शनिवार, 30 नवंबर 2013

ज्ञान यात्रा

 इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
भक्ति के संक्षिप्त परिचय के उपरांत अब एक दृष्टि ब्रम्ह के कर्म संविधान पर । ब्रम्ह के कर्म संविधान में प्राविधान किया गया कि सृष्टि में हो रहे कर्मों की कर्ता प्रकृति है । प्रकृति ब्रम्ह की उत्पत्ति है रचना है । आत्मा ब्रम्ह का अंश है । ब्रम्ह का अंश होने के कारण वह ब्रम्ह की रचना प्रकृति का ज्ञाता होता है । स्वाभाविक रूप से यह निष्कर्श निकाला जा सकता है कि रचनाकार रचना से श्रेष्ठ है । इस प्रकार आत्मा प्रकृति से श्रेष्ठ है । नित्य जगत में व्यवहारिक कर्ता है । कर्म संविधान के प्राविधान के अनुसार सृष्टि के समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । इस प्रकार आत्मा का कर्तापन प्रकृति के अधीन हुआ । श्रेष्ट आत्मा को अधीन रहना है अपनी उत्पक़्त्ति प्रकृति के । कितनी अद्भुद संरचना है । यही मूल है समस्त सृष्टि में व्याप्त कलह अशांति का । समस्त व्यग्रता का मूल । परंतु सत्य ।
अब दृष्टि डालिये कर्म सम्पादन काल पर । संविधान के अनुसार प्रकृति कर्ता है । प्रकृति सदैव सजग है कि उसे अपने किसी भी कार्य को सम्पादित करने के लिये अपने से श्रेष्ट आत्मा का सहारा अवश्यमेव चाहिये । इसलिये उसे यान केन प्रकारेण आत्मा को अपने कार्य को सम्पादित करने के लिये तत्पर करना ही करना है । अन्यथा वह ब्रम्ह के निर्देशानुसार कार्य पूर्ण न कर सकेगी और ब्रम्ह के कोप का भाजन बनेगी । वह निष्ठावान है इसलिये वह ब्रम्ह के कार्य के लिये हर सम्भव प्रकार से आत्मा को कार्य में संलग्न करने में सफल रहती है ।
उपरोक्त के विपरीत श्रेष्ट आत्मा अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में लिप्त होता है । प्रकृति के गुणों का भोक्ता होने के कारण गुणों में आसक्ति जनित कर क्षीण दशा को प्राप्त होता है । जितना ही यह आसक्ति और अहंकार प्रबल होती है उतना ही प्रकृति को आसान पडता है आत्मा से कार्य कराना । क्षीण आत्मा प्रकृति के सम्मुख एक गुलाम की भाँति होता है । अपनी समस्त प्रभुता को भुला वह प्रकृति के सम्मुख एक भिखारी की भाँति लोलुप प्रस्तुत होता है ।
यह ब्रम्ह का अद्भुद विज्ञानयुक्त कार्य संविधान और प्रकृति एवं पुरुष मिश्रित सृष्टि की रचना है । इसी में आनंत काल से मनुष्य सुख दु:ख भोगते चला आया है, चलता जा रहा है, और चलता ही रहेगा । मनुष्य के सामने कोई विकल्प है ही नहीं । परंतु यदि मनुष्य अपने को पहचान सके, ब्रम्ह को जान सके, और कर्म करना सीख सके तो वह ब्रम्ह का प्रतिनिधि है इसलिये ब्रम्ह की गरिमा का जीवन यापन कर सकेगा ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें