सोमवार, 20 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास पथ होता है कर्म दोष निवारण के निमित्त । यदि कंचिद किसी व्यक्ति को योग की स्थिति स्थापित कर कार्य करना दुश्कर प्रतीत होवे तो उसके लिये कर्म दोष के निवारण का उपाय है भक्ति । प्रकृति की कृपा की विनय द्वारा । इस प्रकार योग की मस्तिष्क की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास करने में समर्थ व्यक्ति अपनावें योग की विधा । परंतु जिन्हे अपने उपर पूरा भरोसा नहीं अपनी क्रियाँओं पर पूर्ण नियंत्रण नहीं जो अपने मस्तिष्क की क्रिया प्रणाली को अंकुश करने मे अपने को समर्थ पाते उन्हे अपनाना होगा भक्ति का मार्ग । आत्मविश्वासी मनुष्य के लिये योग का पथ है । जिन्हे अपने करनी पर नियंत्रण है । जिन्हे अपनी इच्छाओं को अंकुश करने का मनोबल है । उनके लिये योग सर्वोत्तम विधा है ।
इस विचार स्थल पर एक व्यवहारिक जगत के अनुभव पर आधारित अन्य मत भी महत्वपूर्ण बताया गया विद्वानों द्वारा । कुछ विद्वान महात्मा अपना विचार प्रगट करते है कि योग की अवस्था पाने के लिये भी प्रकृति की कृपा अनिवार्य होती है । इस मत का आधार विशेस रूप से शरीर में निहित प्रकृति को विचाराधीन मानते हुये है । इन महात्माओं का कहना है कि जब तक शरीर की प्रकृति का सम्बल नहीं उपलब्ध होगा योग स्थिर नहीं हो सकेगा । इन महात्माओं का विचार है कि पुष्ट शारीरिक दशा के अभाव में योग साध्य नहीं होगा । इस कथन को समझने के लिये एक उदाहरण प्रस्तुत है । एक व्यक्ति के पास प्रचुर धन उसके बैंक के खाते में उपलब्ध है । किन्ही परिस्थितियों में किसी दुर्घटना के फलस्वरूप उसका वह हाँथ जिससे वह हस्ताक्षर करता है टूट जाता है । वह हस्ताक्षर नहीं कर सकता उस समय । धन खाते में होते हुये भी उसे उस समय नहीं मिल सकता । इसी उदाहरण के अनुरूप विद्वान महात्मा का मत है कि एक मनुष्य अपने को योग की दशा में स्थापित कर कार्य करने में समर्थ है । परंतु शारीरिक विघ्न उसे कार्य करने में बाधक बने तो यह शारीरिक असमर्थता का क्या निवारण है । इन विद्वान महात्माओं का मत है कि इस प्रकार के विघ्न के निवारण के लिये भक्ति अनिवार्य है । इस विचार क्रम के समर्थन में कवि निम्नवत वृतांत प्रस्तुत करता है
सुनि मुनि ताहि कहौं सहरोषा । भजहिं जे मोंहि तजि सकल भरोसा ॥
करहुँ सदा तिन्हकर  रखवारी । जिमि   बालक   राखहिं   महतारी ॥
मेरे प्रौढ तनय  सम  ग्यानी । बालक  सुत  सम   दास   अमानी ॥
जनहिं मोर बल निज़ बल ताही । दुहु कर  काम  क्रोध  रिपु  आंही ॥
यहि विचार पण्डित मोंहि भजहीं । पायेहुँ ज्ञान  भगति  नहिं  तजहीं ॥ 
उपरोक्त में ज्ञानी कहा गया है योग अभ्यासी के लिये । अमानी कहा गया है भक्ति उपासक के लिये । कवि का कहना है कि प्रकृति यह व्यक्त करती है कि ज्ञानी अर्थात योगाभ्यासी और भक्त मेरी दोनों ही संतान हैं । मुझे दोनों ही प्रिय हैं । ज्ञानी अपने मस्तिष्क की शक्ति से मेरी सेवा यथा संविधान करता है । भक्त मेरी कृपा से प्राप्त शक्ति से मेरी सेवा करता है । परंतु मेरी उपरोक्त दोनों ही संतानों के लिये उभयनिष्ठ रूप से काम और क्रोध शत्रु के समान होते हैं । काम अर्थात इच्छाये । इच्छा की पूर्ति ना होने की दशा में उत्पन्न होता है क्रोध । यह दोनों ही मेरी उपरोक्त दोनों ही संतानों के कर्म सम्पादन के मार्ग में शत्रु के रूप है । इस कारण योगाभ्यासी ज्ञानी भी योगाभ्यास की उपलब्धि होने के दशा में भी मेरी कृपा के लिये मेरा विनय करता है । वह योगाभ्यासी भी मेरी कृपा की याचना करना छोडता नहीं है ।
प्रकृति की कृपा योगाभ्यासी को अपने शरीर को पुष्ट और कार्य करने में समर्थ बनाये रखने के लक्ष्य से प्रकृति की कृपा याचना का सुझाव । भक्ति । योगाभ्यासी के लिये भी भक्ति । प्रकृति एक ऐसी व्यपक शक्ति है कि इसकी कृपा प्रत्येक विचार से योगकारक है । शरीर भी प्रकृति है । शरीर द्वारा कार्य सम्पादन भी प्रकृति के विज्ञान की महिमा का परिणाम है । इस प्रकार प्रकृति की कृपा विषेस महत्व की होती है । प्रकृति आपके कर्मों को गतिरोध करने को उद्यत ना हो जाय कम से कम इतनी कृपा तो चाहिये ही चाहिये ।

आत्मा कर्म का प्रेरक । प्रकृति कर्म का नियंत्रक । कर्मों की कर्ता प्रकृति । इसी स्वरूप का व्यवहारिक स्वरूप उपरोक्त व्याख्या का आधार है ।  

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