इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
वर्तमान में विचाराधीन प्रकरण है – ब्रम्ह का कर्म संविधान । जैसा कि श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णित है – योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संविधान बताते हुये कहते हैं
प्रकृत्यैव च कर्माणि
क्रियमाणि सर्वश: ।
य:
पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति
॥
ब्रम्ह का संविधान है – समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । संसार के समस्त कर्मों के लिये मनुष्य
शरीर में प्रदत्त आत्मा नित्य कर्ता है । आत्मा उपरोक्त कथित ब्रम्ह के संविधान के
क्रियांवन में विचलित पायी जाती है । विचलन का मूल श्रोत होता है आत्मा की
प्रकृतीय गुणों में आसक्ति । यह तो हुआ एक
सत्य जो कि नित्य प्रतिदिन प्रत्येक मनुष्य के जीवन में घटित हो रहा है । परंतु
मात्र दोष जान लेने से तो दोष से मुक्त नहीं हुआ जा सकता है । अब उपरोक्त दोष के
निवारण की चर्चा करते हैं । वैसे तो निवारण के लिये धर्मदर्शन में तीन पथ सुझाये
गये हैं । परंतु मैं उन तीनों में से सरलतम पथ का विवरण सर्वप्रथम प्रस्तुत करते
हैं ।
सर्वप्रथम सरलतम पथ है परमब्रम्ह
जो कि सृजन करता है प्रकृति का, प्रकृति ही मूल कारण है जो आत्मा के विचलन का
निमित्त बनती है, की भक्ति करना अर्थात उसी परमब्रम्ह से ही विनय करना
कि हे प्रभू मेरी सहायता करिये मैं कार्यकाल में प्रकृतीय गुणों में आसक्ति सृजित
कर आपके कार्य संविधान के उलंघन को प्रेरित हो जाता हूँ जबकि यथार्त में मै ऐसा
करना चाहता नहीं । इसलिये प्रभु मेरे ऊपर कृपा करिये और मैं अपने कार्यकाल में
आपके कार्य की वाँक्षना के अनुकूल सम्पादन प्रेरित कर सकूँ ऐसी मुझे शक्ति प्रदान
कीजिये ।
अवतार पुरुष श्रीराम ने एक बार
नारद मुनि द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर देते हुये स्वयँ बताते हैं कि हे नारद
मुनि जब कोई भक्त अपनी मानसिक शक्ति का भरोसा त्याग कर मुझसे सहायता की पुकार करता
है तो मैं उसकी पूर्ण सुरक्षा को तत्पर हो जाता हूँ । मैं फिर उसकी उसी प्रकार
रक्षा करता हूँ जिस प्रकार एक माँ अपने नवजात शिशु की रक्षा करती है । इसी वृतांत
को कवि व्यक्त करता है –
सुनि मुनि ताहि कहौं सहरोषा । भजहिं जे जब मोहिं तजि सकल भरोसा ॥
करहुँ सदा तिन्हकरि रखवारी । जिमि बालक राखहिं महतारी ॥
मेरे प्रौढ तनय सम ज्ञानी । बालकसुत सम दास अमानी ॥
जनहिं मोर बल निज़बल ताहीं । द्वौ कर काम क्रोध रिपु आहीं ॥
यहि बिचार पंडित मोहिं भजही । पायेहुँ ज्ञान भगति नहिं तजही ॥
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन
नारायण
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