रविवार, 5 जनवरी 2014

ज्ञान यात्रा

योगस्थ: कुरु कर्माणि सड्गं त्यक्त्वा धनञ्जय: ।
सिद्धयसिद्धियो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ 
उपरोक्त उद्घृत श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कर्म करने की सही विधि का पूर्ण स्वरूप बता दिया है । ना ही केवल पूर्ण विधि को बताया बल्कि त्रुटि की सम्भाव्य उद्गम से सतर्कता बर्तने के लिये भी बता दिया है । उपरोक्त श्लोक देखा जाय तो कर्म संविधान के प्राविधान को व्यवहारिक रूप में कैसे सम्पादित किया जाय का सही व पूर्ण निरूपण है । इससे भी अधिक मनुष्य शरीर की प्रकृति इसे किस प्रकार व्योहार में अपना सकेगी का पूर्ण व्योरा प्रगट किया है । इस श्लोक के लेखक महात्मा ने मानों एक वृहद विज्ञान को प्रयोग करने के लिये एक सूक्ष्म मंत्र प्रदान कर दिया है ।
सड्गं त्यक्त्वा धनञ्जय प्रकृतीय गुणों के प्रति मोह को त्याग कर । कर्म में त्रुटि उत्पन्न करने का उद्गम स्थल होता है प्रकृतीय गुणों में आसक्ति मोह । विद्वान लेखक ने सुझाया कि प्रकृत के प्रति मोह को त्याग कर कर्म करने को उद्यत हुआ जाय । त्रुटि से वंचित रहेगे । सही रूप में कर्म करने के लिये मस्तिष्क में अनुकूल वातावरण रहेगा । मस्तिष्क ही मूल केंद्र होता है कर्म संचालन के लिये । इसलिये कर्म संचालन केंद्र को पूर्ण रूप से प्रदूषण से सुरक्षित करके कर्म सम्पादन किया जाय ।
कर्म प्रेरण कर्म संविधान के अनुकूल हो इसके लिये मस्तिष्क में व्याप्त आधार सिद्धांत के रूप में विचार धारण किया जाय कि कर्म फल मेरा सरोकार नहीं है । इस कर्म को करने में सम्पादन काल की पीडा मुझे कर्तव्य निर्वाह से च्युत न कर सके । कर्तव्य के प्रति निष्ठा की दृढ भावना । कर्तव्य के फल स्वरूप प्रगट होने वाले परिणाम से न प्रभावित होने वाली मन:स्थिति । यह सब मानसिक संकल्प कर्म प्रारम्भ करने से पूर्व ही मन में मस्तिष्क में स्थापित करके कर्म करना शुरू किया जाय ।

गत अंको में मस्तिष्क की कार्य प्रणाली व कार्य के अनुसार वर्गीकरण की चर्चा में यह अंकित किया गया था कि मस्तिष्क प्रकृति की रचना है और प्रकृति के विज्ञान के प्रभाव से कार्य सम्पादन काल में मस्तिष्क अनेकानेक विकल्प प्रस्तुत करता रहता है । कुछ विकल्प कार्य परिणाम के भयावह स्वरूप के तो कुछ विकल्प कतिपय कार्य परिणाम की उपलब्धि स्वरूप विषय भोग स्वरूप के । इसके परिणाम से कर्ता की मन:स्थिति कभी कार्य के प्रति मायूसी के भाव सृजित करते हैं तो कभी अत्यधिक उत्साह के । दोनो ही अवाँक्षित भाव होते हैं कार्य सम्पादन के विचार से । इसलिये विद्वान लेखक सुझाव देता है कि कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही यह मस्तिष्क में दृढता से धारण किया जाय कि कार्य के परिणाम से मेरा कोई सरोकार नहीं है । मैं ना ही सफलता पाने के लिये कार्य कर रहा हूँ और ना ही असफल होने के लिये कार्य कर रहा हूँ अपितु मेरा कार्य करना दायित्व है इसलिये मैं कार्य कर रहा हूँ परंतु निष्ठावान कर्ता होने के कारण मैं कार्य को कार्य की अपेक्षानुसार करू यह मेरा प्रयत्न है । यह सही मन:दशा का स्वरूप कैसे हासिल किया जाय का पथ निर्दिष्ट कर उपरोक्त श्लोक के लेखक महात्मा ने त्रुटि की समस्त सम्भावनाओं से बचते हुये सही कर्म करने की विधि प्रस्तुत किया है । 

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