शनिवार, 11 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि योग की अवस्था में कार्य करो और प्रकृति के प्रति जो मोह हृदय में व्याप्त है उसका त्याग कर दो । पुन: स्पष्ट किया कि योग क्या है । मस्तिष्क की वह दशा जिसमें उस पर कार्य के परिणाम से प्रभाव ना पडे । ना ही अनुकूल परिणाम मिलने की दशा में हर्षित हो ना ही विपरीत परिणाम मिलने की दशा में वह दु:खी हो । पुन: बताया कि कार्य यदि योग की दशा में करोगे तो तुम समस्त सुख और दु:ख उत्पन्न करने वाले कर्म दोषों से पूर्णतया मुक्त हो जावोगे ।
योग की अवस्था में कार्य करने के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण और आगे उपलब्ध होने वाली स्थितियों का विवरण बताते हुये कहते हैं
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं  कर्म   कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते ॥
प्रयत्नशील मनुष्य जो योग की अवस्था में कार्य करने का अभ्यास करना प्रारम्भ करेगा तो प्रारम्भिक अवस्था में उस साधक के सम्मुख किये जाने वाला कार्य ही कार्य करने का कारण स्वरूप प्रगट होगा । इस कथन का अभिप्राय हुआ कि किसी भी कार्य को करने का कोई निमित्त होना एक स्वाभाविक वाँक्षना होती है । उदाहरण के लिये किसी व्यक्ति को स्नान करना है । इस स्नान कर्म का निमित्त होगा शरीर को पवित्र बनाना । किसी क्षात्र को पढना है । पढाई का निमित्त होगा विषय का ज्ञान अर्जित करना । यहाँ योगेश्वर योग की अवस्था में कार्य करने का विलक्षण कारण निमित्त बताते हैं । कहते हैं कि वह कार्य जिसे करना है वह कार्य ही स्वयं निमित्त स्वरूप होगा कार्य को करने के लिये । योगावस्था में कार्य करने का अद्भुद निमित्त, योग का मूल अर्थात कार्य की कर्ता प्रकृति है, साधक एक यंत्र स्वरूप उस निमित्त को धारण कर कि कार्य करना ही उसका धर्म है कर्तब्य है के मनोभाव से कार्य ही उसका कार्य करने का कारण है मानते हुये कार्य सम्पादन में संलग्न होगा । इस श्लोक के रचयिता विद्वान महात्मा की विलक्षण अभिव्यक्ति क्षमता कि उन्होने कार्य काल में साधक मनुष्य को किस मन:स्थिति मं अपने को प्रस्तुत करना है नियंत्रित मस्तिष्क द्वारा कार्य में संलग्न होना है, जो कि लक्ष्य प्राप्ति के लिये सहायक होगा को व्यक्त किया है । जहाँ पहले योग बताते हुये यह बताया कि मस्तिष्क की ऐसी दशा जिस पर कार्य के परिणाम से प्रभाव ना पडे । वहीं आगे साधक की सहायता के लिये उन्होने कार्य का क्या निमित्त मस्तिष्क में धारण करने से योग के लिये वाँक्षित मस्तिष्क की स्थिति प्राप्त होगी उसे भी स्पष्ट किया । कहा कि योग अवस्था में कार्य करने वाले के सम्मुख योग अवस्था मे कार्य करने की प्रारम्भिक स्थिति में कार्य ही कार्य के निमित्त स्वरूप होगा या होना चाहिये । एक योग को अपना कर कार्य करने वाले प्रयत्नशील व्यक्ति को इससे अधिक सहायता कौन गुरू प्रदान कर सकेगा ।
उपरोक्त श्लोक के उत्तरार्ध में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब प्रयत्नशील साधक योग अवस्था में कार्य करने में संलग्न हो जावेगा तो उसकी मन:दशा निमित्त से हटकर कार्य सम्पादन व कार्य परिणाम की ओर घूमेगी तो उस स्थिति के लिये मार्ग दर्शन दिया कि कार्य परिणाम के प्रति सन्यास अर्थात कार्य के परिणाम से सरोकार ना होना उसका प्रधान लक्ष्य बन जावेगा अथवा बन जाना चाहिये । प्रत्येक स्थिति अर्थात कार्य सम्पादन प्रारम्भ करने से पूर्व और कार्य सम्पादन काल व अंत में कार्य परिणाम की अंतिम स्थिति पर्यंत साधक मनुष्य के मस्तिष्क की क्या स्थिति रहने से उस व्यक्ति का कार्य सम्पादन योग की मंन्शा के अनुकूल होगा को बताया ।
उपरोक्त दोनो प्रस्तरो में विचाराधीन श्लोक के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध का जो उल्लेख किया गया उसे यदि प्रयत्नशील व्यक्ति अपने मस्तिष्क में धारण कर योग की अवस्था में कार्य करेगा तो उसके कार्य की गुणवत्ता को कुशल श्रेणी मे वर्गीकृत किया जावेगा ।
ऐसे योगी के कार्य सम्पादन का परिणाम होगा कि वह समस्त पाप और पुण्य सृजित करने कर्मों से मुक्त हो जावेगा । ऐसे ही योगी के लिये पूर्व में कहा गया श्लोक
बुद्धियुक्तो   जहातीह   उभे    सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम् ॥

पूर्णरूप से प्रभावी फलदायक प्रमाणित होगा । इस श्लोक की व्याख्या पूर्व के अंको में व्यक्त की जा चुकी है । इसलिये पुनरावृत्ति उचित नहीं होगी । 

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