सोमवार, 16 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

 इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
अवतार पुरुष श्रीराम अपने छोटे भाई लक्षमण द्वारा पूछे प्रश्न का उत्तर देते हुये उन्हे बताते हैं कि भक्ति सुख पाने के लिये अद्भुद उपाय है । यह समस्त सुखों की जड है । सुख रूपी वृक्ष की मूल है । सुख भक्ति से ही समृद्ध होता है । पुन: आगे बताते है भक्ति सुलभ होने का उपाय । संत की कृपा युक्त संगत । संत जिसका आचरण ब्रम्ह के कर्म संविधान के अनुरूप है । कर्म संविधान जिसके प्राविधान के अनुसार समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । आचरण जो कुछ भी कर्म सम्पादन कोई भी व्यक्ति जो भी करता है वही उसका आचरण है । कर्म का चयन उस व्यक्ति के व्यक्तिगत विवेक पर आधारित होता है । कोई इच्छाजनित कर्म करता है । कोई प्रकृति द्वारा निर्देशित कर्म करता है । प्रकृति के आदेश के अनुपालन मे कर्म करने वाला संत होता है । भक्ति क्रिया पद्धति की गुणवत्ता है । सम्पादन की गुणवत्ता है । भक्ति आचरण है । संविधान के अनुकूल आचरण । इन्ही कारणों से संत की संगत की अनुशंसा की गई । मात्र संगत ही पर्याप्त नहीं होगा । संत की कृपा भी अनिवार्य वाँक्षना है । दोनो ही होगी तभी मिलगी ।
भगति तात अनुपम सुख मूला । मिलहिं जो संत होंहि अनुकूला ॥
सभी ज्ञानी महात्मा सदैव भक्ति की ही कामना करते हैं प्रभु से भक्ति का ही वरदान माँगते हैं । ज्ञानी मुनि सनकादि प्रभु श्रीराम से साक्षात दर्शन काल में भक्ति का ही वरदान माँगे थे । मुनि सनकादि चारो वेदों के प्रकाण्ड ज्ञाता थे । ब्रम्ह की अनुभूति में सदैव आनंदित रहते थे । प्रकृति और पुरुष का भेद उनके प्रतिपल के आचरण में स्पष्ट निरूपित विदित होता था । ऐसे ज्ञानी ने भी वरदान माँगा तो प्रेम भक्ति ही माँगी । प्रेम अर्थात प्रतिपल के आचरण में व्यवहृत होने वाला सेवा भाव । वरदान का स्वरूप प्रजातंत्र के शासनादेश के अनुरूप होता है । प्रकृतीय व्यवस्था यदि किसी को वरदान देती है तो मानो उसके क्षेत्रीय घटक उस वरदान के अनुरूप सुविधा पूर्ण स्थिति उस व्यक्ति को प्रदान करने के लिये बाध्य होते है जिसके पक्ष में वरदान दिया गया प्रकृति द्वारा । वरदान यदि ज्ञानी मुनि माँगता है प्रकृति स्वामी से तो बिना कहे यह स्पष्ट है कि वह ज्ञानी अपने सामर्थ्य द्वारा कर्म संविधान के अनुकूल आचरण किये जाने की सामर्थ्य को संदिग्ध पाता है इसलिये उस उपलब्धि को प्रकृति की कृपा से उपलब्ध करने के लक्ष्य से वरदान माँगता है । कवि उपरोक्त वृतांत को निम्नवत् व्यक्त करता है
परमानंद कृपायतन मनपरिपूरन काम । प्रेम भगति अनपायनी देहुँ हमहि श्रीराम ॥

   प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

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