कर्म पथ से कर्म
की त्रुटि सुधार सर्वोत्तम उपाय है । कर्म को सज्ञान पूर्वक किया जाय । त्रुटियों
को जानते हुये उनसे बचते हुये कार्य किया जाय । त्रुटियाँ यद्यपि की कुछ ही होती
हैं परंतु इनकी प्रवित्ति अति प्राचीन होती है । असंख्य जन्मों से इन त्रुटियों की
पुनरावृत्ति होती आयी है । इसलिये त्रुटियाँ सहज प्रवित्ति समान बन चुकी होती है ।
इसलिये सुधार की प्रक्रिया में सतत सतर्कता तथा परीक्षण आवश्यक होता है । साधक को
सतत अपने मस्तिष्क की यथास्थिति व कार्य की गुणवत्ता को परीक्षित करते रहने की आवश्यकता
होती है । यह कार्य कोई भी बाहरी माध्यम द्वारा सम्भव नही हो सकता है । यह परीक्षण
स्वत: साधक ही कर सकता है । प्रकृति की सहज प्रवृत्ति पतन की होती है । जल वृष्टि
आकाश से पर्वत पर पर्वत से पृथवी पर पृथवी पर ऊँचे से नीचे जल प्रवाहित होते हुये
समुद्र तक जाता है । इसी प्रकार मनुष्य में जन्म समय जो प्रवृत्तियाँ जिस स्तर पर
होती हैं वे सभी उसके विकास के साथ पतन की ओर अग्रसर होती है । इस प्रकृतीय
सामान्य पतन की प्रकृया के विरुद्ध व्यक्ति को विषेस प्रयत्नों के माध्यम से
उत्थान को पाना होता है ।
इच्छा जनित कार्य
को करना पहली त्रुटि है । कर्तापन का अहंकार दूसरी त्रुटि होती है । यह दोनो ही
अनंत काल से हर मनुष्य अपनाते कार्य करता आया है । यदि विद्या के प्रभाव से कंचिद
त्रुटि का बोध होता है और वह मनुष्य त्रुटि का सुधार करने को सचेष्ट होता है तो
अनंत काल से बरती जा रहीं त्रुटियाँ इतने सहज छोड चली नहीं जाती । वह जरा भी
असावधानी की स्थिति पाते पुन: प्रभावी होने की चेष्टा करती हैं । इसलिये साधक
व्यक्ति को लगातार सतर्क प्रयत्न आवश्यक होते है । साथ ही अपनी मानसिक स्थिति व
कर्म की गुणवत्ता का परीक्षण भी करते रहना आवश्यक होता है । अपनी मानसिक स्थिति का
परीक्षण इच्छा के प्रवेश को परीक्षित करने हेतु तथा कर्मों की गुणवत्ता उत्थान का
स्तर निर्धारित करने के उद्देष्य से । इसी प्रकार परीक्षण और प्रयत्न करते मंजिल
मिलती है ।
साधना तपस्या
होती है । हम सभी युगो से इच्छाओं को पोषित करते कर्म करते आये हैं इसलिये इच्छा
जनित कर्मों से बचते हुये प्रकृति प्रेरित कर्मों का अभ्यास प्रारम्भिक अवस्था में
अति दुष्कर प्रतीत होगा । परंतु जैसे जैसे अभ्यास बढता जायेगा प्रयत्न उतना दुष्कर
नहीं रह जावेगा जितना प्रारम्भ समय था । एक स्थिति आ जाती है जब प्रकृति प्रेरित
कर्म ज्यादा अच्छे लगने लगते हैं । इच्छा जनित कर्मों का भयावह स्वरूप तब ही
पहचानने में आता है । जीवन में व्याप्त समस्त तनाव व व्यग्रता मात्र इन्ही इच्छा
जनित कार्यों के फल हैं । प्रकृति प्रेरित कार्यों का पथ शांत आनंदमय जीवन दायक है
।
प्रयत्नों के
प्रारम्भिक अवस्था में एक अति सामान्य प्रश्न प्रत्येक साधक के मस्तिष्क में उभरता
है कि हम प्रकृति प्रेरित कार्यों की पहचान कैसे करे ? प्रश्न स्वाभाविक रूप से सत्य इसलिये है कि हम अनंत काल से
इच्छा जनित कर्मों को ही करते आये हैं और हम कर्म की पहचान इच्छाओं से ही करते ही
है । परंतु यही वह स्थल है जहाँ पल भर अपने समस्त मानसिक और भौतिक गतिविधियों को
विश्राम दे कर हमें अपने मस्तिष्क को स्वयँ देखना होगा कि उसकी व्यस्तता क्या है ? वह सहज प्रकृति के प्रति कितना सजग है या गाफिल है ? वह हमारे आस पास घटित हो रही स्थितियों को कितनी
मान्यता प्रदान कर रहा है ? स्वयँ अनुभव होगा कि इच्छा जनित
क्या है और प्रकृति पेरित क्या है ।
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