इस सृष्टि में परम ब्रम्ह
ही एक मात्र ज्ञेय है । ज्ञेय को जानना ही ज्ञान है । ज्ञेय को जानने के लिये
अपनाये गये मार्ग को भी ज्ञान ही कहा जाता है । आत्मा, प्रकृति, और
कर्म यह
तीनों ही स्वाधीन नहीं हैं, बल्कि
एक ही ब्रम्ह के तीन प्रगट रूप हैं ।
मनुष्य शरीर के दो घटक आत्मा और प्रकृति । इन दोनो की
परस्पर क्रिया से जनित होता है कर्म । विगत उदाहरण में यह विदित हुआ कि प्रकृति के
गुणों से आत्मा किस प्रकार प्रभावित होकर त्रुटिपूर्ण कर्म प्रेरित करने लगती है ।
मात्र दोष जानने से अध्याय पूर्ण नहीं होता । दोष का निवारण भी जानना अनिवार्य
होता है । निवारण से भी पहले कर्म सिद्धांत जानना आवश्यक है ।
श्रीमद् भागवद् गीता में वर्णन है कि – योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं –
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणि सर्वश: ।
य: पश्चति तथात्मानमकर्तारं च पश्चति ॥
कर्ता
प्रकृति है । यह संविधान बताया । ब्रम्ह की रचना है प्रकृति । प्रकृति की रचना का
निमित्त है कर्म । यह ब्रम्ह की ब्यवस्था है । आत्मा ब्रम्ह का अंश है। सृष्टि में
कार्य सम्पादन के निमित्त आत्मा नित्य कर्ता है । कार्य का संविधान बताया कि कर्ता
प्रकृति है । यह एक ब्यूह का स्वरूप बन जाता है । इस ब्यूह की क्लिष्टता और बढ
जाती है – आत्मा की प्रकृतीय गुणों में आसक्ति से । आसक्त आत्मा अपनी
आसक्ति की पूर्ति के कर्मों को प्रेरित करने को उद्यत होने लगता है । कार्य
सिद्धांत का उलंघन का सूत्रपात होता है ।
अपेक्षित
होता है कि आत्मा मात्र उन कर्मों को प्रेरित करे जो कार्य ब्रम्ह के संविधान के
अनुरूप हो अर्थात कार्य की कर्ता प्रकृति द्वारा प्रेरित हों, परंतु आत्मा अपनी आसक्ति के कर्मों को प्रेरित करने में रुचि रखता है, इसलिये वह कार्य के संविधान की उपेक्षा करता है । यह नित्य प्रतिदिन के जीवन
में प्रत्येक मनुष्य के साथ घटित हो रहा है । कोई भी अपने नित्य प्रतिदिन के
कर्मों को विश्लेषण करके देख ले । हर व्यक्ति वही कर रहा है जो उसकी इच्छा है ।
प्रकृति के प्रेरित कार्य की किसको परवाह है ।
उपरोक्त
त्रुटिपूर्ण कर्म सम्पादन का विश्लेषण किया जाय तो इसमें दो अंग मिलते हैं (1)
ब्रम्ह के कर्म सिद्धांत का ज्ञान न होना (2) ब्रम्ह के कर्म सिद्धांत का ज्ञान हो
जाने पर भी उत्पन्न होनेवाला विचलन – कर्म करने की
पद्धति का ज्ञान न होना ।
मनुष्य
अनादि काल से जन्म लेते, कर्म करते, और मृत्यु को प्राप्त होते चला आया है और चलता ही जा रहा है । दोषपूर्ण
कर्मों के सम्पादन के फलस्वरूप प्रकृति द्वारा आरोपित दण्डों को भोगते त्रास उठाते
चलता आया है और चलता ही जा रहा है मानो किसी सुधार की जैसे आवश्यकता ही नहीं है ।
प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण प्रभु नारायण प्रभु नारायण
नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण प्रभु
नारायण नारायण नारायण प्रभु नारायण श्रीमन नारायण श्रीमन नारायण
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