रविवार, 12 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

योग की अवस्था में कार्य करना योग्य विधि बतायी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने । मस्तिष्क की वह दशा जिसमें कार्य के परिणाम से मस्तिष्क प्रभावित ना हो को योग बताया । योग की अवस्था में मस्तिष्क को स्थापित करके किये गये कार्य के परिणाम के प्रति कार्य का कर्ता सन्यासी होता है । योग की अवस्था में कार्य करने की दशा में कर्ता व्यक्ति अपनी सकल कार्य क्षमता का प्रयोग मात्र कुशलता पूर्वक कार्य की अपेक्षानुसार कार्य को सम्पादित करने में प्रयोग करता है । उपरोक्त समस्त को अपने कार्य का अभ्यास बना कार्य करने वाला व्यक्ति कर्मयोगी कहायेगा । एक आदर्श व्यक्ति । भगवान श्रीकृष्ण कर्मयोगी थे ।
योग की उपरोक्त समस्त वाँक्षनायें किसी व्यक्ति में उसी दशा में परिलक्षित होंगी यदि वह इच्छाओं का पूर्ण दमन करने में समर्थ हो सकेगा । इच्छा प्रकृतीय गुणों के भोग के प्रति । इच्छा प्रकृतीय घटको के स्वामित्व के प्रति । इच्छा उपलब्ध प्रकृतीय घटको की रक्षा के प्रति । कर्तापन के भाव के प्रति । यही सब योग अवस्था के लिये बाधक होते हैं ।
कार्य का कुशल संचालन कार्य की अपेक्षानुसार उसी दशा में सम्भव होगा यदि कार्य करना ही धर्म है की भावना कर्ता के हृदय में विद्यमान होगी । कार्य ही कार्य करने का निमित्त बन सकेगा । प्रकृति कर्ता है । कर्ता व्यक्ति प्रकृति का मात्र प्रतिनिधि है । इन भावो को नित्य कर्ता का मनोभाव बनना ही योग है ।
योग ही वह आदर्श मनोदशा है जिसे अपनाने पर कर्म दोष से व्यक्ति पूर्णतया मुक्त हो जावेगा । इस कर्मप्रधान संसार में जिस व्यक्ति के कर्म दोषरहित होंगे वही श्रीमान होगा । योग की अवस्था पाने का प्रयत्न ही एकमात्र योग्य उपलब्धि है । यही आनंद की अवस्था का प्रवेश द्वार है । आनंद की प्राप्ति ही दिव्यशांति होगी । मस्तिष्क में उठने वाले समस्त वासनाओं के प्रति विचार ही समस्त दु:खो की मूल होते है । इन्ही वासनाओं की पूर्ति करने वाले समस्त कर्म ही कर्ता व्यक्ति के कर्म दोष बनते है । इनके विपरीत शांत मस्तिष्क ही सत्कर्मों का पोषक होता है । शांत मस्तिष्क ही कर्ता व्यक्ति को कार्य में दक्ष बनाता है । इस संसार में गुणों की ही मर्यादा है । योग ही सर्वोत्तम गुण है ।

नित्य प्रतिदिन के प्रत्येक छोटे बडे कार्यों में योग की अवस्था में संलग्न होने वाला व्यक्ति ही योग की उपलब्धि पाता है । अभ्यास ही उपलब्धि बनती है । योग की मानसिक स्थिति का अनुभव पाने के उपरांत संसार के समस्त अन्य अनुभव स्वत: बलहीन प्रमाणित होंगे । किसी बाह्य परामर्ष की आवश्यकता ही नही होगी । परंतु यह उपलब्धि मिलेगी स्वयं अपने प्रयत्नो से ही । यह क्रय से सम्भव नहीं होगी । 

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