मस्तिष्क की योग की अवस्था में कार्य का
सम्पादन । योग की अवस्था कैसे प्राप्त की जाय । योग की अवस्था में कर्म सम्पादन को
कार्य करने की आम पद्धति के रूप में कैसे बनाया जा सकता है । योग की मस्तिष्क की
दशा में कार्य करने के अभ्यास से उत्पन्न होने वाले चारित्रिक गुणों का उल्लेख गत
अंको में किया गया ।
योग की मस्तिष्क की अवस्था में हर छोटे
बडे कार्य करने का अभ्यास बनाने वाले योगी का पूर्ण चारित्रिक स्वरूप जो उदय होगा
को बताते हुये योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं
सम: शत्रो च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।
शीतोष्णसुख्दु:खेषु सम: सङविवर्जित:
॥
सम: एक समान आचरण करने वाला । शत्रु और
मित्र दोनो के ही साथ । योगी का चरित्र शत्रु और मित्र दोनो के ही साथ एक समान
आचरण का होगा । इस कथन की गरिमा को अनुभव कोई भी मनुष्य करना चाहे तो वह स्वयं
अपने ही आचरण में इसे परीक्षित कर देखे कि क्या वह ऐसा आचरण कर सकता है । क्या वह
अपने मित्र के साथ शांत मस्तिष्क व्यवहार निभा सकता है । मित्र के साथ हर्ष या शोक
को सम भाव से आदान प्रदान कर सकता है । क्या बिना किसी उन्माद के मित्र के साथ
व्यवहार कर सकता है । इससे भी आगे क्या अपने शत्रु के सम्मुख शांत आचरण कर सकता है
। शत्रु के सामने होने पर मस्तिष्क में उठने वाले क्रोध भाव को नियंत्रित कर शांत
मस्तिष्क उससे व्यवहार कर सकता है । योग की दशा में काम करने वाला मनुष्य ऐसा करने
में सहज समर्थ होता है ।
उपरोक्त स्थिति से भी आगे मान और अपमान
की दशा । यह सहज मनुष्य स्वभाव होता है कि जहाँ उसे मान मिलता है जहाँ उसका आदर
किया जाता है वह वहाँ अति उदार व्यवहार से प्रत्युत्तर करता है । उपरोक्त के
विपरीत जहाँ उसका अपमान किया जाता है वहाँ
वह अति तीक्ष्ण कटुता प्रगट करता है । यह प्रत्येक आम व्यक्ति के साथ एक जैसा ही
अनुभव मिलेगा । परंतु दोनो ही उपरोक्त आचरण किसी व्यक्ति विषेस के लिये सम्मानजनक
और उत्थान पूरक व्यवहार नहीं प्रमाणित होते । जहाँ सम्मान मिला वहाँ वह आवश्यकता
से अधिक उदारता व्यवहृत कर क्षति करेगा और जहाँ अपमान हुआ वहाँ आक्रोष में क्षति
करेगा । परंतु योगी का आचरण मान और अपमान दोनो ही दशाओं में एक समान शांत सम भाव
का होगा ।
उपरोक्त वर्णित दोनो ही विपरीत
चर्मोत्कर्ष स्थितियों नामत: मित्र व शत्रु तथा मान व अपमान के उदाहरण द्वारा
योगेश्वर श्रीकृष्ण यह प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किये हैं कि योगी की कार्य
सम्पादन दक्षता किस उच्चतम स्तर तक उन्नति करेगी । मनुष्य के आम जीवन यापन में यही
चर्मोत्कर्ष स्थितियाँ होती है जिनमें उसके जीवन की प्रखरतम प्रभाव डालने वाली
घटनाये घटित होती हैं । उसके जीवन की आम धारा ही प्रभावित हो जाती हैं । समय बीते
वह स्वयं अपने किये पर पश्च्याताप करता है । परंतु मस्तिष्क की योग की अवस्था में
कार्य करने का अभ्यासी कोई पश्च्याताप करने वाला कार्य करेगा ही नहीं ।
शांत मस्तिष्क ही कर्म की गुणवत्ता का एक
सूत्रीय वाँक्षना होती है । मस्तिष्क की सतत शांत स्थिति पाने का सरल मंत्र हैं
योग । कार्य करने की विधा । कार्य की सही विधा अपनाने से दिव्य शांति आपकी अमानत
बन जावेगी । इच्छा जनित कार्य करने का अनंत काल से चलता आया अभ्यास ही समस्त
मानसिक अशांति का मूल होता है । शांत मस्तिष्क ना ही बाजार में क्रय से मिलेगा ना
ही किसी वरदान से मिलेगा । इसको पाने का मात्र एक उपाय है । योग । मस्तिष्क की योग
की दशा में कार्य करने मात्र से मस्तिष्क शांत होगा रहेगा और सिर्फ शांत ही रहेगा
। उसकी शांति दशा को मान और अपमान जैसी चर्मोत्कर्ष परिस्थितियाँ भी अशांति में पर्णित
नहीं कर सकेगी । शांत मस्तिष्क उसकी पहचान बन जावेगी । उसके मित्र भी उसकी शांत
मस्तिष्क को सराहेगे । उसके शत्रु भी उसके शांत मस्तिष्क को सराहेगे । क्या उससे
शत्रुता करे वह तो कोई प्रतिक्रिया करता ही नहीं । योगी की आस्था निहित है प्रकृति
के कर्ता स्वरूप में । शत्रु के लिये भी वह कहता है कि इसका कोई दोष नही यह तो कुछ
नहीं करता जो कुछ हो रहा है वह प्रकृति करा रही है यह तो मात्र प्रतीक है । मुझे
इससे कोई रोष नहीं । प्रकृति से भी रोष का प्रश्न नहीं । वह तो स्वामी है । वही
मान भी देती है । वही अपमानित भी कर रही है । मेरा कोई कर्म दोष होगा ।
उपरोक्त समस्त मानसिक दशा का रहस्य कर्म
विधा के धुरी पर अवलम्बित है । कर्म सम्पादन पद्धति को योग की मानसिक दशा में करने
के अभ्यास से समस्त कर्म दोषों से मुक्ति मिलती है । कर्म दोष ही पैदा करते है
मस्तिष्क की अशांत स्थितियाँ ।
अगले अंक में सतत
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