गत अंक की चर्चा के क्रम में -
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणि सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
प्रकृति का कर्ता स्वरूप । नवजात शिशु
अपने जननी माँ के प्रति जिस आश्रय भाव को समाहित कर उसके प्रति आशांवित रहता है
उसका यह भाव उसे प्रकृति की देन होती है । प्रकृति यह भाव उस अबोध शिशु के
मस्तिष्क में किस प्रकार उत्पन्न करती है यह प्रकृति का विज्ञान है । माँ अपने
जन्माये शिशु के प्रति जो वात्सल्य प्रेम हृदय में संजोये उसकी सेवा व सुरक्षा
करती है उसके लिये समाज ने उसे अलग से कोई प्रशिक्षण नहीं दिया होता है । यह प्रकृति
की देन उस माँ को मिली है । प्रकृति ने इसे कैसे दिया यह प्रकृति का विज्ञान होता
है । यह माँ का वात्सल्य स्वजन्में शिशु के प्रति किसी वर्ग विषेस अथवा किसी देश
विषेस में एकाकी रूप से नहीं होता । यह पूरे मनुष्य समाज में एक ही रूप में पाया
जाता है । मात्र मनुष्य ही इसकी सीमा नहीं है । समूचे जीव वर्ग में यह वात्सल्य
होता है । यह होता है व्यापक प्रकृति के कर्तापन का स्वरूप ।
विजातीय लिंग के प्रति आकर्षण मोह ।
स्त्री के प्रति पुरुष का आकर्षण । पुरुष के प्रति स्त्री का आकर्षण । इसके लिये
किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती । यह प्रकृति कैसे उत्पन्न करती है स्त्री और
पुरुष के मस्तिष्क में यह प्रकृति का विज्ञान है । होता प्रत्येक वर्ग समुदाय और
देश में है । मात्र मनुष्य ही नहीं समूचे पशु पक्षी में भी देखा जाता है । यह
व्यापक प्रकृति की देन होती है । यह व्यापक प्रकृति के कर्ता स्वरूप का परिचायक है
।
पशु पक्षी व मनुष्य उभयनिष्ठ रूप से
अनेको ऐसे कर्म परिचय विदित करते है जिनसे प्रकृति का कर्ता स्वरूप स्पष्ट
दृष्टिगत होता है । पालतु पशु अपने पालने वाले जिससे उन्हे आहार व अन्य पोषण
प्राप्त होता है के प्रति जिस आशांवित निष्ठा से आचरण करते है वह उन्हे किसी
प्रशिक्षण द्वारा नहीं दी गई होती है । यह प्रकृति ने उन्हे दिया होता है ।
प्रकृति अपने कर्मों को विलक्षण विज्ञान के द्वारा करती है । यह प्रकृति के कर्ता
स्वरूप की अद्भुद कार्य शैली है ।
जल समुद्र से वाष्प बन आकाश में समा जाता
है । आकाश विस्तृत हो फैल कर समस्त भू-मण्डल पर वर्षा करता है । यह समस्त
प्रक्रिया मनुष्य का कौन सा सन्यंत्र करता है । कौन सी व्यापारिक कम्पनी करती है ।
किस देश का शासनतंत्र इसे नियंत्रित करता है । यह व्यापक प्रकृति का विस्तृत कर्ता
स्वरूप का परिचायक है ।
नवजात शिशु अवस्थाओं से गुज़रते नवयुवक
फिर प्रौढ फिर वृद्ध अवस्था पर्यंत की स्थितियों को प्राप्त करता है । समूचे
मनुष्य समुदाय में कौन सी संस्था अथवा वर्ग अथवा शासनतंत्र इसे सम्पादित कर रहा है
। यह प्रकृति की कर्ता सामर्थ्य का परिणाम होता है ।
इन उदाहरणों की गणना अपरिमित है । समस्त
संसार में जो कुछ भी हो रहा है सब कुछ प्रकृति ही कर रही है । मनुष्य का कर्म है
उसका अहंकार जिसका कोई अस्तित्व है ही नहीं । मात्र मनुष्य का दम्भ है । मनुष्य
अपने अहंकार के भ्रम में मात्र चेष्टा करता है अपनी प्रकृतीय आसक्तियों की कामना
और उन कामनाओं की पूर्ति हेतु । यह प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । इसलिये
ब्रम्ह की सुंदरता से युक्त है । ब्रम्ह की व्यवस्था है । इसलिये समस्त कर्मों की
कर्ता है । प्रकृति ब्रम्ह के प्रति निष्ठावान है । इसलिये अनुशासन इसका प्रधान
लक्ष्य है । ब्रम्ह की आज्ञाकारी है । इसलिये न्याय इसका आधार है ।
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