रविवार, 26 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

कर्म करते हुये कर्म की त्रुटियों से बचते हुये त्रुटिरहित कर्म करने की विधा के रूप में मस्तिष्क की योग की अवस्था में कर्म करने के अभ्यास की सफलता पूर्णरूप से निर्भर करती है मस्तिष्क द्वारा प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण करने में । प्रकृति निर्मित मनुष्य की शरीर जो कि माध्यम होती है समस्त कर्म सम्पादन के लिये पूर्णरूप से प्रकृति की अपेक्षानुसार कर्म सम्पादन के लिये तत्पर होती है । परंतु इसके बावज़ूद कर्म दोषपूर्ण होते है । दोष का कारण प्रत्येकदशा में उत्पन्न होता है मस्तिष्क में व्याप्त इच्छाओं के कारण । इन्ही दोष के निमित्त के निवारण के लिये विद्वान महात्माओं ने सुझाया योग । योग मस्तिष्क की वह अवस्था है जिसमें उस पर कर्म के परिणाम से प्रभाव नहीं पडता । परिणाम का सीधा सम्बंध इच्छाओं से होता है । इसलिये विद्वानों ने निदान सुझाया कर्म के परिणाम से परीक्षित करने के लिये । कर्म करते हुये इच्छाये प्रगट नहीं रहती । मस्तिष्क में विद्यमान रहते हुये भी चिन्हित होने योग्य स्थिति में नहीं रहती । कर्म के निमित्त के रूप में समायी रहती हैं । इसलिये इनके परीक्षण के लिये कर्म के परिणाम के साथ विधि सुझाई गई । यदि कर्म के परिणाम से मस्तिष्क प्रभावित नहीं हुआ तो निष्चय है कि कर्म करने का निमित्त इच्छाये नहीं थी । यदि इच्छा जनित कर्म किया जावेगा तो मस्तिष्क को कर्म के परिणाम से प्रभावित ना होने की दशा सम्भव ही नहीं हो सकती । मस्तिष्क कर्म के परिणाम से प्रभावित अवश्य होगा ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण का सुझाव मात्र योग बताने तक ही सीमित नहीं था । मस्तिष्क की योग की दशा पाने के लिये पथ भी बताया । पथ बताते हुये उन्होने कहा कि
प्रकृत्यैव च कर्माणि  क्रियमाणि  सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥

संसार में जो भी कर्म हो रहे हैं उनकी कर्ता प्रकृति है । यही कथन यदि मस्तिष्क धारण कर सके तो उस मस्तिष्क में योग की अवस्था स्थायी निवास कर लेगी । प्रकृति निर्मित शरीर में प्रकृति व्यवस्था ने वह समस्त विज्ञान इसके निर्माण काल में पिरो दिया है कि व्यापक विस्तृत प्रकृति अपने आदेशों का संचार इस शरीर में प्रतिपल प्रेषित करती है और शरीर उसे ग्रहण भी करती है । इसके लिये किसी मनुष्य को कोई भी अलग से प्रयत्न करने की कोई अपेक्षा होती ही नहीं । प्रकृति के आदेशों का यथा आदेश क्रियांवन यदि शरीर सम्पादित कर दे तो कोई कर्म दोष होगा ही नहीं । कर्म दोष का जन्म होता है मस्तिष्क में उपस्थित इच्छा द्वारा । इच्छा ही उपेक्षा कराती है प्रकृति द्वारा आदेशित कर्म करने के प्रति । इच्छाओं का जन्म होता है भोग की आसक्ति से । प्रकृतीय गुणों का भोग । स्वादिष्ट व्यंजन । उन्मादकारक परिवेष । मधुर संगीत । मोहक दृष्य । इन सभी भोगों की इच्छा । इन्हे पाने की कामना । इनके स्वामित्व की अभिलाषा । मस्तिष्क में इन्ही भोगो के प्रति उठने वाले तूफान उपेक्षा कराते है प्रकृतीय आदेशों का । यह मनुष्य शरीर में जन्म प्रकृति के गुणों के भोग के निमित्त नहीं हुआ है । प्रकृति ने अपने किसी कार्य विषेस को कराने के लिये यह मनुष्य शरीर में जन्म दिया है । इस मनुष्य शरीर में जन्में प्रत्येक के लिये जन्म देने वाली प्रकृति के प्रति निष्ठावान रहते उसके आदेशानुसार कर्म करना ही धर्म है । इस विचार को पोषित करना है तो मस्तिष्क के योग की दशा में रखते हुये कर्म का अभ्यास बनाना ही एकमात्र सरलतम विधि है । योग की अवस्था अपनी निधि बनाना है तो मस्तिष्क की समस्त शक्ति से प्रकृति के कर्तारूप को ग्रहण करने का प्रयास किया जाय । 

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