस प्रकार
प्रस्तुत किया है उसमें सर्वाधिक महत्व दिया है मस्तिष्क की शांत दशा को । शांत
मस्तिष्क ही सर्वाधिक क्षमतायुक्त स्थिति होती है गुणवत्तायुक्त कर्म सम्पादन के
लिये । शांत मस्तिष्क ही योग की अवस्था हासिल कर सकता है । योग की स्थिति में किये
गये कर्म ही सर्वाधिक गुणवत्तायुक्त होते हैं ।
मस्तिष्क की अशांत स्थिति पैदा होती है
इच्छाओं से । इच्छा की पूर्ति के निमित्त मस्तिष्क अनेकानेक सम्भावित उपाय उपस्थित
करता है । उन्ही विकल्पों में से चुनाव करने में मस्तिष्क व्यस्त हो जाता है ।
विकल्पों का जन्म मस्तिष्क की रचनागत गुण के कारण होता है । उनमें से चुनाव मनुष्य
का अपना स्वभाव होता है । यह दोनों प्रक्रिया मस्तिष्क की अशांति का स्वरूप हैं ।
जैसा मस्तिष्क में इच्छा का स्वरूप रहेगा उसी की पूर्ति के अनुरूप विकल्प को
मस्तिष्क चुनेगा अपनाने के लिये । जब मस्तिष्क में कोई अपना चुनाव व्याप्त हो
जावेगा क्रिया रूप में सम्पादन के लिये तो कंचिद योग की मस्तिष्क की स्थिति असम्भव
हो जावेगी । योग की अपेक्षा होती है कर्म के परिणाम से प्रभावित ना होने वाला
मस्तिष्क । इच्छा और उसकी पूर्ति के लिये मस्तिष्क में अपना चुना हुआ पथ पहले से
विद्यमान होने की दशा में योग की स्थिति असम्भव है ।
शांत मस्तिष्क उपस्थित किये गये विकल्पों
में से चुनाव की प्रक्रिया में सम्मलित नहीं होता अपितु प्रतीक्षा करता है प्रकृति
के स्पष्ट आदेश का । विकल्प प्रस्तुत करना तो मस्तिष्क का रचनागत स्वभाव होता है ।
परंतु उन प्रस्तुत किये गये विकल्पों में से चुनाव कर अपनाने की प्रक्रिया तो अपने
वश की होती है । योगेश्वर श्रीकृष्ण इसी प्रक्रिया में ना सम्मलित होने को
अपेक्षित बताते हैं ।
शांत मस्तिष्क द्वारा ही गुणवत्तापूर्ण
कर्म सम्भव होते हैं । कर्म की गुणवत्ता का पतन सदैव कर्म करने वाले व्यक्ति के
स्वयं अपने मस्तिष्क की अशांति द्वारा ही होता हैं । मनुष्य के द्वारा किये जा रहे
समस्त कर्मों का संचालन केंद्र मस्तिष्क ही होता है इसलिये मस्तिष्क की यथास्थिति
का कर्म की गुणवत्ता से सीधा सम्बंध होता है । कर्म की गुणवत्ता ही इस कर्म प्रधान
संसार की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि है । गुणवत्तापूर्ण कर्म के लिये शांत
मस्तिष्क अनिवार्य दशा है । कर्म के प्रति निष्ठावान ।
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