शनिवार, 4 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

कर्म पथ से कर्म दोष का निवारण । कर्म की गुणवत्ता को कर्म संविधान के अनुकूल बनाने का पथ । इस पथ से प्रयत्नशील होने की दशा में साधक व्यक्ति को अपने शरीर के विभिन्न अंगों को जो कर्म सम्पादन में प्रयोग में आते हैं को संयमित नियंत्रित उपयोग की वाँक्षना होती है । शरीर के अंगों की क्रियाशीलता नियंत्रित होती है मस्तिष्क द्वारा । इसलिये कर्म पथ से कर्म दोष निवारण के प्रयत्न में सबसे अधिक मस्तिष्क के संयमित और नियंत्रित संचालन व उपयोग की आवश्यकता होती है । मस्तिष्क की क्रियाशीलता पर आधारित विश्लेषणात्मक व्याख्या गत अंकों में व्यक्त की गई थी । वर्तमान में मस्तिष्क की स्थिति कार्य काल में क्या अपेक्षित होती है के सम्बंध में उद्घृत किया जा रहा है योगेश्वर श्रीकृष्ण का निर्देश
योगस्थ: कुरु कर्माणि सड्गं त्यक्त्वा धनञ्जय: ।
सिद्धयसिद्धियो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥  
   योगस्थ योग की अवस्था में । यह स्थिति बतायी योगेश्वर ने साधक के मस्त्रिष्क के लिये । कहा कि अपने मस्तिष्क को योग की अवस्था में स्थापित कर के कार्य करो । योगस्थ कुरु कर्माणि । कर्म सम्पादन करने से पूर्व साधक को अपने मस्तिष्क की यथास्थिति को योग की अवस्था में सयंमित करने की वाँक्षना बतायी योगेश्वर ने । अर्थात साधक के मस्तिष्क की दशा योग में बनायी जाय । फिर उन्होने योग की स्थिति भी बतायी । योग की मस्तिष्क की स्थिति का अर्थ है कि किये जा रहे कर्म को सम्पादन के फलस्वरूप जनित होने वाले परिणाम से मस्तिष्क प्रभावित ना हो । अर्थात यदि कार्य का परिणाम अनुकूल हो या विपरीत हो प्रत्येक दशा में मस्तिष्क अप्रभावित रहे । अर्थात ना ही मस्तिष्क अनुकूल परिणाम से हर्षित हो और ना ही विपरीत परिणाम से दु:खी हो । यह कहने का अभिप्राय यह हुआ कि मस्तिष्क जो कि सकल इंद्रियों को कार्य में प्रेरित करने के दायित्व से कर्म सम्पादन में सम्मलित हो रहा है वह कर्ता भाव से मुक्त होना चाहिये । वह अपना दायित्व निर्वाह इसलिये कर रहा है कि कर्म करना उसका धर्म है कर्तब्य है । आगे योगेश्वर ने बताया कि समत्वं योग उच्यते अर्थात मस्तिष्क की यही सम स्थिति अर्थात कर्म के परिणाम के प्रति सम स्थिति को योग कहा जाता है । यह एक मस्तिष्क की दशा विषेस है । एक ऐसा मानसिक परिवेश जिसमें कार्य का परिणाम प्रभावी नहीं हो सके । कार्य के परिणाम से अभेद्य स्थिति ।
योग की मस्तिष्क की उपरोक्तानुसार परिभाषित स्थिति स्थापित करने के लिये साधक में सर्वप्रथम तो कार्य के प्रति अपनी इच्छा पूर्णरूपेण शून्य होना अनिवार्य होगा । कार्य के प्रति यदि साधक की अपनी इच्छा होगी तो वह कार्य के परिणाम से मस्तिष्क को अलग कर ही नहीं सकेगा । अर्थात योग की अवस्था में उसका मस्तिष्क स्थापित ही नहीं होगा । इच्छा होने की दशा में उसे अनुकूल परिणाम से हर्ष अवश्य होगा और विपरीत परिणाम से उसे दु:ख अवश्य होगा । फिर वह योग की स्थिति में हुआ ही नहीं ।

 योग की मस्तिष्क की उपरोक्तानुसार परिभाषित स्थिति स्थापित करने के लिये साधक में दूसरी अनिवार्य वाँक्षना होगी कार्य संविधान के प्राविधान को पूर्ण रूप से मस्त्रिष्क को ग्राह्य होना । कार्य की कर्ता प्रकृति है । यह स्वरूप यदि मस्तिष्क श्रद्धा पूर्वक स्वीकार करले तो ही उसमें यह परिवेष व्याप्त होगा कि हमें परिणाम से क्या मतलब कर्ता तो प्रकृत है । हम तो मात्र चालक हैं इस शरीर रूपी यंत्र के । कार्य प्रकृति क्यों करा रही है या इस कार्य से प्रकृति की क्या अपेक्षा है यह मेरा सरोकार नही । मैं तो मात्र कार्य की अपेक्षानुसार कार्य सम्पादित करा दूँ मात्र इतना ही मेरा सरोकार है । 

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