मनुष्य का कर्म सम्पादन इस कर्म प्रधान
सृष्टि का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवयव है जिसपर सृष्टी का विकास भी लम्बित होता है
और मनुष्य में निहित आत्मा का भविष्य भी लम्बित होता है । आत्मा अज़र अमर होता है ।
मनुष्य की मृत्यु की दशा में उसमें निहित आत्मा को दूसरी शरीर मिलती है । यह
ब्रम्ह की व्यवस्था है । कर्म की गुणवत्ता ही प्रधान महत्व की होती है । कर्म की
गुणवत्ता का मूल्याँकन का आधार होता है । कर्म संविधान । कर्म संविधान से विचलित
कर्म सम्पादन का मुख्य कारण होता है । आत्मा की प्रकृति के गुणों में आसक्ति । प्रकृतीय
गुणों के भोग की इच्छा । कर्तापन का अहंकार । इन रोगो से ग्रसित आत्मा कर्म
संविधान की उपेक्षा कर स्वयं की इच्छा के अनुकूल कर्म प्रेरण को उद्यत होता है ।
उसके कर्म की गुणवत्ता का पतन होता है । धर्म दर्शन आत्मा के उपरोक्त दोष के सुधार
के लिये पथ सुझाता है । मनुष्य अपनी गलती को जाने । अपनी गलती को सुधारने के लिये
प्रयत्नशील होना चाहे तो धर्म दर्शन के सुझाये पथ के माध्यम से अभ्यास करने से
उसके कर्म दोष दूर होते है । जिस प्रकार यदि शरीर में कोई व्याधि ग्रसित किये होने
पर शरीर पीडित होता है । उसी प्रकार प्रकृतीय गुणों में आसक्त आत्मा पीडित अवस्था
में रहती है । व्याधि का निदान होने पर शरीर स्वस्थ होती है । स्वस्थ होने पर
तुलनात्मक अनुभूति होती है कि शरीर कितना व्यथित थी रोग धारण कर । उसी प्रकार धर्म
दर्शन के द्वारा सुझाये मार्गो का अभ्यास करके आत्मा को रोग मुक्त करने पर अनुभव
आता है कि रोग ग्रस्त आत्मा कितना व्यथित थी । स्वस्थ आत्मा जिस शांति और आनंद की
अनुभूति कर हर्षित दशा में कर्म संविधान के अनुकूल कर्म सम्पादन करने लगेगी कि उसे
दु:ख एक स्वप्न की भाँति विस्मृत ही हो जावेगा । कर्म की इस दशा को प्राप्त करने
के लिये मात्र योग की मस्तिष्क की दशा में प्रत्येक छोटे बडे कार्य का अभ्यास करना
ही एकमात्र वाँक्षना है । योग की मस्तिष्क की अवस्था वह दशा है मस्तिष्क की किसमें
किये जा रहे कर्म के जनित होने वाले परिणाम से मस्तिष्क पर प्रभाव ना पडे ।
जिज्ञासु प्रयत्नशील साधक के लिये यह बताना विषय के अनुकूल होगा कि यह मस्तिष्क की
दशा अति सरल है हासिल करना मात्र बाधा एक होती है । बाधा है अनंत काल से चला आ रहा
अब्यास । इच्छा जनित कार्य करने का । जो व्यक्ति इस बाधा को जीत लेगा उसे योग की
मस्तिष्क की स्थिति सहज सुलभ हो जावेगी । उसी योग की मस्तिष्क की स्थिति कायम रखते
यदि वह अपने समस्त छोटे बडे कार्य को करने का अभ्यास बनायेगा तो निश्चय है कि जीवन
के दु:ख से मुक्त हो जावेगा । यह ऐसी दशा
होगी जो दिव्य शांति का अनुभव करायेगी । इस दशा को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने निम्नवत
बताया –
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ॥
युक्त अर्थात योग की मस्तिष्क की दशा में
। आहार और बिहार । आहार का शाब्दिक अर्थ भोजन परंतु प्रयुक्त प्रकरण में भाव है
जीवन के लिये आवश्यक कार्य । बिहार का शाब्दिक अर्थ है मनोरंजन परंतु प्रयुक्त
प्रकरण में भाव है वृत्ति के निमित्त कार्यों के अतिरिक्त समस्त कार्य ।
युक्ताहारविहारस्य – शरीर को स्थिर स्वरूप में कायम रखने के लिये आवश्यक समस्त कार्य तथा वृत्ति
के निमित्त किये जाने वाले कार्यों के अतिरिक्त समस्त कार्यों को योग की मस्तिष्क
की दशा में किया जाय । युक्तचेष्टस्य कर्मसु
– योग की मस्तिष्क
की दशा में वृत्ति से सम्बंधित कार्य को किया जाय । युक्तस्वप्नावबोधस्य – योग की मस्तिष्क की दशा में सोने और जगने का अभ्यास किया
जाय । यदि कोई मनुष्य योग की मस्तिष्क की दशा में उपरोक्तानुसार वर्णित समस्त छोटे
बडे कार्य करने का अभ्यास करेगा तो उसकी उपलब्धि को बताते है । योगो भवति दु:खहा – उस अभ्यासी मनुष्य के जीवन से दु:ख समाप्त हो जावेगा । योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने यह अमोघ अस्त्र दिया है दु:ख को समाप्त करने के लिये । इसमें किसी भी
बाहरी सहायता की रंचमात्र आवश्यकता नहीं है । किसी कर्म को त्यागने की आवश्यकता
नहीं है । मात्र कर्म करने में अपने मस्तिष्क में कर्म के प्रति एक निश्चित भाव को
धारण करने की बवाँक्षना बतायी गयी है । प्रत्येक व्यक्ति दु:खों की अशांति स्थिति
से व्यथित है । निदान सरल है । परीक्षण निवेदित है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें