इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
सती की जिज्ञासा का समाधान करते हुये भगवान शंकर बोले कोई न
ही ज्ञानी है और न ही कोई मूर्ख है, जब जिस समय
प्रकृति जिसे जिस रूप में कर देती है, वह उस समय वही प्रतीत होता है । एक बार नारद मुनि हिमालय पर्वत की एक अति
मनोहर गुफा के पास गये जहाँ सामने से ही गंगा की पावन धारा बह रही थी, वहीं एक अति पवित्र आश्रम था, इन सब सुयोगों को
देख देवऋषि को बहुत रमणीक लगा और वह वहीं बैठकर भगवान का ध्यान करने लगे । ध्यान
इतना केंद्रित हुआ कि ऋषि की समाधि लग गई । यह स्थिति देखकर कंचिद इंद्र देव को
चिंता ब्याप्त हो गई कि यह तो ऋषि महाराज यहाँ बस ही जावेगें । उन्हे अपदस्थ करने
किए लिये इंद्रदेव ने कामदेव से विनती की कि कृपया मुनि की समाधि भंग करने में
उनकी सहायता करें । कामदेव की महिमा से वहाँ बहुत ही मनोरम सुगंधित वायु प्रवाहित
होने लगी, सुगंधित फूलों की सुगंध सर्वत्र ब्याप्त हो गई, कोयल व अन्य पक्षी सुंदर कलरव करने लगे । परंतु नारद मुनि की समाधि भंग नहीं
हुई । कामदेव हार मानकर नारद मुनि से क्षमा याचना करने गये । नारद मुनि उनपर नाराज
भी नहीं हुये बल्कि उन्हे विनम्रता से आशिर्वाद भी दिया । इस प्रकार नारद मुनि काम
पर विजय पा लिये । यह बहुत बडी उपलब्धि थी ।
बोले बिहसि महेसि तब ज्ञानी मूढ न कोय ।
जेहिं जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि
क्षण होहि ॥
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि । बह समीप सुरसरि सुहावनि ॥
आश्रम परम पुनीत सुहावा । देखि देवरिषि मन अति भावा ॥
निरखि शैल सरि बिपिन बिभागा । भयहुँ रमापति पद अनुरागा ॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी । सहज बिमल मन लागि समाधी ॥
मुनि गति देखि सुरेस डेराना । कामहि बोलि कीन्ह सनमाना ॥
सहित सहाय जाव मम हेतू । चलेउ हरषि हियँ जलचर केतु ॥
तेहिं आश्रमहिं मदन जब गयहूँ । निज़ माया बसंत निरमयहूँ ॥
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा । कूजहि कोकिल गुँजहि भृन्गा ॥
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी । काम कृसानु बढावनिहारी ॥
रम्भादिक सुर नारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना ॥
करहिं गान बहु तान तरंगा । बहुबिधि क्रीडहि पानि पतंगा ॥
देखि सहाय मदन हरषाना । कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना ॥
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी । निज़ भयँ डरेहु मनोभव पापी ॥
सहित सहाय सभीति अति मानि हारि मन मैन ।
गहेसि जाई मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन
॥
भयहु न नारद मन कछु रोषा । कहि प्रिय बचन काम परितोषा ॥
शेष अगले अंक में ---
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प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण
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नारायण प्रभु नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण
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