इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
परम् ब्रम्ह का अंश आत्मा और उसकी
उत्पत्ति प्रकृति तथा इन दोनो की परस्पर क्रिया द्वारा उद्भव हुआ कर्म यह तीनों ही
ब्रम्ह की पहेलियाँ हैं । यही तीनों ही सकल विश्व का स्वरूप हैं । आत्मा ब्रम्ह का
अंश होने के कारण प्रकृति का ज्ञाता होता है । फिरभी ब्रम्ह का अद्भुद विज्ञान की
आत्मा प्रकृति के गुणों में आसक्ति कर बैठता है । फलत: आत्मा के कर्म दूषित हो जाते
हैं । वह ब्रम्ह के कर्म संविधान का हठात उलंघन करने लगता है । यही मूल होता है सुख
और दु:ख की अनुभूति का । जब इसके निवारण का प्रश्न आता है तो विद्वान ज्ञाता ने सुझाया
सरलतम भक्ति पथ । पथ तो और भी है । परंतु भक्ति पथ से चल कर ब्रम्ह की चिर दिब्य शांति
की अनुभूति तक पहुँचना सभी अन्य पथो की अपेक्षा सरल है । यद्यपि कि यह सरल और कठिन
की चर्चा मात्र यात्राकाल में साधनाकाल में प्रभावी होती है । गंतब्य मंजिल पर पहुँचने
पर अनुभूति होने वाली दिब्य शांति एक ही होती है । यह दिब्य सुखानुभूति ऐसा मधुर स्वाद
है जो पथिक होकर चलने वाले को मंजिल पर पहुँचने पर ही मिलता है । मात्र किसी के बताने
से अथवा कहीं लिखा हुआ पढने से नहीं मिल सकता । भक्ति पथ अथवा अन्य ज्ञान पाने के पथ
से यात्रा करने पर परम् ब्रम्ह की अनुभूति का रस एक ही होगा मात्र अंतर साधनाकाल में
सुलभ सुगमता अथवा दुर्गमता का भेद होगा । ब्रम्ह जो पूर्णतया अलौकिक स्वत: अस्तित्व
है वह रहेगा तो सदैव भिन्न ही परंतु जितना ही सम्मानजनक भाव संजोकर यात्री यात्रा करेगा
उतना ही उसकी दिब्य शांति की अनुभूति का स्वाद ग्रहण कर सकेगा ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
प्रभु नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन
नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन
नारायण
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