सोमवार, 13 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की योग अवस्था ज्ञोतक होती है अनुशासित एवं नियंत्रित कार्य सम्पादन क्षमता की । अनुशासित मस्तिष्क वह दशा है जो स्वत: मस्तिष्क के विकारों से रहित । मस्तिष्क के विकार होते हैं उसके अपने मोह । उसकी अपनी रुचियाँ । उसकी अपनी वाँक्षनाये । इन सभी से मुक्त मस्तिष्क । नियंत्रित मस्तिष्क जो पूर्णतया कर्म संविधान के प्रति निष्ठावान होवे । जैसा कि गत अंकों में उल्लेख किया गया योगेश्वर श्रीकृष्ण ने क्रमबद्ध रूप से बताया प्रथम योगस्थ कुरू कर्माणि कि योग की अवस्था में अपने को स्थापित कर कार्य करो द्वितीय योग: कर्मसु कौशलं कार्य को कर्य के विज्ञान की अपेक्षानुसार कुशलता से सम्पादन करना योग है तृतीय कर्म कारण उच्यते कार्य को करने का कारण कर्म है । यह क्रमबद्ध स्थितियाँ संयमित एवं नियंत्रित मस्तिष्क द्वारा ही हासिल की जा सकती है । योगस्थ अर्थात कार्य के परिणाम से प्रभावित ना होने की मस्तिष्क की दशा । कर्मसु कौशलम कार्य को कार्य के विज्ञान की अपेक्षानुसार सम्पादन अर्थात अनुशासित एवं नियंत्रित कार्य सम्पादन । ऐसा सम्पादन जिसमें स्वत: के विकारों का आच्छादन ना हो । कर्म कारण हो कर्म करने का अर्थात कारण अपनी इच्छाये ना हों । यह समस्त अनुशासन एक मर्यादित कार्य सम्पादन हेतु निर्धारित की गई है ।
उपरोक्त समस्त अनुशासन को निवेश कर कार्य करने का अभ्यास करने वाले के सम्बंध में योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं
अनाश्रितं कर्म फलं  कार्यं  कर्म  करोति य: ।
ससन्यासी च योगी च न निराते ना चाक्रिय: ॥  
जो व्यक्ति किये जाने वाले कर्म के फलस्वरूप प्रगट होने वाले कर्म फल पर आश्रित हुये बगैर कर्म को करता है उसे ही सन्यासी भी कहा जायेगा और उसे ही योगी भी कहा जावेगा । सन्यासी अर्थात कर्म फल की इच्छा से विरक्त । योगी अर्थात कर्म फल से प्रभावित न होने वाला कर्तव्य कर्ता । सन्यासी ही योगी बन सकेगा । योग की अनिवार्य वाँक्षना सन्यास । कर्म फल से सन्यास । संसार से सम्बंध न रखने वाला नहीं कर्म फल से सन्यास रखने वाल्ल निष्ठावन कर्मशील सन्यासी । वही सन्यासी योगी है ।  
सामान्य जीवन यापन अनंत काल से इच्छा प्रेरित कार्यो को करते व्यतीत करना प्रत्येक मनुष्य का आम अभ्यास बना हुआ है । इसलिये योग कि उपरोक्त वर्णित वाँक्षनानुसार कर्म सम्पादन मानसिक रूप से ग्रहण करने में कठिन प्रतीत होने वाला लगेगा । परंतु यदि कोई योग की अपेक्षाओं अनुसार कर्म करने को उद्यत होवे तो वास्तविकता में यह इतना कठिन है नही । यह अवश्य है कि इसमें अहंकार का मर्दन होता है । अधिक समस्या जिज्ञासु को इस अहंकार मर्दन को स्वीकारने मे होती है । यह हर व्यक्ति का आम स्वभाव बना हुआ है कि वह स्व को ही सर्वत्र देखना चाहता है ।

योग को स्वीकारना शांति पाने का उपाय है । एक अनुशासित योग्य निष्ठावन कर्मशील मनुष्य बनना है । भक्ति पथ में इन्ही गुणों को प्रकृति की कृपा द्वारा प्रकृति से याचना करके पाने का सुझाव था । कर्म पथ में अपने कर्मों को योग की अवस्था में करते हुये योगी बनकर पाने का सुझाव है । कर्म के विज्ञान और कर्म की प्रेरणा श्रोत का अध्ययन कर विद्वान महात्माओं ने योग की अनुशंसा की है । जिन्हे अपने ऊपर अपने कर्म सम्पादन के ऊपर विश्वास है नियंत्रण है उनके लिये योग सर्वोत्तम विधा है  

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