मनुष्य का मस्तिष्क ही वह केंद्र है जहाँ
अच्छे और बुरे विचार उठते हैं । इन विचारों को जन्म देने वाली प्रकृति होती है ।
यह प्रकृति का अद्भुद विज्ञान है जो संचालनके स्वाभाविक क्रम में इन समस्त विचारों
की रचना करता है । मनुष्य अपने सम्पादन के स्वाभाविक रूप में इन्ही उत्पन्न होने वाले विचारों में से चयन
करता है अपने सम्पादन के लिये । यही वह स्थल होता है जहाँ मनुष्य की इच्छायें अपना
अस्तित्व कार्य में पर्णित करती है । चयनकाल में सामान्य चयन होता है इच्छा के
अनुरूप विकल्प का । यहीं सूत्रपात होता है त्रुटिपूर्ण कर्म का । इसलिये यथा
संचालन यह स्थल अति संवेदनशील प्रमाणित होता है । योग के विषय में जानकारी होने पर
बहुतों को जिज्ञासा होती है कि यह अपनाने हेतु अच्छी विधा प्रतीत होती है । इसलिये
जिज्ञासु साधको के लिये यह अति महत्वपूर्ण ध्यान देने योग्य है कि कर्म सम्पादन के
लिये कर्म का चयन अत्यधिक महत्वपूर्ण अवसर होता है । समस्त प्रयत्नों की सफलता इस
चयन की धुरी पर लम्बित होती है । सर्वाधिक केंन्द्रित ध्यान इस चयन की प्रक्रिया
पर लगाना योग्य मत है । इच्छा जनित कर्म का चयन की दशा में साधक योगावस्था
मस्तिष्क में सृजित ही नहीं कर सकेगा । इच्छा के विद्यमान रहते कार्य फल प्रधान
विषय के रूप में मस्तिष्क में विद्यमान रहेगा । योग की अवस्था सृजित ही नहीं होगी
। जब की फल की इच्छा से रहित होना योग की अवस्था की अनिवार्य वाँक्षना होती है । इसलिये
कार्य संचालन के लिये कार्य का चयन अति संवेदनशील स्थल होता है । योग साधना की
उपलब्धि पूर्णतया इस चयन पर लम्बित होती है । प्रकृति की अपेक्षानुसार कार्य का
यदि चयन में सम्पादन हेतु चयनित होगा तो निश्चय ही योग साधना में सफलता मिलेगी ।
योग पथ निश्चयात्मक उपलब्धि का मार्ग है । इस पथ में कहीं असफलता की कोई सम्भावना
है ही नहीं । यह प्रयत्न के लिये दृढ पुष्ट पथ है ।
श्रीमद भागवद गीता में बताया गया है कि
अर्जुन को कर्म स्थल पर पहुँच कर मोह उत्पन्न हुआ और वह कर्म सम्पादन से विमुख
होने की दशा पर विचार करने लगा । इस पृष्ठभूमि में अर्जुन ने योगेश्वर श्रीकृष्ण
से निवेदन किया कि वह उसे उचित परामर्ष दें कि उसे क्या करना चाहिये । योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने उन्हे योग को बताया और परामर्ष दिया कि योग की अवस्था में अपने को
स्थापित कर अपना दायित्व निर्वाह करो । उनका परामर्ष योग्य प्रमाणित हुआ । योग की
कृपा द्वारा अर्जुन अपना कर्तब्य करने को तत्पर हो सका । यह प्रकृतीय आसक्ति
प्रकृति के प्रति मोह भ्रम हम सभी मनुष्यों को बिना किसी अपवाद के ग्रसित करती है
। प्रति पल । प्रत्येक स्थल पर । हमारा अपना मस्तिष्क सदैव उत्तम और कलुषित विचार
सम्मुख करता ही रहेगा । यह उसकी रचना में पिरोया हुआ विज्ञान है जिसके परिणाम
स्वरूप वह ऐसा करता है । सतर्क होकर योग्य कर्म का चयन हमारा आपका कर्तब्य है ।
सही कर्तब्य चयन ही सार्थक उपलब्धि का आधार है । इसके लिये हृदय में व्याप्त इच्छा
से विषेस सतर्कता अनिवार्य है । समस्त त्रुटि की जड होती है ।
कथाओं में वर्णित महाभारत के युद्ध का
स्थल हमारा आपका मस्तिष्क ही होता है । इसी में योगेश्वर श्रीकृष्ण भी विद्यमान
होते है । इसी में मोह ग्रसित अर्जुन भी उपस्थित होते है । इसी में साम्राज्य के
संरक्षक भीष्म पितामह भी उपस्थित होते है । इसी में व्यभिचारी दुर्योधन भी प्रगट
होते है । मस्तिष्क प्रत्येक व्यक्ति की अपनी निधि होती है । कौन इसे कैसे प्रयोग
करता है वही चयनित पथ उसका जीवन स्वरूप होता है । योग वह शैली है जिसे साध कर
योग्यतम उपलब्धि हासिल की जा सकती है । इसकी अनिवार्य वाक्षना है अपने अहंकार का
पूर्ण मर्दन । प्रकृति की सत्ता को पूर्ण रूप से स्वीकारना । इच्छा रहित
व्यक्तित्व । उपलब्धि होगी आनंद की मूर्ति रूप । शांत जीवन । एक कर्म योगी स्वरूप
।
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