शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक की चर्चा के क्रम में -
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
प्रकृति का कर्ता स्वरूप । प्रकृति का कर्म करने का विज्ञान । घटनायें परिस्थितियाँ किस प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क को प्रभावित करती है । घटनाओं और परिस्थितियों से प्रभावित मस्तिष्क द्वारा प्रेरित कर्म की गुणवत्ता किस स्तर की होती है यह महत्वपूर्ण अंग होता है प्रकृति के कर्म करने के विज्ञान का । एक ही घटना अलग अलग व्यक्तियों के मस्तिष्क पर अलग अलग प्रभाव सृजित करती है । उदाहरण के लिये एक क्षात्र अपने परीक्षा के परिणाम घोषित होने पर प्रथम स्थान पाता है । इस परीक्षा के परिणाम से उस क्षात्र के मस्तिष्क में एक विशिष्ट उपलब्धि का गर्व युक्त हर्ष भाव सृजित होगा । उसके अभिभावको के मस्तिष्क में कुशल दायित्व संचालन का गर्व युक्त भाव सृजित होगा । उसके प्रतिद्वंदी क्षात्र के मस्तिष्क में स्पर्धा की ईर्ष्या का भाव सृजित होगा । उसके अनन्य मित्र क्षात्रो के मन में हर्ष का उल्लास भव सृजित होगा । परिणाम एक ही है परंतु अलग अलग सम्बंधित व्यक्तियों के मस्तिष्क पर अलग अलग प्रभाव प्रगट होता है । मस्तिष्क पर जनित हुये अलग अलग प्रभाव के परिणाम स्वरूप प्रत्येक अलग व्यक्ति जो प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा वह भिन्न होगी । प्रत्येक प्रतिक्रिया की गुणवत्ता भिन्न होगी । समस्त भिन्नता अर्थात प्रत्येक मस्तिष्क पर जनित हुये भिन्न प्रभाव तथा प्रत्येक प्रतिक्रिया में व्यक्त भिन्न गुणवत्ता प्रकृति के प्रभाव से सृजित हुई । इसी भिन्नता के कारण कलह भी पैदा हो सकता है और सद्भाव भी पैदा हो सकता है । प्रकृति दोनों ही स्थिति उत्पन्न करने में समर्थ होती है ।

समाज में संत भी पैदा होते हैं । समाज में राक्षस भी पैदा होते हैं । प्रकृति ही संत की भी जननी है । प्रकृति ही राक्षस की भी जननी है । प्रकृति किस स्थान पर किस काल में किस परिस्थिति को आगे बढायेगी और किस परिस्थिति को शमन कर बिफल करेगी यह मनुष्य के नियंत्रण में कंचिद नहीं होता । प्रकृति का कार्य करने का विज्ञान इतना पुष्ट होता है कि वह प्रत्येक से वह कार्य करा ही लेगी जो कि उसे कराना है । मनुष्य की इच्छा का महत्व नहीं होता । कर्ता प्रकृति होती है । अवसर विषेस पर वह कर्तापन का श्रेय किसी व्यक्ति विषेस को देती रहती है । प्रकृति ही किसी को सम्मानित स्थिति भी देती है । प्रकृति ही किसी को किसी काल पराजय की हीनता भी भोग कराती है । यही सम्मान और पराजय की हीनता उस व्यक्ति के लिये सुख और द:ख का निमित्त बनती है । इस प्रकार सृजित होने वाले सुख और दु:ख की त्रास कारक स्थितियों में उस मनुष्य का दोष मात्र यह होता है कि वह प्रकृति के कर्ता स्वरूप से अचेत होता है । प्रकृति के कर्ता स्वरूप की चेतना की दशा में वही मनुष्य ना ही सम्मान पाने पर हर्ष करेगा और ना ही पराजय सम्मुख होने पर हीनता से दु:खी होगा । कर्ता प्रकृति है । यदि उपलब्धि का सम्मान सम्मुख हुआ है तो भी प्रकृति की महिमा है । यदि पराजय की हीनता भी सम्मुख हुआ है तो भी प्रकृति की महिमा है । प्रकृति प्रधान अस्तित्व है । मनुष्य मात्र प्रकृति की व्यापक व्यवस्था का एक सूक्ष्म अवयव है । व्यापक व्यवस्था कर्मों की कर्ता है । यथा स्थान यथा काल प्रकृतीय अपेक्षानुसार कर्तब्य संचालन ही मनुष्य का दायरा है और कर्तब्य की सीमा है । मनुष्य कर्म के फल के लिये कंचिद कोई योगदान नहीं कर सकता । व्यापक व्यवस्था प्रकृति के कर्मों का विस्तार भी व्यापक होता है । प्रकृति का कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना ही उपलब्धि होगी ।   

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