रविवार, 29 दिसंबर 2013

ज्ञान यात्रा

शरीर की रचना प्रकृति और पुरुष के सन्योग से हुई । पुरुष ब्रम्ह का अंश और प्रकृति ब्रम्ह की रचना । पुरुष विषय और प्रकृति वस्तु स्वरूप । कर्म संविधान के प्राविधान के अनुसार कर्मों की कर्ता प्रकृति । स्वाभाविक रूप से पुरुष आत्मा प्रकृति के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करता । परिणामत: कर्म दोष उत्पन होते हैं । इनके निवारण के लिये सरल उपाय बताया गया भक्ति । पुरुष आत्मा वस्तु प्रकृति के प्रति समर्पित भाव । दूसरे सुधार मार्ग के रूप में कर्म पथ सुझाया गया । कर्म द्वारा कर्म का सुधार । इस कर्म पथ के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान शरीर का पाते हुये शरीर के विभिन्न अंगों जिनके द्वारा कर्म सम्पादन सम्भव होता है की चर्चा को सतत रखते हुये
मस्तिष्क का दूसरा भाग होता है संचय अनुभाग । संचित स्मृतियाँ । समस्त पाँच ज्ञानेंद्रियों द्वारा लायी गयी सूचनाओं का संग्रह । जन्म से मृत्यु पर्यन्त तक के संग्रह । सम्पादित कर्मों का संग्रह । समस्त कर्म फलों का संग्रह । पूर्ण भण्डारण होता है । यह हर व्यक्ति की निधि होती है । इसकी गुणवत्ता होती है (1) क्रमबद्धता (2) समय पर स्मरण । जिस व्यक्ति का संचय जितना सुनियोजित होता है उतना ही उपयोगी होता है । प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव से जीवन जीता है । उसका संचित भण्डार ही उसका अनुभव होता है । संचित भण्डार विगत स्मृतियों का । सुखद और दु:खद कर्म फलों का । कर्म त्रुटियों का । सुधारात्मक प्रयत्नों का । विगत सम्बंधों का । विगत अध्ययनों से एकत्रित विषयों का । यह समस्त स्मृतियाँ जिस व्यक्ति के मस्तिष्क में जितने ही क्रमबद्ध ढंग से सुव्यवस्थित भण्डारित होती है उसकी क्रिया शीलता उतनी ही प्रखर होती है । उसके कर्म पुष्ट होते हैं । वह दक्ष होते हैं । सुव्यवस्थित भण्डारण से कर्म सम्पादन काल में आवश्यकता पडने पर त्वरित गति से सूचनायें मिलती है जिससे उनका प्रयोग सुलभ होता है ।
मस्तिष्क का कर्म सम्पादन में सबसे बडा योगदान होता है । बाह्य जगत से सूचनाये पाँचो ज्ञानेंद्रियाँ लगातार लाती रहती है । सूचनाओं का रूपांतर और विश्लेषण मस्तिष्क के प्रथम भाग में लगातार किया जाता है । इस विश्लेषण और रूपांतर के तुरंत बाद भण्डारण भाग खोजता है सूचना के अनुरूप पुरानी स्मृति विगत अनुभव । पुराना अनुभव मिलने पर आगे का कार्य सरल हो जाता है । पुरानी सूचना या अनुभव भण्डार में न मिलने की दशा में आगे का कार्य कढिन हो जाता है । सूचना स्मृति भण्डार में न मिलने के दो कारण होना सम्भव होते हैं । प्रथम की भण्डार में कोई सूचना है ही नहीं । दूसरा कारण होता है कि भण्डार में सूचनायें सुव्यवस्थित रखी नहीं गई हैं । इसलिये समय पर मिलती नहीं है । समय बीतने पर मिलती हैं । पश्च्याताप होता है कि समय पर याद आया होता तो भूल न होती । यह सभी के साथ घटित होने वाला अनुभव होता है ।
यह भण्डारण संचय सुव्यवस्थित उत्तम बनाने से बनता है । कतिपय व्यक्तियों को नैसर्गिक क्षमता के रूप में भी मिलता है । परंतु कर्मसुधार के लिये प्रयत्नशील व्यक्ति को इसे उत्त्म बनाने के लिये विषेस उद्यम कर बनाना ही चाहिये । उसके उत्तम होने से कर्म करने की गति भी बढती है कर्म करने की क्षमता भी बढती है कर्म सुधार के प्रति आत्मविश्वास बढता है । संचय जितना ही ढंग से indexed  होगा उतना ही समय पर उपलब्ध होगा । सजग जीवन । सूचनाओं की प्राप्ति के समय ही जो व्यक्ति उस सूचना के महत्वानुसार उसे स्मृति भण्डार में किसी अविस्मरणीय स्मृति के साथ सम्बद्ध कर संचित करेगा उसे सदैव समय पर सूचना भण्डार से मिलेगी । समय महत्वपूर्ण होता है । समय पर किया गया कार्य ही फलदायी होता है । समय बीत जाने पर वही कार्य दुर्गम हो जाता है । कर्म त्रुटि सुधारने को सचेष्ट व्यक्ति के लिये यह अत्यंत महत्व का है । समस्त कर्म सम्पादन की गुणवत्ता का मूल होता है । यह तो अपने अनुभव का लाभ लेते उत्थान की यात्रा करने की बात है । उत्तम से भी आगे उत्कृष्ट व्यक्ति तो दूसरों के भी अनुभव का लाभ लेते हुये उन्हे अंगीकार कर अपनी उन्नति यात्रा आगे बढाते हैं । ये दूसरों के अनुभव पढने से सुनने से देखने से मिलते हैं । विलोम भी सत्य है । मूर्ख कहे जाने वाले व्यक्ति अपने ही अनुभव का लाभ लेने के विपरीत एक ही त्रुटि बार बार करते है । अवनती की ओर अग्रसर होते हैं ।

कतिपय अवसरों पर स्मृतियाँ बाधा के रूप में भी सम्मुख होती हैं । कर्म सुधार के पथिक के सम्मुख भोग विलास की स्मृतियाँ । कर्म सुधार का पथ एक तपस्या है । मस्तिष्क को कु-प्रवित्तियों से हटा उत्तम की ओर प्रवर्त करना । इन प्रयत्नों के प्रारम्भिक अवस्था में विगत की भोग विलास की स्मृतियाँ बाधा बनती है । सतर्कता अनिवार्य है ।    

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