गुरुवार, 16 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क को योग की अवस्था में स्थापित कर कार्य करने का अभ्यास करने से अभ्यासी के चरित्र में जो गुण पैदा होंगे उनकी चर्चा को सतत रखते हुये गत अंक के पूर्व के अंक में बताये गये गुणों  
अद्वेष्टा सर्वभूतानं मैत्र: करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकार:  समदु:खसुख क्षमी ॥  
के अतिरिक्त जो गुण होगें वह हैं
संतुष्ट सततं योगी योग का अभ्यासी व्यक्ति सदैव प्रकृति द्वारा प्रदत्त परिस्थितियों में संतुष्ट रहेगा । जीवन में उपस्थित होने वाली परिस्थितियाँ प्रकृति द्वारा ही आरोपित होती है । परिस्थितियाँ जीवन के प्रेत्येक क्षेत्र से सम्बंधित । आर्थिक, सामाजिक यश अथवा अपयश, भौतिक सुख अथवा दु:ख, शारीरिक व्याधियाँ अथवा उत्कर्ष सभी प्रकृति प्रदत्त ही होती हैं । उपरोक्त प्रत्येक के सम्बंध में मनुष्य कुछ इच्छायें रखता है । इच्छा पूर्ण न होने के परिस्थिति में अल्पता से दु:खी होता है । परंतु इस सामान्य आचरण के विपरीत योगी सदैव प्रकृति प्रदत्त परिस्थितियों में ही संतुष्ट रहता है । कारण सरल है । योग अभ्यासी होने में उसे पथ मिला है परिणाम की कामना किये बगैर कार्य करने का । स्वाभाविक फल उसका स्वभाव बन जाता है । वह प्रकृति के न्याय के प्रति निष्ठावान बन जाता है ।
यतात्मा दृढनिश्चय: - योगी कार्य दायित्व को सम्पादित करने के लिये दृढ निश्चयी बनता है । प्रकृति द्वारा आरोपित कार्य को करना उसका अपने जीवन का लक्ष्य बन जाता है । इच्छा उसके जीवन से लुप्त हो जाती है । प्रकृति प्रदत्त कर्म उसके जीवन का ध्येय बन जाता है । कोई भी विपरीत परिस्थिति उसके कर्म की बाधा नहीं बन पाती है ।
योगी मस्तिष्क और विवेक दोनो ही स्तरों पर प्रकृति के प्रति समर्पित भाव से युक्त रहने का अभ्यासी बन जाता है । कर्म सम्पादन की गुणवत्ता पूर्ण रूप से मस्तिष्क की यथास्थिति का निरूपण होती है । योग अवस्था कर्म सम्पादन के प्रत्येक अंग यथा प्रेरणा श्रोत, निमित्त, फल, सभी का विचार समंवित कर प्रतिपादित किया गया है । इसलिये योग अवस्था में कर्म करने का अभ्यास कर्म की गुणवत्ता को निखारती है । कर्म उत्कृष्ट गुणवत्ता के हो जाते हैं

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो हर्ष, क्रोध, भय और उद्विग्नता से मुक्त होता है योग अवस्था में कार्य करने का अभ्यासी । इच्छा की पूर्ति में किये जाने वाले कार्य के प्रसंग में इच्छा के अनुकूल कार्य का परिणाम होने की दशा में कार्य का कर्ता हर्ष का अनुभव करता है । परंतु योग की दशा में कार्य करने वाले अभ्यासी व्यक्ति का प्रथम लक्ष्य होता है इच्छा प्रेरित कर्म का त्याग । योगावस्था में कार्य के अभ्यास की अनिवार्य वाँक्षना होती है अनाश्रितं कर्म फलं कर्म के परिणाम की अपेक्षा से मुक्त कर्म । इसलिये योगावस्था में कार्य के अभ्यासी को हर्ष का परिचय नहीं होता । दूसरी उपलब्धि बतायी मर्ष क्रोध से मुक्त । पुन: इच्छा प्रेरित कर्म करने की दशा में मनोनुकूल इच्छा के