गुरुवार, 21 नवंबर 2013

इस सृष्टि में परम ब्रम्ह ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और कर्म यह तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं । 
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण है ब्रम्ह का कर्म संविधान । जैसा कि श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णित है योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संविधान बताते हुये कहते हैं ‌
प्रकृत्यैव  च   कर्माणि  क्रियमाणि सर्वश: ।
य:  पश्चति  तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
ब्रम्ह का संविधान है समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । संसार के समस्त कर्मों के लिये मनुष्य शरीर में प्रदत्त आत्मा नित्य कर्ता है । आत्मा उपरोक्त कथित ब्रम्ह के संविधान के क्रियांवन में विचलित पायी जाती है । विचलन का मूल श्रोत होता है आत्मा की प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । आसक्ति से जन्म होता है इच्छाओं का । इच्छा पूर्ण न होने की दशा में उत्पन्न होता है क्रोध । यह और भी अधिक विध्वंसक होता है आत्मा के कार्य दायित्व के निर्वाह के विचार से । इच्छा पूर्ण हो जाने की दशा में उत्पन्न होता है लोभ । इच्छा पूर्ति के परिणाम स्वरूप उपलब्धि को संजोने की भावना । अधिक प्रकृतीय सम्पदा की उपलब्धियों की दशा में उत्पन्न होता है मद घमण्ड । ये सभी क्रमबद्ध एक के बाद एक उत्पन्न होते जाते हैं । एक स्थिति हो जाती है कि मनुष्य इन्हीं अवांक्षितों के समूह में इतना घिर जाता है कि उसे ब्रम्ह या ब्रम्ह के संविधान का कंचिद स्मरण भी नहीं रह जाता है । जबकि वाँक्षित यह होता है कि जिस प्रकृति ने हमें इतना सुंदर वैज्ञानिक शरीर प्रदान किया उसे प्रतिपल स्मरण रखे व उसके उदारता के लिये हम उसके कृतज्ञ रहें । जिस ब्रम्ह ने उदारता पूर्वक अपना ही अंश स्वरूप आत्मा प्रदान किया हम उस आत्मा को रोग ग्रसित ( इच्छा, क्रोध, मद, लोभ ) करके आचरण भ्रष्ट न बनावें । परंतु कंचिद यह विचार मात्र विचार ही है इनका आचरण प्राय: नगण्य है ।
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कर धार ।
यह चार कर्म के शत्रु है । इन चारो या इनमें से किसी एक के विद्यमान रहते कभी भी कार्य का आचरण यथावाँक्षित नही रह सकता । मनुष्य का कर्म तभी वाँक्षित अर्थात ब्रम्ह के संविधान के अनुकूल सम्भव हो सकता है जब उपरोक्त चार शत्रुओं का प्रादुर्भाव न हो । इन शत्रुओं से तभी मुक्त हो सकते हैं जब हम दृढप्रतिज्ञ हो इनके निवारण के लिये । निवारण के लिये हम प्रयत्नशील तभी होगें जब हम मानसिक स्तर पर इन्हे निर्मूल करने की आवश्यकता महसूस करें ।
प्रकृति भी सहायक होगी हमारे सत्यनिष्ठ प्रयत्नों को सफल बनाने में जब हम स्वयं अपने उत्थान के लिये सत्यनिष्ठ हो जावेगे । God help those who help themselves  प्रकृति ब्रम्ह की अभिब्यक्ति है । हम सभी ब्रम्ह की संताने है । ब्रम्ह ने हमें अपने कार्य प्रयोजनों को करने के लिये बनाया है जन्म दिया है । यह हम सभी का पावन कर्तब्य है कि हम प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों को कर ब्रम्ह के सच्चे वंश का कर्तव्य निर्वाह करें ।

प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें