धारणा concept का सृजन स्थल मस्तिष्क है । धारणा के माध्यम से ही
किसी वस्तु, स्थिति, घटना या प्रक्रिया का ज्ञान बोध होता है । ज्ञानेंद्रियाँ
जो भी ज्ञान सूचना बाह्य जगत से ले आती है उनका मस्तिष्क में सर्वप्रथम विश्लेषण
होता है । तत्पश्चात स्मृति में तलाश होती है उस लायी गयी सूचना के अनुरूप संचित
सूचना हेतु । यदि संचित सूचना लायी गयी सूचना के अनुरूप मिल जाती है तब पूर्व की
संचित सूचना के अनुरूप धारणा मस्तिष्क में उभर जावेगी जिसके माध्यम से लायी गयी
सूचना की पहचान हो जावेगी । एक उदाहरण से यह कथन अधिक स्पष्ट हो जावेगा । मानिये
कि आँखो द्वारा किसी आकार की सूचना लायी गयी है । स्मृति से मिलान करने पर जो
आकृति मिलते हुये स्वरूप की स्मृति में पायी गयी उसे कार के नाम से पूर्व में चिन्हित
किया गया था तो वर्तमान लायी गयी सूचना की पहचान या सज्ञान मस्तिष्क कार के रूप
में लेगा । भले ही कार के हजारों स्वरूप प्रचलित हैं परंतु मस्तिष्क की धारणा कार
के रूप में ही वह ग्रहण करेगा । यहाँ यह उल्लेख भी महत्वपूर्ण होगा कि जब तक
मस्तिष्क में लायी गई सूचना के सम्बंध में कोई धारणा नहीं कायम होगी तब तक
मस्तिष्क उस सूचना का सज्ञान नहीं ग्रहण कर सकेगा । अर्थात वह अंधकार में रहेगा ।
धारणा का सृजन होने पर ही ज्ञान सम्भव है ।
समस्त कर्म
सम्पादन में मस्तिष्क तथा मस्तिष्क की कार्य क्षमता तथा मस्तिष्क की विषयों को
ग्रहण करने की दक्षता ही सबसे महत्वपूर्ण भागीदारी करता है । इस आलोक में उपरोक्त
प्रस्तर में वर्णित धारणा सृजित करने की मस्तिष्क की क्षमता विषेस विचारणीय विषय
के रूप में ग्रहण की जानी चाहिये । धारणा यदि नित्य स्वरूप वाले वस्तुओं की कायम
करना है मस्तिष्क को तो समस्या उतनी जटिल नहीं होती । परंतु धारणा जब भाववाचक
संज्ञा जैसे खुशी अथवा दु:ख अथवा वेदना या धैर्य (चारित्रिक गुण) या मिठास (स्वाद)
या गंध जैसे भाव या गुणों की श्रेणी के विषयों की कायम करना होता है मस्तिष्क को
तो अपेक्षाकृत कठिन प्रयास होता है । परंतु विडम्बना यह कि बिना धारणा के सृजन
हुये कोई ज्ञान सम्भव नहीं होता । इसलिये धारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है ।
त्रुटिपूर्ण धारणा सृजित होने की दशा कर्म को त्रुटिपूर्ण बनायेगा । इसी आलोक में
किसी भी ज्ञान के लिये गुरू आवश्यक होता है । जो ज्ञेय की धारणा सृजित करा दे
सीखने वाले के मस्तिष्क में । ज्ञेय की कोई पहचान सीखने वाले के स्मृति भण्डार में
उपलब्ध नहीं है । यही स्थिति जिसमें जानने को आतुर मस्तिष्क कोई सहारा ऐसा नहीं
पाता जिसके माध्यम से वह विषय को समझ सके अंधकार स्वरूप होता है । उसे वह समझना
चाहता है परंतु कोई मार्ग नहीं मिलता जिसके सहारे उस विषय की धारणा वह अपने मस्तिष्क
में स्थापित कर सके । यही अंधकार उपस्थित होता है निर्गुण ब्रम्ह की उपासना करने
के पथ में । निर्गुण ब्रम्ह समस्त ज्ञान इंद्रियों की ज्ञान सीमा के परे होता है
इसलिये स्मृति भण्डार में उसकी धारणा कायम करने के लिये कोई आधार नहीं मिलता ।
कर्म पथ से कर्म
दोष सुधार का पथ अति प्रभावी और परिणाम पोषक पथ है । कर्म को सज्ञान पूर्वक किया जाय
। सज्ञान के लिये विषेस महत्वपूर्ण धारणा है । इसलिये मस्तिष्क की धारणा ग्रहण करने
की क्षमता को जितना ही प्रखर बनाया जायेगा उतना ही कर्म की गुणवत्ता में वृद्धि होगी
। धारणा वस्तु रूप की सरल होती है । विषेस दक्षता भाववाचक की धारणा के ग्रहण करने की
अभ्यास करना चाहिये ।
इस विचार स्थल पर
कर्म संविधान का उल्लेख करते है । कर्म संविधान बताता है कि समस्त कर्मों की कर्ता
प्रकृति है । यहाँ पहले प्रकृति की धारणा विचार किया जाय । मनुष्य शरीर भी प्रकृति
है । समस्त फैला हुआ रूप संसार सब प्रकृति है । मनुष्य में कार्य करने की प्रवृत्ति
भी प्रकृति है । विचारणीय है कि कर्म जिसका विचार किया जा रहा है उसमें उपरोक्त सभी
रूपों में कौन सा रूप है जो कर्म का कर्ता है । यही धारणा यदि कचिद मस्तिष्क में स्थापित
हो जाय तो कार्य सुगम हो जाय । उपरोक्त सभी स्वरूप जो प्रकृति के लिखे गये वह कर्म
में कर्ता के रूप में सम्मलित हैं । वाह्य जगत में समस्त रूपों में फैली हुई प्रकृति
प्रेरित करती है शरीर की प्रकृति रूप को । शरीर की प्रकृति प्रेरित करती है व्याप्त
कर्म करने की प्रवृत्ति प्रकृति को । ब्याप्त कर्म करने की प्रवृत्ति प्रेरित करती
है इंद्रियों की प्रकृति को । कर्म की चेष्टा सृजित हो गयी । इस प्रकृया की धारणा मस्तिष्क
में जितना स्पष्ट और प्रखर मस्तिष्क ग्रहण कर सकेगा उतना ही कर्म की गुणवत्ता वृद्धि
सम्भव होगी । इंद्रियों की कर्म चेष्टा का श्रोत प्रकृत होना चाहिये ।
सज्ञानपूर्वक अभ्यास
ही एक मात्र विकल्प है ।
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