इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
क्रमश: -- --
नारद मुनि की काम पर विजय वास्तविक एक बडी उपलब्धि थी, क्योंकि कर्म में त्रुटि का पहला श्रोत होता काम । प्रसन्नता से मुनि नारद
इंद्र की सभा में जाकर अपनी काम पर विजय की गाथा सभी को सुनाये । मुनि नारद को
इतने से संतोष नही हुआ भगवान शिव को भी जाकर अपनी काम पर विजय की गाथा सुनाये ।
भगवान शिव ने गाथा सुनने के बाद मुनि नारद को परामर्श दिया कि इस गाथा को कभी परम्
ब्रम्ह से मत सुनाइयेगा । परंतु मुनि नारद को शिवजी की बात अच्छी नहीं लगी और वह
जाकर ब्रम्हाजी से कहे फिर छीरसागर में उपस्थित हो श्रीभगवान से भी गर्व से अपनी
काम के उपर विजयगाथा सुनाये । नारद का बचन सुन प्रभु ने कहा कि मोहित होते है वह
लोग जिन्हे ज्ञान नहीं होता जिन्हे वैराग्य नहीं होता आप तो सदैव परम् ब्रम्ह के
ध्यान में मग्न रहते है आप को माया मोह क्या कर सकती है । नारद मुनि गर्व से फूल
गये और बोले प्रभु सब आपकी कृपा है । नारद मुनि के हृदय में ब्याप्त अभिमान को
श्रीहरि ने पहचाना ।
वर्तमान संदर्भ को शरीर की रचना के संदर्भ में अंकित किये
गये अवयव प्रकृति और पुरुष के आलोक में विश्लेषण करने पर --- नारद मुनि भगवान का
ध्यान (concentrate) करते समाधि की स्थिति में पहुँच गये थे । समाधि
ध्यान की वह अवस्था होती है जिसमें ध्यानकर्ता साधक के मस्तिष्क में पूर्णरूप से
अपने (अपनी आत्मा के अस्तित्व को ) भूल
जाता है और उसके आराध्य जिसके ध्यान में वह लीन हुआ वही सर्वस्व हो जाता है ।
कामदेव की सहायता से मुनि का ध्यान भंग करने का अभिप्राय ध्यान की सीमा से ही था ।
परंतु मुनि का ध्यान प्रबल था इसलिये वह विचलित नहीं हुआ । अर्थात प्राकृतिक सुखों
की अनुभूति से मुनि की आत्मा उन सुखों की ओर आकर्षित नहीं हुई, अपितु आराध्य के ध्यान में ही रही । कंचिद इस प्रकार
नियंत्रित आत्मा ही आदर्श वाँक्षित स्वरूप होता है ।
परंतु नारद मुनि का इंद्र की सभा में इसे बयान करना, फिर शिव भगवान से बयान करना, फिर ब्रम्हाजी से
कहना, फिर क्षीरर्सागर में जाकर प्रभुश्री से इसे बयान करना
निष्चय रूप से गर्व अर्थात आत्मा इसे अपना विशिष्ट (outstanding) कृत मान
सर्वत्र बयान कर रही है । यह कंचिद अवाँक्षित था । शिवजी ने नारदमुनि को यही मना
किया था जिसे की उन्होने माना नहीं।
शेष अगले अंक में --
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मुनि सुशीलता आपनि करनी । सुरपति सभा जाई सब बरनी ॥
तब नारद गवने शिव पाँही । जिता काम अहमिति मन माही ॥
मारि चरित शंकरहि सुनाये । अतिप्रिय जानि महेस सिखाये ॥
बार बार बिनवहुँ मुनि तोंही । जिमि यह कथा सुनायेहुँ मोंही
॥
तिमि जनि हरिहि सुनायेहुँ कबहूँ । चलेहुँ प्रसंग दुरायेहुँ
तबहूँ ॥
शम्भु बचन मुनि मन नहिं भाये । तब बिरंचि के लोक सिधाये ॥
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा । जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा ॥
काम चरित नारद सब भाषे । यद्यपि प्रथम बरजि शिव राखे ॥
सुनि मुनि मोह होइ मन जाके । ग्यान विराग हृदय नहीं जाके ॥
ब्रम्ह्चरज ब्रत रत मतिधीरा । तुम्हहि कि करै मनोभव पीरा ॥
नारद कहेउ सहित अभिमाना । कृपा तुम्हारि सकल भगवाना ॥
करुणानिधि मन दीख बिचारी । उर अंकुरेहुँ गरब तरु भारी ॥
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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