इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
मनुष्य शरीर की रचना में प्रयोग किये गये दो घटक नामत: प्रकृति और पुरुष की अपनी
जातीय विषेशताएँ व गुण किस प्रकार उनकी कार्य शैली को प्रभावित करते है यह प्रगट होने
के उपरांत यह निष्कर्श निकालना स्वाभाविक क्रम होगा कि मनुष्य का जीवन पूर्णतया निर्भर
होता है इन्ही दो घटको के संतुलित संचालन पर । यह संचालन पूर्णतया मनुष्य की अपनी व्यक्तिगत
उपलब्धि पर निर्भर होती है । जो मनुष्य जितना अधिक इन दोनो घटको को जान सकेगा, इनके गुण दोष से परिचित होगा, तथा इनकी कार्य शैली का सज्ञान
लेते हुये अपने कार्य दायित्वों को संचालित करेगा उतना ही अधिक आनंदमय जीवन यापन उपलब्ध
कर सकेगा । यह उपलब्धि पूर्णतया व्यक्तिगत प्रयत्नो से ही हासिल की जा सकती है । सहायता
अधिक से अशिक यही मिल सकती है कि ज्ञान के रूप में प्रकृति और पुरुष के जातीय गुण दोष, इनकी कार्य विधा, इनकी परस्पर प्रतिक्रिया पद्धति, व इनके दोषों से मुक्ति के
उपाय सुझाये जा सकते हैं । परंतु बताये पर विश्वास करना न करना, सुझाव अनुसार आचरण करना न करना
यह पूर्णतया व्यक्ति विषेस के ऊपर निर्भर करता है । जो भी स्थिति हो परंतु यह अपरिवर्तनीय
सत्य है कि परम् ब्रम्ह की दिब्य अखण्ड शांतिमय चिर आनंद की अनुभूति इस मनुष्य जीवन
में वही कर सकता है जो अपने अंदर विद्यमान परम् ब्रम्ह के अंश आत्मा की अनुभूति कर
ब्रम्ह के कर्म संविधान जिसके अनुसार सृष्टि के समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है को
पूर्ण सम्मान के साथ हृदयस्त कर अपने दायित्वो के कर्मो को सम्पादित कर सकेगा वही पा
सकेगा ।
कर्मों की प्रेरणा हम ग्रहण करते है अपनी इच्छाओं से । यही हमारी सबसे बडी भूल
होती है । यही अज्ञान है । यही अविद्या है । इच्छाये उत्पन्न होती हैं प्रकृतीय गुणों
में आसक्ति से । यहीं से प्रारम्भ होती है दुखमय यात्रा । मुक्ति के लिये हमें इस अज्ञान
से उबरना होगा ।
प्रभु
नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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