गुरुवार, 23 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में -
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
प्रकृति का कर्ता स्वरूप । नवजात शिशु अपने जननी माँ के प्रति जिस आश्रय भाव को समाहित कर उसके प्रति आशांवित रहता है उसका यह भाव उसे प्रकृति की देन होती है । प्रकृति यह भाव उस अबोध शिशु के मस्तिष्क में किस प्रकार उत्पन्न करती है यह प्रकृति का विज्ञान है । माँ अपने जन्माये शिशु के प्रति जो वात्सल्य प्रेम हृदय में संजोये उसकी सेवा व सुरक्षा करती है उसके लिये समाज ने उसे अलग से कोई प्रशिक्षण नहीं दिया होता है । यह प्रकृति की देन उस माँ को मिली है । प्रकृति ने इसे कैसे दिया यह प्रकृति का विज्ञान होता है । यह माँ का वात्सल्य स्वजन्में शिशु के प्रति किसी वर्ग विषेस अथवा किसी देश विषेस में एकाकी रूप से नहीं होता । यह पूरे मनुष्य समाज में एक ही रूप में पाया जाता है । मात्र मनुष्य ही इसकी सीमा नहीं है । समूचे जीव वर्ग में यह वात्सल्य होता है । यह होता है व्यापक प्रकृति के कर्तापन का स्वरूप ।
विजातीय लिंग के प्रति आकर्षण मोह । स्त्री के प्रति पुरुष का आकर्षण । पुरुष के प्रति स्त्री का आकर्षण । इसके लिये किसी शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती । यह प्रकृति कैसे उत्पन्न करती है स्त्री और पुरुष के मस्तिष्क में यह प्रकृति का विज्ञान है । होता प्रत्येक वर्ग समुदाय और देश में है । मात्र मनुष्य ही नहीं समूचे पशु पक्षी में भी देखा जाता है । यह व्यापक प्रकृति की देन होती है । यह व्यापक प्रकृति के कर्ता स्वरूप का परिचायक है ।
पशु पक्षी व मनुष्य उभयनिष्ठ रूप से अनेको ऐसे कर्म परिचय विदित करते है जिनसे प्रकृति का कर्ता स्वरूप स्पष्ट दृष्टिगत होता है । पालतु पशु अपने पालने वाले जिससे उन्हे आहार व अन्य पोषण प्राप्त होता है के प्रति जिस आशांवित निष्ठा से आचरण करते है वह उन्हे किसी प्रशिक्षण द्वारा नहीं दी गई होती है । यह प्रकृति ने उन्हे दिया होता है । प्रकृति अपने कर्मों को विलक्षण विज्ञान के द्वारा करती है । यह प्रकृति के कर्ता स्वरूप की अद्भुद कार्य शैली है ।
जल समुद्र से वाष्प बन आकाश में समा जाता है । आकाश विस्तृत हो फैल कर समस्त भू-मण्डल पर वर्षा करता है । यह समस्त प्रक्रिया मनुष्य का कौन सा सन्यंत्र करता है । कौन सी व्यापारिक कम्पनी करती है । किस देश का शासनतंत्र इसे नियंत्रित करता है । यह व्यापक प्रकृति का विस्तृत कर्ता स्वरूप का परिचायक है ।
नवजात शिशु अवस्थाओं से गुज़रते नवयुवक फिर प्रौढ फिर वृद्ध अवस्था पर्यंत की स्थितियों को प्राप्त करता है । समूचे मनुष्य समुदाय में कौन सी संस्था अथवा वर्ग अथवा शासनतंत्र इसे सम्पादित कर रहा है । यह प्रकृति की कर्ता सामर्थ्य का परिणाम होता है ।

इन उदाहरणों की गणना अपरिमित है । समस्त संसार में जो कुछ भी हो रहा है सब कुछ प्रकृति ही कर रही है । मनुष्य का कर्म है उसका अहंकार जिसका कोई अस्तित्व है ही नहीं । मात्र मनुष्य का दम्भ है । मनुष्य अपने अहंकार के भ्रम में मात्र चेष्टा करता है अपनी प्रकृतीय आसक्तियों की कामना और उन कामनाओं की पूर्ति हेतु । यह प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । इसलिये ब्रम्ह की सुंदरता से युक्त है । ब्रम्ह की व्यवस्था है । इसलिये समस्त कर्मों की कर्ता है । प्रकृति ब्रम्ह के प्रति निष्ठावान है । इसलिये अनुशासन इसका प्रधान लक्ष्य है । ब्रम्ह की आज्ञाकारी है । इसलिये न्याय इसका आधार है ।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें