मनुष्य का
मस्तिष्क नियंत्रक होता है उसके समस्त कर्म सम्पादन का । इसलिये कर्म की गुणवत्ता
पूर्णतया मस्तिष्क की सक्षमता पर आश्रित होती है । मस्तिष्क की कार्य दक्षता और
उसमें व्याप्त विचारों के परिवेश ही प्रगट होते है उसके उसके कार्य के रूप में ।
इन्ही कारणों से धर्म दर्शन के विद्वानों ने जो भी सुझाव उत्थान के लिये बताये वह
सभी एक स्वस्थ्य विचार क्रम मस्तिष्क में सृजित करने के उद्देष्य से प्रेरित है ।
मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये आतुर होता है । इच्छा पूर्ति अकेले उस
मनुष्य के अपनी सीमाओं के अधीन तो होती नही अपितु समाज के अन्य व्यक्ति भी उसके
प्रयत्नों से प्रभावित होते है । इसलिये उसके स्वयं के एकाकी विचार निर्णायक नहीं
हो सकते । सामाजिक आचरण सभी के हितों के व्यापक विचार से बने होते हैं । इसलिये
यदि एक मनुष्य की इच्छाये उस सामाजिक व्यवस्था के अनुकूल या प्रतिकूल होने की दशा
में उस मनुष्य को विसम मानसिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करेगा । परंतु यदि कंचिद
मनुष्य यह महसूस करे कि जिस प्रकृति ने इतने बडे मनुष्य समुदाय को जन्म दिया है वह
प्रकृति प्रधान अस्तित्व है न कि एकाकी मनुष्य तो शायद धर्म दर्शन में व्यक्त
विचार उसे सहज ग्राह्य हो जाँय ।
योग एक विशिष्ट
स्थित है मनुष्य के मस्तिष्क की । मस्तिष्क जब यह धारण करले कि समस्त कर्मों की
कर्ता प्रकृति है । हम एक एकाकी मनुष्य के रूप में व्यापक प्रकृति के एक सूक्ष्म
घटक हैं और प्रकर्ति की अपेक्षानुसार मुझे कर्म करना है । वह योग की अवस्था में
स्थापित हो गया । कर्म तो प्रत्येक को भिन्न ही करना है । प्रकृति ने प्रत्येक
मनुष्य को किसी भिन्न प्रयोजन के लिये ही बनाया है । प्रकृति की अपेक्षा प्रत्येक
मनुष्य से भिन्न कर्म के लिये ही होगी । परंतु प्रत्येक मनुष्य के भिन्न भिन्न
कर्मों के सम्पादन में भी एक उभयनिष्ट मानसिक पृष्ठभूमि की अपेक्षा है योग अर्थात
प्रकृति ही कर्ता है कर्म की का आधारभूत ग्राह्यता । इस योग की अवस्था का एक
स्वाभाविक प्रतिफल यह होगा कि कर्ता मनुष्य को कर्म फल की कोई आकाँक्षा नहीं रह
जावेगी ।
इस योग को धारण
करने में बाधा कोई बाह्य शक्ति नहीं होती अपितु मनुष्य की अपनी ही इच्छाये होती है
। इच्छा जो कि उसके प्रत्येक कर्म में समायी हुई है । इच्छा पूर्ति ही कर्म करने का
निमित्त बन गई है मनुष्य की । यह इच्छा की व्याधि अनंत काल से ग्रसित किये हुये है
प्रत्येक मनुष्य को । परंतु यदि कोई एकाकी मनुष्य सचेष्ट हो जावेगा अपने इस व्याधि
को निर्मूल करने के लिये तो निश्चय ही यह व्याधि पराजित होगी । इन प्रयत्नों के
लिये कर्म पथ अर्थात योग सर्वोत्तम विधा है । प्रत्येक आम दिनचर्या में किये जाने
वाले कर्मों में इसका अभ्यास करते हुये बडे से बडे कार्यों तक यह सुगम हो जावेगा
कभी किसी विषय
पर पूरे समूचे देश में एक विचार मान्य हो जाता है । क्या यह किसी व्यक्ति विषेस के
प्रभाव से सम्भव हो सकता है ? कंचिद प्रकृति की महिमा से ही
सम्भव होता है । उस विषय का सूत्रपात करने के लिये प्रकृति किसी एक व्यक्ति को
प्रयोग करेगी । यदि उस व्यक्ति को कोई श्रेय देना चाहे कि यह सर्वमान्य स्थिति व्यक्ति
की उपलब्धि है तो कंचिद यह सत्य अभिव्यक्ति नहीं होगी । विषय का प्रारम्भ करने का श्रेय
एक स्थिति है और समूचे समुदाय को ग्राह्य हो जाना यह भिन्न स्थिति है । यही प्रकृति
की व्यापक व्यवस्था और उसकी असीम शक्ति मनुष्य यदि कंचिद ग्रहण कर सके तो योग अवस्था
उपलब्ध करना उसे सुगम हो जाय । बाधक अहंकार होता है जो नहीं ग्राह्य होने देता है ।
मनुष्य की सहज प्रवृत्ति अपने को कर्ता रूप में प्रगट करने की है । यह हर व्यक्ति के
साथ है । इसी अहंकार का मर्दन अनिवार्य होता है ।
प्रकृतीय व्यवस्था
का सहज स्वभाव पतन का होता है । उत्थान सदैव विषेस प्रयत्नों से ही सम्भव होता है ।
इन दोनों ही अभिव्यक्तियों का कोई अपवाद नहीं होता । यह दोनो ही ध्रुव सत्य हैं । चुनाव
प्रत्येक व्यक्ति का अपना अधिकार है ।
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