मंगलवार, 21 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

योगेश्वर श्री कृष्ण ने बताया
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
जो भी कर्म क्रिया रूप में सम्पन्न हो रहा है उसकी कर्ता प्रकृति है । जो व्यक्ति क्रिया के इस रूप को देखता है वह कर्ता को देखता है ।
प्रकृति ब्रम्ह की व्यवस्था है । व्यवस्था इस संसार के संचालन के निमित्त । व्यवस्था इस संसार के स्वरूप के निमित्त । व्यवस्था इस संसार के प्रगति के निमित्त । व्यवस्था इस संसार के सामाजिक स्वरूप के प्रति । व्यवस्था इस संसार के स्थायित्व के निमित्त । प्रकृतीय व्यवस्था का स्वरूप भाववाचक है । इस प्रकृतीय व्यवस्था का आधार न्याय है । यह  प्रकृतीय व्यवस्था ब्रम्ह की आज्ञाकारी है । प्रकृतीय व्यवस्था ब्रम्ह के प्रति निष्ठावान है । मनुष्य प्रकृतीय व्यवस्था का एक सूक्ष्म कार्यकारी घटक है ।
प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति है । प्रकृति ब्रम्ह का प्रगट स्वरूप है । प्रकृति गुणयुक्त है । प्रकृति समस्त गतिविधियों की संचालक है । प्रकृति समस्त गतिविधियों की नियंत्रक है । प्रकृति के स्वरूप की धारणा मस्तिष्क में ग्राह्य होने पर ही इसकी क्रिया सम्पादन क्षमता इसका कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना सम्भव होगा ।
जिस प्रकार प्रजातंत्र में प्रजातंत्रीय व्यवस्था कार्य करती है । प्रजातंत्र में जीवन यापन करने वाला मनुष्य महत्व का नहीं होता । चाहे उस मनुष्य विषेस की यथास्थिति जो भी हो । चाहे वह शासन तंत्र में अधिकारी हो । चाहे व्यवसायी हो । चाहे श्रमिक हो । चाहे किसान हो । चाहे कुछ भी सामाजिक स्थिति हो । धनपती हो । समाजसेवी हो । चाहे समाज सुधारक हो । चाहे राजनेता हो । परंतु कोई भी महत्वपूर्ण नहीं होता । महत्वपूर्ण होती है प्रजातंत्रीय व्यवस्था । प्रजातंत्र का संविधान ।
इसी रूप में ब्रम्ह की इस रचना संसार के लिये प्रकृति इस संसार की व्यवस्था है । इसी व्यवस्था के लिये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि ब्रम्ह की रचना इस सृष्टि में जो कुछ भी क्रिया हो रही है उसकी कर्ता उनकी व्यवस्था प्रकृति  है । प्रकृति का यह स्वरूप जिस व्यक्ति को मस्तिष्क में ग्राह्य हो जाता है वह प्रतिपल होने वाले प्रति क्रिया सम्पादन के कर्ता को देखता रहता है ।
मस्तिष्क की योग की अवस्था का यह मूल आधार स्वरूप है । प्रकृति को कर्ता होने की दशा की मानसिक ग्राह्यता ही योग की मस्तिष्क की स्थिति को पाना है । मस्तिष्क की योग अवस्था की प्रथम वाँक्षना कर्म करने में कर्म फल के प्रभाव से मस्तिष्क का प्रभावित ना होना । जब कर्ता मनुष्य कर्म के सम्पादन को प्रकृति के कर्तापन के बोध से प्रेरित करेगा तभी उसी एक दशा में ही उसका मस्तिष्क कर्म के कर्म फल से प्रभावित नहीं होगा । योग की द्वितीय वाँक्षना किया जाने वाला कर्म ही उअ कर्म को करने की निमित्त हो उस कर्म को करने का कारण हो । यह भाव भी कर्ता मनुष्य के मस्तिष्क में एक ही दशा में स्थापित हो सकता है । जब कर्ता मनुष्य का मस्तिष्क प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण कर सके । प्रकृति कर्ता है इसलिये कर्ता मनुष्य मात्र उस पल विषेस उस कर्म को प्रेरित करने के दायित्व से प्रकृति द्वारा नामित किया गया है । कर्म उसका दायित्व है । योग की तृतीय वाँक्षना कार्य सम्पादन काल में कर्ता मनुष्य के मस्तिष्क में कार्य फल के प्रति सन्यास भाव प्रधान लक्ष्य के रूप में विद्यमान रहना । यह भाव भी एक ही दशा में मस्तिष्क का प्रधान भाव बन सकेगा । कर्ता मनुष्य का मस्तिष्क जब प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण कर लेवे ।

योग मस्तिष्क की अवस्था विषेस है । मस्तिष्क की योग की विषेस दशा पाने के लिये प्रकृति का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना ही अनिवार्य आवश्यकता है । यह मस्तिष्क के सम्मुख एक विशिष्ट लक्ष्य स्वरूप है । भाववाचक की ग्राह्यता थोडा गूढ होती है । शब्द जिनके माध्यम से भाववाचक की व्याख्या की जाती है वह स्वयँ उस भाव से च्युत होते हैं । लक्षण जिनके माध्यम से भाववाचक को व्यक्त किया जाता हैं वह भी भाव से हीन होते हैं । जैसे खुशी या दु:ख ये भाव हैं । इनका वास्तविक स्वरूप शब्दों के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता । उसी प्रकार प्रकृति का कर्ता स्वरूप एक भाव है । इसका यथा भाव स्वरूप मस्तिष्क को ग्राह्य होना योगाभ्यास से ही सम्भव है । एक ओर योग का मूल है प्रकृति का कर्ता स्वरूप । इसके विपरीत योगाभ्यास से ही प्रकृति का कर्ता स्वरूप भी ग्राह्य होगा । योगाभ्यास का प्रयत्न ही सतत दोनो उपलब्धि करायेगा । मस्तिष्क की योग की अवस्था । प्रकृति के कर्ता स्वरूप का बोध । 

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