अनुरूप कार्य फल न प्रगट होने की परिस्थिति उत्पन्न करती है कर्ता के मस्तिष्क में क्रोध । योगावस्था का कर्म अभ्यासी इच्छा प्रेरित कर्म करता ही नही । इसलिये वह मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले क्रोध से मुक्त रहता है । भय भय की जननी होती है मोह । यदि मनुष्य के मस्तिष्क में मोह उपस्थित है तो वह भय को हटा ही नहीं सकता । मोह का निमित्त कुछ भी हो । लडका लडकी घर मकान वस्त्र मोटर गाडी जगह जायजाद । जिसके निमित्त मोह करेगा कोई भी व्यक्ति प्रतिफल में भय प्रगट होकर ही रहेगा । भय मोह की क्षाया है । योग अवस्था की अनुशंसा अनासक्ति है । मोह से च्युत होकर कर्म का आदेश है योग पथ का । परिणामत: योग अवस्था में कार्य करने का अभ्यास मनुष्य को भय से मुक्ति दिलाता है । उद्विग्नता इच्छा प्रेरित कर्म सदैव किसी विषेस फल को पाने के उद्देष्य से ही किया जाता है । इसलिये कर्म करने वाले के मस्तिष्क में कर्म सम्पादन काल में लगातार यह विचार भाव विद्यमान रहता है कि कितनी जल्दी उसका मनोवाँक्षित फल प्रगट हो जाय । वह उद्विग्न रहेगा । उसका कर्म दोषपूर्ण होना ही होना है । उसके मस्तिष्क का समस्त प्रयत्न फल में समाया हुआ है । कर्म सम्पादन की कुशलता और कर्म की गुणवत्ता उसके मस्तिष्क का निमित्त है ही नही । परंतु उपरोक्त के विपरीत योगाभ्यासी व्यक्ति का कर्म फल की कामना से मुक्त कर्म होता है । इसलिये योगी के मस्तिष्क का क्षितिज कर्म सम्पादन काल में मन:दशा उद्विग्नता से मुक्त होती है । इसलिये योगी का कर्म गुणवत्ता युक्त होगा कर्म के विज्ञान के अनुरूप कर्म सम्पादन होगा । उपरोक्त समस्त उपलब्धियाँ योग अवस्था में कार्य करने के अभ्यास का सहज वरदान स्वरूप योगी के चरित्र में उत्पन्न होगीं । इनके हासिल करने के लिये कोई अलग से प्रयत्न नहीं करना है । योग अवस्था में कार्य का विज्ञान की यह सहज स्वाभाविक देन के स्वरूप अभ्यासी को मिलेंगी । कल्पना कीजिये कि हर्ष, क्रोध, भय और उद्विग्नता यदि ना हो तो कितना शांत जीवन स्वरूप होगा । जीवन की समस्त अशांति के यही जनक होते है हर्ष, क्रोध, भय, उद्विग्नता । यदि हर्ष है तो दु:ख आना ही है । हर्ष के घर के द्वार पर दु:ख खडा मिलेगा । जन्म हुआ है तो मृत्यु होनी ही है । कोई शक्ति मृत्यु टाल नहीं सकती । क्रोध की भयावह अग्नि कितना क्षति कारक होती है । प्रत्येक व्यक्ति को अनुभव होगा । इसकी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है । जीवन के जिस भाग में क्रोध की अग्नि प्रज्वलित हुई वह अंग क्षतिग्रस्त होने से कोई बचा नहीं सकता । भय का दु:ख सर्वाधिक भयावह होता है । अल्पता के दु:ख से भी अधिक । उद्विग्नता में कर्म का जितना नाश होता है उतना अन्य किसी श्रोत से सम्भव नहीं होता । समस्त त्रुटि का मूल है । यदि कंचिद इतने भयावह व्याधियों से मुक्ति पानी है तो योग की अवस्था में कर्म का अभ्यास एक एकाकी औषधि स्वरूप प्रमाणित होगी । परीक्षित कर सत्य पावें ।

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